सूर्योपासना और छठी मैया की आराधना का पावन पर्व : चैती छठ
भारत में चैती छठ भी प्रमुखता से मनाई जाती है, यह एक प्रमुख हिंदू पर्व है, जिसे सूर्य उपासना और छठी मैया की पूजा के लिए मनाया जाता है। यह पर्व साल में दो बार मनाया जाता है—कार्तिक छठ (अक्टूबर-नवंबर) और चैती छठ (मार्च-अप्रैल)। चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने के कारण इसे “चैती छठ” कहा जाता है। यह मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और नेपाल में बड़े श्रद्धा भाव से मनाया जाता है, लेकिन अब यह पूरे भारत और विदेशों में भी लोकप्रिय हो गया है।
चैती छठ का महत्व
चैती छठ मुख्य रूप से सूर्य देव और छठी मैया की आराधना के लिए किया जाता है। सूर्य देव को जीवन और ऊर्जा का स्रोत माना जाता है, और उनकी पूजा से स्वास्थ्य, समृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होती है। यह पर्व प्रकृति, जल और सूर्य की ऊर्जा के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर भी प्रदान करता है।
छठ पूजा के अनुष्ठान और विधियाँ
चैती छठ कुल चार दिनों तक चलता है, जिसमें प्रत्येक दिन एक विशेष अनुष्ठान होता है:
1. नहाय-खाय (पहला दिन): इस दिन व्रती (व्रत रखने वाला व्यक्ति) गंगा या किसी पवित्र नदी में स्नान करता है और सात्विक भोजन करता है। भोजन में अरवा चावल, चना दाल और कद्दू की सब्जी बनाई जाती है।
2. खरना (दूसरा दिन): इस दिन व्रती दिनभर उपवास रखते हैं और सूर्यास्त के बाद गुड़ की खीर, रोटी और फल का प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसके बाद से अगले 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू होता है।
3. संध्या अर्घ्य (तीसरा दिन): इस दिन भक्त डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य (अर्पण) देते हैं। व्रती नदी या तालाब में खड़े होकर सूर्य देव को दूध और जल चढ़ाते हैं। पूजा के दौरान ठेकुआ, फल और अन्य प्रसाद चढ़ाया जाता है।
4. उषा अर्घ्य (चौथा दिन): अंतिम दिन सूर्योदय से पहले उगते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद व्रती पारण (व्रत तोड़ने की प्रक्रिया) करके अपना उपवास समाप्त करते हैं।
पौराणिक संदर्भ और छठ पूजा की कथाएँ
चैती छठ पर्व हिंदू धर्म के विभिन्न ग्रंथों, लोक कथाओं और परंपराओं में पाया जाता है। इसका उल्लेख वेदों, पुराणों और महाकाव्यों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मिलता है।
1. राजा प्रियंवद और छठी मैया की कथा (ब्रह्मवैवर्त पुराण से संदर्भित): ब्रह्मवैवर्त पुराण और स्कंद पुराण में छठी देवी (षष्ठी देवी) का उल्लेख मिलता है। वे भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री मानी जाती हैं, जो संतान की रक्षा और उन्नति का आशीर्वाद देती हैं। राजा प्रियंवद ने संतान प्राप्ति के लिए छठी मैया की पूजा की, जिससे उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ, जो माता की कृपा से पुनः जीवित हो उठा।
2. श्रीराम और माता सीता द्वारा छठ पूजा (रामायण से संदर्भित): वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में उल्लेख मिलता है कि भगवान श्रीराम और माता सीता ने अपने राज्याभिषेक के बाद सूर्य देव की उपासना की थी। माता सीता ने निर्जला व्रत रखा और सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित किया, जिससे उन्हें राज्य में सुख-समृद्धि प्राप्त हुई।
3. महाभारत काल में द्रौपदी और पांडवों द्वारा छठ व्रत (महाभारत से संदर्भित): महाभारत के वनपर्व में सूर्य उपासना और द्रौपदी द्वारा छठ व्रत करने का उल्लेख मिलता है। श्रीकृष्ण के कहने पर द्रौपदी ने छठी मैया और सूर्य देव की आराधना की, जिससे पांडवों को खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त हुआ और कुरुक्षेत्र युद्ध में विजय मिली।
4. सूर्य देव और उनकी पत्नी संज्ञा की कथा (भागवत पुराण से संदर्भित): भागवत पुराण और विष्णु पुराण में सूर्य देव और उनकी पत्नी संज्ञा (छाया) की कथा मिलती है। सूर्य देव से उत्पन्न संतानें और उनकी पूजा करने वाले भक्त संतान सुख, आरोग्य और तेजस्विता प्राप्त करते हैं।
वैज्ञानिक और आध्यात्मिक पहलू
छठ पर्व का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व भी गहरा है:
सूर्योपासना से स्वास्थ्य लाभ: सूर्य की किरणों से शरीर में विटामिन-डी और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
मानसिक शांति और आत्मसंयम: 36 घंटे का उपवास आत्मसंयम, धैर्य और मानसिक दृढ़ता बढ़ाता है।
पारिवारिक और सामाजिक समरसता: इस पर्व में पूरा परिवार और समाज मिलकर भाग लेता है, जिससे सामाजिक एकता बढ़ती है।
चैती छठ केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, भक्ति और प्रकृति के प्रति सम्मान का पर्व है। इसकी पौराणिक कथाएँ बताती हैं कि यह व्रत सूर्य देव और छठी मैया की कृपा पाने का एक माध्यम है, जिससे जीवन में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है।
बहुत सुंदर भईया👌👌👌