गुरु तेगबहादुर की वाणी में सामाजिक समरसता का संदेश

भारत की संत एवं आध्यात्मिक परम्परा में गुरु तेगबहादुर जी एक ऐसे दीपक हैं जिनकी ज्योति आज भी अंधकार को चीरती हुई समरसता का संदेश देती है। सिखों के नौवें गुरु के रूप में उन्होंने न केवल धार्मिक परंपरा को संजोया बल्कि पूरे मानव समाज के लिए एक ऐसा मार्ग प्रशस्त किया जिसमें जाति भेद धर्म भेद और वर्ग विभेद की दीवारें गिर जाती हैं। उनकी वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है और वहां से निकलने वाला हर शब्द मानवीय हृदय को छूता है। वे कहते हैं कि ईश्वर हर हृदय में बसता है इसलिए सभी जीवों को समान दृष्टि से देखो। यह संदेश मात्र शब्दों तक सीमित नहीं था बल्कि उनके पूरे जीवन में परिलक्षित होता है। सत्रहवीं शताब्दी के मुगल काल में जब धार्मिक असहिष्णुता चरम पर थी और समाज जाति तथा धर्म के नाम पर बंटा हुआ था तब गुरु जी ने समरसता की वह मिसाल पेश की जो आज भी प्रासंगिक है।
गुरु तेगबहादुर जी का जन्म बैशाख कृष्ण पक्ष पंचमी, विक्रम संवत 1678 में अमृतसर के निकट गुरु हरगोबिंद साहिब जी के घर हुआ था। बचपन से ही वे साहसी और विचारशील थे। पिता से उन्होंने तलवारबाजी और घुड़सवारी सीखी लेकिन उनका मुख्य बल आध्यात्मिक था। गुरु अंगद देव जी से लेकर गुरु हरगोबिंद जी तक की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने सिख सिद्धांतों को जन जन तक पहुंचाया। सन् सोलह सौ पैंसठ में गुरुगद्दी संभालने के बाद उन्होंने पूरे भारत की यात्राएं कीं। असम बंगाल बिहार और अन्य क्षेत्रों में जहां उन्होंने सिख संगतों का विस्तार किया वहां लोगों को एक ईश्वर की भक्ति और मानवीय समानता का पाठ पढ़ाया। उस समय समाज में मुगल शासन की ज्यादतियां लोगों को दबा रही थीं। गुरु जी ने इसके खिलाफ आवाज उठाई। उनकी वाणी में कहीं भी घृणा या द्वेष नहीं बल्कि हर व्यक्ति को ईश्वर का अंश मानकर उसकी गरिमा का सम्मान है।
गुरु ग्रंथ साहिब में गुरु तेगबहादुर जी की वाणी कुल एक सौ सोलह रचनाओं में संकलित है जिनमें उनसठ शबद पंद्रह रागों में और सत्तावन सलोक हैं। ये रचनाएं गौरी राग आसावरी राग सोरठ राग और अन्य में हैं। इनमें मुख्य विषय माया की नश्वरता मन की अस्थिरता और नाम सिमरन की महिमा है लेकिन गहराई में उतरने पर सामाजिक समरसता का संदेश स्पष्ट झलकता है। वे बार बार कहते हैं कि सुख और दुख मान और अपमान दोनों को समान समझो। जब मन इन द्वंद्वों से ऊपर उठ जाता है तब व्यक्ति किसी भी भेदभाव से मुक्त हो जाता है। एक प्रसिद्ध सलोक में वे अपने मन से कहते हैं-
भै काहू को देत नहि नहि भै मानत आन।
कहु नानक सुनि रे मना गिआनी ताहि बखानि।
अर्थात जो न किसी को डराता है और न किसी से डरता है वही सच्चा ज्ञानी है। यह निर्भयता सामाजिक समरसता की नींव है क्योंकि डर और दबाव ही विभेद पैदा करते हैं। जब व्यक्ति निर्भय हो जाता है तब वह दूसरे के धर्म दूसरे की आस्था और दूसरे की गरिमा का सम्मान करने लगता है।
उनकी एक और महत्वपूर्ण रचना में वे वर्णन करते हैं कि जो व्यक्ति दुख में दुख नहीं मानता सुख में आसक्त नहीं होता स्वर्ण और मिट्टी को समान देखता है निंदक और स्तुतिकर्ता दोनों को एक समझता है और काम क्रोध से रहित रहता है उसी के हृदय में ईश्वर निवास करता है। यह शब्द सीधे सामाजिक सद्भाव की बात करता है। आज के समय में जब वर्ग संघर्ष और सांप्रदायिक तनाव आम हैं तब यह संदेश याद दिलाता है कि सच्ची समरसता बाहरी नियमों से नहीं बल्कि अंतर्मन की शुद्धता से आती है। गुरु जी ने स्पष्ट किया कि ईश्वर जंगलों में नहीं बल्कि हर हृदय में है। वे कहते हैं –
काहे रे बन खोजन जाई
सर्ब निवासी सदा अलेपा तोही संगि समाई।
अर्थात हे भाई क्यों जंगल में खोजते हो वह तो सबमें समाया हुआ है। यह ज्ञान जाति पांति के भेद को मिटाता है क्योंकि यदि ईश्वर हर हृदय में है तो फिर किस आधार पर कोई छोटा या बड़ा।
गुरु तेगबहादुर जी की वाणी में अहंकार का त्याग बार बार आता है। अहंकार ही वह जड़ है जो समाज में ऊंच नीच का भाव पैदा करता है। वे कहते हैं-
साधो मन का मानु तिआगउ
कामु क्रोधु संगति दुर्जन की ता ते अहिनिसि भागउ।
सुख दुख दोनो सम करि जानै औरु मानु अपमाना।
कहु नानक इह रीति चलै ता को समता निदाना॥
अर्थात हे साधु मन का अभिमान छोड़ दो काम क्रोध और बुरी संगति से बचो तथा सुख दुख मान अपमान को एक समान जानो। जब व्यक्ति अहंकार त्याग देता है तब वह दूसरे को अपने से अलग नहीं देखता। वह समाज में सेवा भाव से जीता है। सिख परंपरा में लंगर की प्रथा इसी समरसता का प्रतीक है जहां सभी एक समान स्तर पर बैठकर भोजन करते हैं। गुरु जी की शिक्षाएं इस परंपरा को और मजबूत करती हैं।
उनके सलोक मानव जीवन की क्षणभंगुरता पर भी प्रकाश डालते हैं। वे कहते हैं कि शरीर माया धन यश कुछ भी साथ नहीं जाता। केवल नाम की कमाई साथ जाती है। यह संदेश धन और पद की होड़ में लगे समाज को याद दिलाता है कि सच्ची समृद्धि सामूहिक कल्याण में है न कि व्यक्तिगत संग्रह में। जब व्यक्ति यह समझ लेता है तब वह लोभ त्यागकर दूसरों की मदद करता है। यही सामाजिक समरसता का आधार है। गुरु जी ने कभी भी संन्यास का मार्ग नहीं सुझाया। वे राजयोगी थे। परिवार समाज और दुनिया के बीच रहते हुए भी ईश्वर में लीन रहना सिखाया। इससे पता चलता है कि समरसता का संदेश जीवन से भागने का नहीं बल्कि जीवन को सही ढंग से जीने का है।
गुरु तेगबहादुर जी का बलिदान सामाजिक समरसता का सबसे बड़ा जीवंत प्रमाण है। सन् १६७५ में मुगल बादशाह औरंगजेब के शासन में कश्मीरी पंडितों पर जबरन इस्लाम स्वीकार करने का अत्याचार हो रहा था। सैकड़ों पंडित, पंडित किरपा राम के नेतृत्व में आनंदपुर साहिब पहुंचे और गुरु जी की शरण ली। गुरु जी ने पंडितों से कहा कि यह समस्या तभी सुलझ सकती है जब कोई सच्चाई और साहस का प्रतीक व्यक्ति खुद को बलिदान के लिए आगे करे। फिर उन्होंने एक ऐतिहासिक सुझाव दिया – “जाओ, औरंगजेब से कह दो कि यदि मैं (गुरु तेगबहादुर) इस्लाम स्वीकार कर लूं तो तुम सब भी स्वीकार कर लोगे।” गुरु जी की मंशा स्पष्ट थी कि वे खुद को ढाल बनाकर हिंदुओं की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करना चाहते थे।
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गुरु जी ने दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। रास्ते में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और सरहिंद जेल में रखा गया। दिल्ली पहुंचने पर औरंगजेब ने गुरु जी को दो विकल्प दिए – या तो इस्लाम स्वीकार कर लो, या चमत्कार दिखाओ, या फिर मौत स्वीकार करो। गुरु जी ने दोनों प्रस्ताव ठुकरा दिए। उन्होंने न तो धर्म बदला और न कोई चमत्कार दिखाया। उनके साथ तीन साहसी साथी भी थे – भाई मति दास, भाई सती दास और भाई दयाला जी। इन तीनों को क्रूर यातनाएं दी गईं। भाई मति दास को आरा (करघे की तरह) से चीरा गया, भाई सती दास को रूई में लपेटकर आग लगा दी गई, और भाई दयाला जी को उबलते पानी में डाल दिया गया। लेकिन कोई भी नहीं टूटा।
अंत में 24 नवंबर 1675 को दिल्ली के चांदनी चौक में उन्हें शहीद कर दिया गया। गुरु जी ने कहा, “शीश दिया पर सिर्र न दिया” अर्थात सिर दे दिया लेकिन सिद्धांत और आस्था नहीं छोड़ी। “शीश दिया पर सिर्र न दिया” यह वाक्य गुरु गोबिंद सिंह जी की दसम ग्रंथ में भी आता है: “धरम हेत साका जिनि कीआ, सीसु दीआ पर सिररु न दीआ।” अर्थात धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने अपना शीश (सिर) दे दिया, लेकिन अपना सिर्र याने अपनी आस्था नहीं बदली। यह बलिदान किसी एक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि हर धर्म की स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा की रक्षा के लिए था, जिससे वे “हिंद की चादर” कहलाए और सामाजिक समरसता का अमर संदेश दिया।
उनके बलिदान ने पूरे देश को एकजुट किया। बाद में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की जो निर्भयता और न्याय की मिसाल बनी। गुरु तेगबहादुर जी की वाणी और कर्म दोनों ने सिखाया कि सच्चा धर्म वह है जो मानवता की रक्षा करे। आज के समय में जब दुनिया भर में सांप्रदायिकता और असहिष्णुता बढ़ रही है तब उनकी शिक्षाएं हमें याद दिलाती हैं कि समरसता तभी संभव है जब हम निर्भय होकर दूसरे के अधिकारों की रक्षा करें।
गुरु जी की वाणी में करुणा और सेवा का भाव भी गहरा है। वे कहते हैं कि सत्संगति में बैठकर ईश्वर का नाम जपो तो पापी भी साधु बन सकता है। यह संदेश समाज के हर वर्ग को शामिल करता है। कोई भी छोटा या बड़ा नहीं। सभी एक ईश्वर की संतान हैं। सिख इतिहास में गुरु नानक देव जी से शुरू हुई एकता की परंपरा गुरु तेगबहादुर जी ने और मजबूत की। उनकी वाणी आधुनिक संदर्भ में आज भी प्रासंगिक है।
गुरु तेगबहादुर जी की वाणी मात्र धार्मिक ग्रंथ नहीं है बल्कि जीवन दर्शन है। यह हमें सिखाती है कि समरसता का मार्ग अंदर से शुरू होता है। मन को शुद्ध करो अहंकार त्यागो और हर जीव में ईश्वर देखो। तब समाज स्वतः समरस हो जाएगा। उनके शब्द आज भी गूंजते हैं कि जीवन क्षणभंगुर है इसलिए इसे प्रेम और सेवा में व्यतीत करो। बलिदान का संदेश कहता है कि सिद्धांतों के लिए खड़े होना ही सच्ची वीरता है।
