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बस्तर पर केन्द्रित दो पुस्तकों का लोकार्पण एवं काव्य-संध्या सम्पन्न

कोंडागाँव। भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय की संस्था राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत यानी नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया, नयी दिल्ली तथा छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद् की कोंडागाँव जिला इकाई के संयुक्त तत्वावधान में गत दिवस बस्तर पर केन्द्रित दो महत्त्वपूर्ण पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। इनमें से एक पुस्तक थी, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा प्रकाशित “”बस्तर का आदिवासी एवं लोक संगीत”” (लेखक : हरिहर वैष्णव, चित्रकार एवं छायाकार : खेम वैष्णव) और छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद् द्वारा प्रकाशित काव्य-संग्रह “”मैं बस्तर बोल रहा हूँ”” (कवि : डॉ. राजाराम त्रिपाठी)। इस आयोजन की अध्यक्षता छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद् के प्रांतीय उपाध्यक्ष चितरंजन रावल ने की जबकि मुख्य अतिथि थे हेमचन्द्र सिंह राठौर। इस आयोजन में लोक-संगीत के साथ-साथ काव्य-संध्या का आयोजन भी हुआ।
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कार्यक्रम आरम्भ करते हुए न्यास के संपादक पंकज चतुर्वेदी ने बताया कि “”बस्तर का आदिवासी एवं लोक संगीत”” पुस्तक की अन्य विशेषताओं में एक विशेषता यह भी है कि इसमें प्रकाशित सभी छायाचित्र स्वाभाविक और दुर्लभ हैं और रेखांकन भी बहुत ही आकर्षक, जिसके लिये उन्होंने छायाकार एवं चित्रकार श्री खेम वैष्णव को बधाई दी।
“”बस्तर का आदिवासी एवं लोक संगीत”” के लेखक श्री हरिहर वैष्णव ने बताया कि यह पुस्तक कोई ढाई सौ लोगों के सहयोग से चालीस साल तक चले शोध व अन्वेषण का सार है, जिसमें 237 गोंडी, हल्बी, भतरी तथा बस्तरी आदि जनभाषाओं के पारम्परिक गीत उनके अनुवाद सहित हैं। उन्होंने इस पुस्तक को अपने सहयोग से परिपुष्ट करने वाले समस्त जनों का आभार व्यक्त किया। वैष्णव बन्धुओं ने इसके लिये लोक गायिका श्रीमती सुकदई कोराम को सम्मानित भी किया।
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दूसरी पुस्तक “”मैं बस्तर बोल रहा हूँ”” के कवि डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने अपने उद्बोधन में कहा कि वे इस बात से आहत हैं कि बस्तर को बदतर बनाया जा रहा है और उनकी रचनाएँ भले ही किसी को कविता के शिल्प की दृष्टि से कमजोर लगें, लेकिन यह उनके अन्तर्मन की आवाज है कि यहाँ का सुख, शांति, नैसर्गिक सौंदर्य, लोक जीवन लौटाया जाए। उन्होंने कहा कि उनकी कविताओं में बस्तर के जंगल-जमीन की तरह अनगढ़ भाव हैं। श्री त्रिपाठी ने अपनी एक रचना का पाठ करते हुए कहा कि ये रचनाएँ बस्तर के आम जन व युवाओं की आवाज है।
अमरकण्टक (म.प्र.) स्थित इंदिरा गांधी राष्ट्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय से आए शोध-छात्र अजय कुमार सिंह ने “”बस्तर का आदिवासी एवं लोक संगीत”” पुस्तक पर अपनी समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहा कि यह पुस्तक बताती है कि किस तरह बस्तर के जनजीवन में प्रत्येक अवसर पर्व, संस्कार, ऋतुओं, सुख-दु:ख सभी पर यहाँ गीत-संगीत उपलब्ध है। यह पुस्तक बस्तर के सामाजिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक सभी पक्षों को सहेजती है। श्री सिंह का सुझाव था कि यदि इस पुस्तक को ऑडियो सी.डी. के साथ प्रस्तुत किया जाता तो आने वाली पीढ़ी के लिये और बेहतर संदर्भ-ग्रन्थ होता।
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श्री सुरेन्द्र रावल ने डॉ. राजाराम त्रिपाठी के काव्य-संग्रह “”मैं बस्तर बोल रहा हूँ”” की कविताओं को कवि की साफगोई, निर्भीकता के स्वर निरुपित करते हुए कहा कि डॉ. त्रिपाठी की रचनाओं में बस्तर के प्रति उनकी संवेदना, दु:ख-दर्द तो प्रकट होता ही है, ये रचनाकार के दार्शनिक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण को भी उभारती हैं। इस अवसर पर श्री हेमचन्द्र सिंह राठौर ने कहा कि यह कोंडागाँव के लिये गर्व की बात है कि यहाँ के रचनाकार राष्ट्रीय स्तर पर यहाँ की कला, संस्कृति, समस्याओं को अपनी कलम के माध्यम से सतत प्रस्तुत कर रहे हैं। श्री चितरंजन रावल ने बीते 50 साल के दौरान हिन्दी साहित्य में कोंडागाँव के योगदान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को याद करते हुए कहा कि विमोचित दोनों पुस्तकों की भाव-भूमि भले ही अलग-अलग हो लेकिन उनके सरोकार समान हैं।
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आयोजन में खीरेन्द्र यादव व साथियों ने हल्बी में “लेजा” और भतरी में “डाँडामाली” लोक-गीत प्रस्तुत कर श्रोताओं को थिरकने पर मजबूर कर दिया। कार्यक्रम के अन्त में आयोजित एक संक्षिप्त काव्य-संध्या में काव्य-पाठ किया ललित शर्मा (अभनपुर) एवं शिवकुमार पाण्डेय (नारायणपुर) ने। आयोजन में राष्ट्रीय पुस्तक न्यास के संपादक पंकज चतुर्वेदी ने उनके संस्थान द्वारा बस्तर क्षेत्र के लिये किये जा रहे कार्यों की जानकारी देते हुए इस बात के लिये कोंडागाँव के लोगों के प्रति धन्यवाद ज्ञापित किया कि बस्तर में न्यास के कार्य की शुरुआत यहीं से हुई थी।
(हरिहर वैष्णव)

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