futuredलोक-संस्कृति

भारतीय लोक संस्कृति में प्रेम, क्षमा और समरसता का उत्सव धुलेंडी

आचार्य ललित मुनि

भारतीय संस्कृति में पर्व केवल उत्सव नहीं होते, वे जीवन-दर्शन के जीवंत माध्यम हैं। प्रत्येक त्योहार मनुष्य के बाह्य जीवन के साथ उसके आंतरिक संस्कारों को भी स्पर्श करता है। होली का दूसरा दिन, जिसे धुलेंडी, धुरेड़ी या रंगवाली होली कहा जाता है, इसी परंपरा का अद्भुत उदाहरण है। सामान्य दृष्टि से यह रंग खेलने का दिन प्रतीत होता है, परंतु इसके भीतर गहरे आध्यात्मिक संकेत छिपे हैं। धुलेंडी वस्तुतः मनुष्य की चेतना को अहंकार से अनुराग की ओर ले जाने वाला सांस्कृतिक अनुष्ठान है।

धुलेंडी का मूल अर्थ ही है धूल या रंग में एकाकार होना। जब व्यक्ति रंगों से ढक जाता है, तब उसकी व्यक्तिगत पहचान धुंधली पड़ जाती है। न कोई ऊँच-नीच दिखाई देती है, न पद, न प्रतिष्ठा। यही वह क्षण है जहाँ भारतीय दर्शन का गूढ़ सिद्धांत प्रकट होता है कि मनुष्य का वास्तविक स्वरूप सामाजिक आवरणों से परे है।

धुलेंडी को समझने के लिए उसके पूर्व दिवस, अर्थात् होलिका दहन की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है। होलिका दहन केवल पौराणिक कथा का स्मरण नहीं, बल्कि मानव मन के विकारों का प्रतीकात्मक दहन है। प्रह्लाद की भक्ति और हिरण्यकश्यप का अहंकार भारतीय मनोविज्ञान के दो आयाम हैं।

होलिका की अग्नि में अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या और दंभ का दहन किया जाता है। अग्नि के शांत होते ही अगले दिन धुलेंडी आती है, जो यह संकेत देती है कि जब भीतर की अशुद्धियाँ जल जाती हैं, तब जीवन में रंग और प्रेम स्वतः प्रकट होते हैं। अर्थात् धुलेंडी बाहरी उत्सव नहीं, बल्कि शुद्ध चेतना का उत्सव है।

भारतीय परंपरा में रंगों का गहरा दार्शनिक महत्व है। धुलेंडी में प्रयुक्त प्रत्येक रंग मानव मन की किसी भावावस्था का प्रतिनिधित्व करता है। लाल रंग ऊर्जा और प्रेम का प्रतीक है। पीला रंग ज्ञान और वसंत की नवचेतना का संकेत देता है। हरा रंग जीवन और संतुलन का प्रतीक है। नीला रंग व्यापकता और अनंत चेतना का बोध कराता है।

See also  रायपुर प्रेस क्लब के रंगोत्सव और महामूर्ख सम्मेलन में शामिल हुए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, नगाड़ा बजाकर बढ़ाया उत्साह

जब ये सभी रंग एक साथ मनुष्य पर डाले जाते हैं, तो यह संदेश मिलता है कि जीवन एकरंगी नहीं, बहुरंगी है। आध्यात्मिकता का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि विविधताओं को स्वीकार करना है। धुलेंडी में रंग लगाना वस्तुतः दूसरे व्यक्ति को स्वीकार करने का संस्कार है। यह कहने का सांस्कृतिक तरीका है कि हम भिन्न होते हुए भी एक हैं।

मानव जीवन का सबसे बड़ा बंधन अहंकार है। पद, ज्ञान, संपत्ति, जाति या सामाजिक स्थिति से उत्पन्न यह अहंकार व्यक्ति को समाज से अलग कर देता है। धुलेंडी इस विभाजन को समाप्त करने का अवसर प्रदान करती है। इस दिन राजा और सामान्य व्यक्ति, अधिकारी और कर्मचारी, गुरु और शिष्य, सभी एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। सामाजिक दूरी क्षणभर के लिए समाप्त हो जाती है।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। उपनिषदों में कहा गया है कि जब तक ‘मैं’ की भावना प्रबल रहती है, तब तक आत्मबोध संभव नहीं होता। धुलेंडी का रंग इस ‘मैं’ को मिटाने का प्रतीक है। रंग से ढका चेहरा बताता है कि वास्तविक पहचान बाहरी नहीं, आंतरिक है।

अहंकार के स्थान पर जब प्रेम स्थापित होता है, तब अनुराग जन्म लेता है। धुलेंडी का मूल उद्देश्य यही है। रंग लगाने से पहले लोग कहते हैं, “बुरा न मानो, होली है।” यह वाक्य केवल हास्य नहीं, बल्कि क्षमा का सांस्कृतिक विधान है। वर्ष भर के मनोमालिन्य इस दिन समाप्त करने का अवसर मिलता है। भारतीय समाज में संबंधों की निरंतरता का एक कारण यह परंपरा भी रही है। धुलेंडी सामाजिक पुनर्समाधान का उत्सव है, जहाँ टूटे संबंध पुनः जुड़ते हैं।

See also  रायपुर में नवोदय विद्यालय भूपदेवपुर के पूर्व विद्यार्थियों का होली मिलन समारोह

वैष्णव भक्ति आंदोलन में होली और धुलेंडी का विशेष महत्व रहा है। वृंदावन और ब्रज क्षेत्र में राधा-कृष्ण की लीलाएँ रंगोत्सव के माध्यम से प्रेम की दिव्यता को व्यक्त करती हैं। कृष्ण का गोपियों के साथ रंग खेलना केवल लोककथा नहीं, बल्कि आत्मा और परमात्मा के मिलन का प्रतीक है। भक्त और भगवान के बीच का भेद रंगों में समाप्त हो जाता है। भक्ति साहित्य में रंग को प्रेम का रूपक माना गया है। कबीर ने कहा कि प्रेम का रंग ऐसा है जो एक बार चढ़ जाए तो उतरता नहीं। धुलेंडी इसी स्थायी प्रेम का सांस्कृतिक उत्सव है।

धुलेंडी सामूहिकता का पर्व है। यह व्यक्ति को अकेलेपन से बाहर लाकर समुदाय से जोड़ता है। आधुनिक जीवन में बढ़ती मानसिक दूरी और सामाजिक तनाव के बीच यह पर्व सामूहिक आनंद का अवसर प्रदान करता है। ग्राम्य जीवन में धुलेंडी का स्वरूप विशेष रूप से जीवंत दिखाई देता है। लोग समूह में फाग गाते हैं, ढोल-मांदर बजाते हैं और सामूहिक भोजन करते हैं। यह सामुदायिक सहभागिता सामाजिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाती है। समाजशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो धुलेंडी सामाजिक तनावों के शमन का पारंपरिक माध्यम रही है।

मानव मन दबी हुई भावनाओं का भंडार है। सामाजिक मर्यादाएँ व्यक्ति को निरंतर नियंत्रित करती रहती हैं। धुलेंडी इन दबावों से मुक्त होने का अवसर देती है। हँसी, परिहास, नृत्य और रंगों के माध्यम से व्यक्ति मानसिक तनाव से मुक्त होता है। आधुनिक मनोविज्ञान भी स्वीकार करता है कि सामूहिक उत्सव मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक हैं। इस प्रकार धुलेंडी एक सांस्कृतिक मनोचिकित्सा की तरह कार्य करती है।

See also  सामाजिक समरसता और नवजीवन का त्योहार वासन्ती नव सस्येष्टि पर्व

धुलेंडी वसंत ऋतु के चरम का उत्सव है। प्रकृति स्वयं रंगों से भर उठती है। वृक्षों पर नए पत्ते, खेतों में लहराती फसल और वातावरण की सुगंध जीवन के पुनर्जन्म का संकेत देती है। मानव और प्रकृति के इस सामंजस्य को भारतीय संस्कृति ने उत्सव का रूप दिया। धुलेंडी हमें प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करने की प्रेरणा देती है।

समय के साथ धुलेंडी का स्वरूप बदल रहा है। कृत्रिम रंगों, जल अपव्यय और प्रदर्शन की प्रवृत्ति ने इसके मूल संदेश को कहीं-कहीं धूमिल किया है। आज आवश्यकता है कि धुलेंडी को उसके आध्यात्मिक अर्थ में पुनः समझा जाए। प्राकृतिक रंगों का उपयोग, संयमित उत्सव और पारस्परिक सम्मान इस पर्व की मूल भावना को सुरक्षित रख सकते हैं।

धुलेंडी हमें सिखाती है कि जीवन का वास्तविक आनंद प्रतिस्पर्धा में नहीं, संबंधों में है। जब मनुष्य अपने अहंकार को त्यागकर दूसरों के साथ प्रेमपूर्वक जुड़ता है, तभी समाज स्वस्थ बनता है। रंग अंततः धुल जाते हैं, परंतु अनुराग का रंग स्थायी होता है। यही धुलेंडी का आध्यात्मिक सार है।

यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि मनुष्य की सबसे बड़ी पहचान उसका पद या व्यक्तित्व नहीं, बल्कि उसका प्रेम है। जब हम किसी को रंग लगाते हैं, तब अनजाने में यह स्वीकार करते हैं कि हम सब एक ही सृष्टि के अंश हैं। इस प्रकार धुलेंडी केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, सामाजिक समरसता और आध्यात्मिक उत्कर्ष की यात्रा है, जो मनुष्य को अहंकार से उठाकर अनुराग की ऊँचाइयों तक ले जाती है।