लोक-संस्कृति

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आद्य पत्रकारिता के जनक और लोक संचार के प्रथम आचार्य देवर्षि नारद

देवर्षि नारद को भारतीय परंपरा में केवल एक ऋषि नहीं, बल्कि लोक संचार और संवाद के प्रथम आचार्य के रूप में भी देखा जाता है। देवर्षि नारद के जीवन, कार्य और संस्कृत ग्रंथों में वर्णित उनके संवादों के आधार पर यह शोधपरक आलेख इस प्रश्न का विश्लेषण करता है

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लोक कल्याण के संवाहक पत्रकार थे देवर्षि नारद

देवर्षि नारद को केवल पौराणिक पात्र ही नहीं, बल्कि लोककल्याण के संवाहक और आदर्श पत्रकार के रूप में समझना आवश्यक है। निष्पक्षता, सत्य और संवाद की उनकी परंपरा आज भी पत्रकारिता के लिए मार्गदर्शक है।

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अजमेर का ‘लाल्या-काल्या मेला’ : नृसिंह जयंती पर जीवंत होती आस्था और परंपरा

अजमेर के नया बाजार होलीदड़ा स्थित श्रीनृसिंह मंदिर में नृसिंह जयंती पर लगने वाला ऐतिहासिक लाल्या-काल्या मेला, जहां वराह और नृसिंह अवतार की कथा जीवंत रूप में प्रस्तुत की जाती है।

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सूरदास के पदों में प्रकृति और पर्यावरण चेतना

सूरदास के पदों में प्रकृति और पर्यावरण चेतना का गहन विश्लेषण। सूरसागर के चुनिंदा पदों की व्याख्या सहित ब्रज की यमुना, वृंदावन वनों, ऋतुओं और गोचारण संस्कृति पर आधारित प्रेरणादायक आलेख जो भक्ति और पर्यावरण संरक्षण को जोड़ता है।

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छत्तीसगढ़ की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत : परंपराएँ, लोककला और लोकजीवन

छत्तीसगढ़ की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में लोकपरंपराएँ, लोकनृत्य, लोककला और जनजातीय जीवन प्रकृति संरक्षण, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पहचान का सशक्त आधार प्रस्तुत करते हैं।

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पर्यावरण चेतना और सामाजिक समरसता का त्योहार: बोहाग बिहू

बोहाग बिहू असम का रंगीन त्योहार है जो पर्यावरण चेतना, जैव विविधता संरक्षण, पशु कल्याण और सामाजिक समरसता का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। गोरु बिहू, मनुह बिहू, बिहू नृत्य और सामूहिक उत्सव के माध्यम से यह प्रकृति सम्मान तथा सामाजिक एकता का प्रेरणादायक संदेश देता है।

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