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जिन्होंने सबसे पहले देखा था नये ओड़िशा राज्य का सपना, आज 28 अप्रैल को उनकी जयंती

स्वराज करुण द्वारा लिखित इस आलेख में मधुसूदन दास के प्रेरणादायक जीवन और उनके ओड़िशा राज्य निर्माण के सपने का उल्लेख किया गया है। पहली बार 1903 में ओड़िशा राज्य की परिकल्पना करने वाले मधुसूदन दास को उत्कलवासियों ने ‘उत्कल गौरव’ की उपाधि दी। उनका जन्म 28 अप्रैल 1848 को हुआ था और आज भी उनके योगदान को सम्मानपूर्वक याद किया जाता है।

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दिल्ली विजय से दोराहा संधि तक वीरता की अमर गाथा

बाजीराव पेशवा जैसी महान विभूतियों का बलिदान है, जिससे आज भारत का स्वत्व प्रतिष्ठित हो रहा है। ऐसे महान यौद्धा का आज 28 अप्रैल को निर्वाण दिवस है। उनका पूरा जीवन युद्ध में बीता।

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स्वतंत्रता के प्रहरी : बाबू कुँअर सिंह

न आयु बाधा बनी। वे भारत की स्वाधीनता के लिए न्यौछावर हो गए। ऐसे ही बलिदानी थे बाबू कुँअर सिंह, जिन्होंने हाथ में बंदूक लेकर अस्सी वर्ष की आयु में क्रांति का मोर्चा संभाला।

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अत्याचार के विरुद्ध अद्वितीय साहस का प्रतीक गुरु तेगबहादुर

गुरु तेगबहादुर का बलिदान भारतीय इतिहास कभी नहीं भूलेगा, उनका बलिदान अत्याचार के विरुद्ध डटकर मुकाबला करने का प्रेरणा देता है। जब धर्म पर बात आए तो क्रूर शासक से भी समझौता नहीं किया जा सकता चाहे अपने प्राणों का बलिदान ही क्यों न करना पड़े।

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छापामार युद्ध के उस्ताद तात्या टोपे एवं उनकी सैन्य रणनीति

सुप्रसिद्ध बलिदानी तात्या टोपे संसार के उन विरले सेनानायकों में से एक हैं, जिन्होंने न केवल एक व्यापक क्रांति का संचालन किया, बल्कि क्रांति के अधिकांश नेताओं के बलिदान के बाद भी लगभग एक वर्ष तक अकेले अपने पराक्रम से उस क्रांति को जीवंत रखा और पूरे भारत में अंग्रेजों को छकाया।

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गाय की चर्बी के कारतूस विवाद से शुरू हुआ संतावन का गदर : मंगल पाण्डेय

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में 1857 की क्रान्ति को सब जानते हैं। यह एक ऐसा सशस्त्र संघर्ष था जो पूरे देश में एक साथ हुआ। इसमें सैनिकों और स्वाभिमान सम्पन्न रियासतों ने हिस्सा लिया। असंख्य प्राणों की आहूतियाँ हुईं थी। इस संघर्ष का सूत्रपात करने वाले स्वाभिमानी सिपाही मंगल पाण्डेय थे।

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