यूरोपीय कार कंपनियों के लिए भारत का दरवाज़ा थोड़ा और खुला, EU-भारत व्यापार समझौते से मिलेगी राहत
अमेरिका के ऊंचे टैरिफ और चीन में तेज़ होती कीमतों की जंग से दबाव झेल रही यूरोपीय कार कंपनियों के लिए भारत से एक राहत भरी खबर आई है। यूरोपीय संघ (EU) और भारत के बीच होने जा रहे व्यापार समझौते से कार आयात पर शुल्क में बड़ी कटौती की तैयारी है, जिससे वोक्सवैगन और रेनॉ जैसी कंपनियों को भारतीय बाजार में बेहतर मौके मिल सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह शुरुआत भर है, क्योंकि भारतीय बाजार पर अभी भी घरेलू और एशियाई कंपनियों का दबदबा बना हुआ है।
सूत्रों के मुताबिक, भारत और यूरोपीय संघ मंगलवार को व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर कर सकते हैं। इसके तहत यूरोप से आयात होने वाली कारों पर शुल्क को मौजूदा 70%–110% से घटाकर लगभग 40% करने की योजना है। यह कदम अब तक का सबसे बड़ा टैरिफ सुधार माना जा रहा है, जो भारत के विशाल ऑटो बाजार को यूरोपीय ब्रांड्स के लिए कुछ हद तक खोल देगा।
फिर भी राह आसान नहीं है। भारतीय बाजार में मारुति सुजुकी, टाटा और महिंद्रा जैसी कंपनियां पहले से मजबूत स्थिति में हैं। खासतौर पर छोटी, किफायती और भरोसेमंद कारों की मांग अधिक है। जापान की “केई कार” श्रेणी जैसी कॉम्पैक्ट गाड़ियों की तर्ज पर बनी मारुति सुजुकी वैगन-आर जैसी कारें यहां बेहद लोकप्रिय हैं।
जर्मन ऑटो रिसर्च ग्रुप CAM के विशेषज्ञ स्टेफन ब्राट्ज़ेल का कहना है,
“यह एक शुरुआत जरूर है, लेकिन यूरोप से आने वाली कारें ज्यादातर प्रीमियम सेगमेंट की होंगी। बड़े पैमाने पर बिकने वाली सस्ती कारों के लिए यूरोपीय कंपनियों को अभी संघर्ष करना पड़ेगा। भारत में सफलता के लिए कीमत, भरोसेमंद प्रदर्शन और कम रखरखाव सबसे अहम हैं।”
भारतीय बाजार में यूरोपीय कंपनियों की हिस्सेदारी बेहद कम
भारतीय ऑटो उद्योग के आंकड़ों के अनुसार, यूरोपीय कार निर्माताओं की हिस्सेदारी अभी 3% से भी कम है। इसके विपरीत, मारुति सुजुकी, टाटा और महिंद्रा मिलकर बाजार के करीब दो-तिहाई हिस्से पर काबिज हैं। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऑटो उद्योग है, लेकिन लंबे समय से यह बाजार आयात शुल्क के कारण काफी हद तक संरक्षित रहा है।
वोक्सवैगन समूह, जिसके अंतर्गत ऑडी, पोर्श और स्कोडा जैसे ब्रांड आते हैं, ने कहा है कि भारत उनके लिए रणनीतिक रूप से अहम बाजार है और नए समझौते के व्यावसायिक असर का आकलन किया जाएगा। मर्सिडीज-बेंज का मानना है कि शुल्क में कटौती से दोनों क्षेत्रों की कंपनियों को फायदा होगा, जबकि बीएमडब्ल्यू ने इस पर टिप्पणी करने से इनकार किया।
वारबर्ग रिसर्च के विश्लेषक फाबियो होएल्शर के अनुसार,
“40% तक टैरिफ घटने से खासतौर पर पोर्श जैसे लग्जरी ब्रांड ज्यादा प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं, क्योंकि वे अपनी अधिकांश कारें पूरी तरह आयात करते हैं।”
हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि इसका मुनाफे पर असर दिखने में समय लगेगा और अमेरिकी नीतियों को लेकर अनिश्चितता बनी रहेगी।
2030 तक 60 लाख कारों का बाजार बनने की उम्मीद
अमेरिका और चीन में चुनौतियों के बीच भारत को अगला बड़ा विकास बाजार माना जा रहा है। अनुमान है कि 2030 तक भारत का वार्षिक कार बाजार 44 लाख से बढ़कर करीब 60 लाख वाहनों तक पहुंच सकता है। सरकार ने संकेत दिए हैं कि 15,000 यूरो से अधिक कीमत वाली सीमित संख्या की यूरोपीय कारों पर टैरिफ को चरणबद्ध तरीके से आगे चलकर 10% तक लाया जा सकता है।
ING रिसर्च के विश्लेषक रिको लुमान का कहना है कि EU-भारत व्यापार समझौता मध्यम अवधि में यूरोपीय कार निर्माताओं के लिए बड़ा अवसर साबित हो सकता है।
“भारतीय कार बाजार अभी विकास के शुरुआती चरण में है, जहां भविष्य में जबरदस्त संभावनाएं हैं,” उन्होंने कहा।
कुल मिलाकर, टैरिफ में कटौती यूरोपीय कंपनियों के लिए राहत का संकेत जरूर है, लेकिन भारतीय सड़कों पर बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने के लिए उन्हें स्थानीय जरूरतों के हिसाब से रणनीति बदलनी होगी।

