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डॉ. हेडगेवार का राष्ट्रचिंतन और संघ स्थापना का मूल उद्देश्य

आचार्य ललित मुनि

भारत का इतिहास केवल राजाओं और युद्धों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह उन व्यक्तित्वों की साधना का इतिहास भी है जिन्होंने राष्ट्र को एक जीवंत चेतना के रूप में देखा और उसे संगठित करने का प्रयास किया। डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ऐसे ही एक युगद्रष्टा थे, जिनके लिए स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति का प्रश्न नहीं था, बल्कि यह समाज के भीतर छिपी हुई शक्ति को जागृत करने का भी विषय था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना उनके इसी व्यापक और गहरे चिंतन की परिणति थी, जो अनुभव, संघर्ष और आत्ममंथन की लंबी प्रक्रिया से विकसित हुआ।

डॉ. हेडगेवार के जीवन में राष्ट्रभक्ति कोई सीखी हुई चीज नहीं थी, वह उनके स्वभाव में स्वाभाविक रूप से विद्यमान थी। बचपन की वह घटना, जब उन्होंने अंग्रेजी शासन के उत्सव में बाँटी जा रही मिठाई को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि यह “मिठाई नहीं, ज़हर है”, उनके भीतर के स्वाभिमान और राष्ट्रचेतना का स्पष्ट परिचायक है । यह केवल एक बालसुलभ प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि उस मानसिकता का प्रारंभिक संकेत थी जो आगे चलकर राष्ट्र के लिए समर्पित एक संगठित विचारधारा का रूप लेने वाली थी।

युवावस्था में उनका संपर्क बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन से हुआ, विशेष रूप से अनुशीलन समिति के माध्यम से। यहाँ उन्होंने केवल क्रांति की भावना ही नहीं देखी, बल्कि संगठन की शक्ति, अनुशासन की आवश्यकता और गुप्त कार्यप्रणाली की सूक्ष्मताओं को भी समझा । उन्होंने अनुभव किया कि केवल साहस और उत्साह से कोई आंदोलन सफल नहीं होता, उसके पीछे एक संगठित और अनुशासित शक्ति का होना अनिवार्य है। क्रांतिकारियों के भीतर त्याग और वीरता तो थी, परंतु उनका प्रभाव सीमित था क्योंकि वह व्यापक समाज से पूरी तरह जुड़ नहीं पाया था। यह अनुभव उनके भीतर एक स्थायी प्रश्न छोड़ गया कि क्या कोई ऐसा मार्ग हो सकता है, जो पूरे समाज को एक सूत्र में बाँध सके।

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इसके बाद उन्होंने कांग्रेस के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी की। असहयोग आंदोलन हो या अन्य जनांदोलन, वे हर स्तर पर सक्रिय रहे। किंतु यहाँ भी उन्होंने एक अलग प्रकार की कमी को अनुभव किया। आंदोलनों के समय जनसमूह में उत्साह तो दिखाई देता था, परंतु वह स्थायी नहीं होता था। आंदोलन समाप्त होते ही वही समाज पुनः अपनी पुरानी स्थिति में लौट आता था । इससे उनके मन में यह विचार और अधिक स्पष्ट हुआ कि केवल राजनीतिक आंदोलन राष्ट्र को स्थायी रूप से सशक्त नहीं बना सकते, इसके लिए समाज के भीतर गहरे संस्कार और संगठन की आवश्यकता है।

डॉ. हेडगेवार ने भारत की गुलामी के कारणों को केवल बाहरी आक्रमणों में नहीं खोजा, बल्कि उन्होंने समाज की आंतरिक कमजोरियों को इसका मूल कारण माना। उन्हें लगा कि जब तक समाज जाति, पंथ और क्षेत्रीय विभाजनों में बँटा रहेगा, तब तक कोई भी शक्ति उसे बार-बार पराजित कर सकती है। राष्ट्र की शक्ति उसके संगठित समाज में निहित होती है, और यदि समाज ही बिखरा हुआ है, तो स्वतंत्रता भी स्थायी नहीं रह सकती। यही वह बिंदु था जहाँ उनके चिंतन ने एक स्पष्ट दिशा ले ली।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना इसी दिशा का साकार रूप थी। यह किसी राजनीतिक प्रतिक्रिया का परिणाम नहीं था, बल्कि एक सृजनात्मक प्रयास था। इसका उद्देश्य किसी के विरोध में खड़ा होना नहीं, बल्कि समाज को भीतर से सशक्त बनाना था । डॉ. हेडगेवार के लिए राष्ट्र एक जीवंत सांस्कृतिक इकाई था, जिसकी आत्मा उसके समाज में बसती है। यदि उस समाज को संगठित, अनुशासित और संस्कारित कर दिया जाए, तो राष्ट्र अपने आप सशक्त हो जाएगा।

उनके चिंतन का केंद्रबिंदु था, संपूर्ण समाज का संगठन। यह विचार जितना सरल प्रतीत होता है, उतना ही गहरा है। उन्होंने यह समझा कि राष्ट्रनिर्माण किसी एक वर्ग, संगठन या आंदोलन का कार्य नहीं हो सकता, इसके लिए पूरे समाज को साथ लेना होगा। लेकिन यह केवल एक नारा बनकर न रह जाए, इसके लिए उन्होंने इसे व्यवहार में उतारने का मार्ग भी खोजा।

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इसी सोच से शाखा पद्धति का जन्म हुआ। शाखा केवल एक दैनिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि वह एक ऐसी प्रक्रिया थी जहाँ व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास एक साथ होता था। खेल के माध्यम से अनुशासन, चर्चा के माध्यम से विचार और सामूहिक गतिविधियों के माध्यम से संगठन, इन सबका समन्वय शाखा में दिखाई देता था। यह एक ऐसा प्रयोग था जिसमें राष्ट्रनिर्माण का कार्य बिना किसी दिखावे के, सहज रूप से चलता था।

संघ के नाम में “स्वयंसेवक” शब्द का चयन भी अत्यंत महत्वपूर्ण था। डॉ. हेडगेवार के लिए स्वयंसेवक वह था, जो बिना किसी अपेक्षा के राष्ट्र के लिए कार्य करे। यह केवल सेवा नहीं, बल्कि एक जीवन दृष्टि थी। उन्होंने ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करने का प्रयास किया, जो अपने व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज और राष्ट्र को प्राथमिकता दें।

उनकी कार्यशैली का एक और महत्वपूर्ण पक्ष था व्यक्तिगत संपर्क। वे प्रत्येक स्वयंसेवक के जीवन में गहराई से जुड़ते थे। उनका परिवार, उसकी दिनचर्या, उसके विचार, इन सबको समझकर वे उसके भीतर राष्ट्रभाव को स्थायी रूप से स्थापित करने का प्रयास करते थे । यह केवल संगठन विस्तार नहीं था, बल्कि संस्कार निर्माण की प्रक्रिया थी।

डॉ. हेडगेवार ने संघ को राजनीति से दूर रखा, क्योंकि वे समझते थे कि राजनीति तात्कालिक परिवर्तन ला सकती है, लेकिन स्थायी परिवर्तन समाज के भीतर से आता है। उनका उद्देश्य सत्ता प्राप्त करना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तियों का निर्माण करना था जो किसी भी क्षेत्र में जाकर राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखें। यह एक दीर्घकालिक दृष्टि थी, जिसमें परिणाम तुरंत दिखाई नहीं देते, लेकिन उसका प्रभाव गहरा और स्थायी होता है।

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उनका अपना जीवन भी इसी विचार का उदाहरण था। उन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं को त्यागकर अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्रकार्य को समर्पित कर दिया । यह त्याग केवल शब्दों में नहीं, बल्कि उनके प्रत्येक निर्णय में दिखाई देता था। इसी कारण उनके विचारों में एक नैतिक बल था, जिसने अनेक लोगों को प्रेरित किया।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना को यदि एक वाक्य में समझना हो, तो यह कहा जा सकता है कि यह एक ऐसे विचार का साकार रूप था, जो राष्ट्र को भीतर से मजबूत बनाना चाहता था। डॉ. हेडगेवार ने अपने जीवन के अनुभवों से यह निष्कर्ष निकाला कि यदि समाज संगठित, अनुशासित और संस्कारित हो जाए, तो कोई भी शक्ति उसे पराजित नहीं कर सकती। इसलिए उन्होंने उस दिशा में कार्य करना प्रारंभ किया, जो धीमी जरूर थी, लेकिन स्थायी थी।

उनका यह विश्वास था कि राष्ट्र का भविष्य किसी एक आंदोलन या घटना से तय नहीं होता, बल्कि यह उन व्यक्तियों के चरित्र और संस्कार से बनता है, जो उस राष्ट्र का निर्माण करते हैं। संघ उसी चरित्र निर्माण की प्रक्रिया का एक माध्यम बना। यह केवल एक संगठन नहीं, बल्कि एक सतत चलने वाली साधना थी, जिसमें व्यक्ति अपने आप को समाज और राष्ट्र के लिए तैयार करता है।

इस प्रकार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना एक ऐतिहासिक घटना से कहीं अधिक एक विचार यात्रा थी, एक ऐसी यात्रा, जो बाल्यकाल की सहज राष्ट्रभक्ति से शुरू होकर क्रांतिकारी अनुभवों, राजनीतिक सहभागिता और गहन आत्मचिंतन से गुजरते हुए एक संगठित सामाजिक आंदोलन के रूप में सामने आई। यह उस विश्वास की अभिव्यक्ति थी कि राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके जागरूक, संगठित और संस्कारित समाज में निहित होती है, और उसी को जागृत करना ही सबसे बड़ा राष्ट्रकार्य है।

आचार्य ललित मुनि