लोक-संस्कृति

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दण्डकारण्य और दोरला जनजाति की राम भक्ति परंपरा

दक्षिण बस्तर की दोरला जनजाति में प्रचलित राम पूजा की परंपरा, देवगुड़ी आस्था, पण्डुम पर्व और दण्डकारण्य से जुड़े सांस्कृतिक एवं धार्मिक संबंधों का विस्तृत विवरण।

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यदि वन न रहें तो…वन से आत्मसंवाद

“यदि वन न रहें तो…” विषय पर यह भावनात्मक और तथ्यात्मक आलेख जंगल में चलते एक व्यक्ति के आत्मसंवाद के माध्यम से वन संरक्षण, जनसंख्या दबाव और भविष्य की चुनौतियों को प्रस्तुत करता है।

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पश्चिम बंगाल की राजनीति पर उठते सवाल: क्या लोकतंत्र से भटक रहा है बंगाल?

यह लेख पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों, चुनावी माहौल और सामाजिक बदलावों पर गंभीर सवाल उठाता है। लेखक का कहना है कि राजनीतिक टकराव, हिंसा और आरोप-प्रत्यारोप के बीच बंगाल का लोकतांत्रिक वातावरण प्रभावित हो रहा है और राज्य के सामाजिक व आर्थिक भविष्य को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं।

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दुनिया भर में नज़र उतारने की प्राचीन परंपराएं

नज़र दोष या बुरी नज़र की अवधारणा भारतीय परंपरा से लेकर तुर्की, ग्रीस, मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका तक फैली हुई है। यह आलेख नज़र से जुड़ी मान्यताओं, घरेलू उपायों और वैश्विक सांस्कृतिक संदर्भों को मानवीय दृष्टिकोण से प्रस्तुत करता है।

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भक्ति, सेवा और समरसता की अमर गाथा : भक्त शिरोमणि माता कर्मा

साहू समाज की आराध्य देवी भक्त शिरोमणि माता कर्मा के जीवन, भक्ति, सेवा, संघर्ष और सामाजिक समरसता के संदेश पर आधारित विस्तृत भावनात्मक व तथ्यात्मक आलेख।

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रंगों में रचा भारतीय जीवन, भक्ति और वसंतोत्सव : रंग पंचमी

रंग पंचमी भारतीय चेतना का जीवंत प्रतीक है। यह बताती है कि रंग केवल उत्सव का माध्यम नहीं बल्कि प्रेम, भक्ति और जीवन की ऊर्जा का प्रतीक हैं। कालिदास, जयदेव और सूरदास की काव्य परंपरा हमें यह सिखाती है कि रंग तभी सार्थक हैं जब वे मन की शुद्धि और प्रेम की भावना से जुड़े हों।

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