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बंकिम चंद्र चटर्जी के विचारों में धर्म और राष्ट्र

आचार्य ललित मुनि

बंकिम चंद्र चटर्जी उन्नीसवीं शताब्दी के उस युग के साहित्यकार थे जब भारत ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की जंजीरों में जकड़ा हुआ था। उनकी लेखनी ने केवल कहानियां नहीं लिखीं बल्कि एक पूरे राष्ट्र को जागृत करने का कार्य किया। वे बंगाल के जन्मे थे परंतु उनकी सोच पूरे भारत की थी। उनका जन्म 26/27 जून 1838 में हुआ और 8 अप्रैल 1894 में उनका देहांत हुआ। सरकारी नौकरी करते हुए भी उन्होंने साहित्य के माध्यम से स्वाधीनता की चिंगारी प्रज्वलित की। उनकी रचनाएं जैसे आनंदमठ, दुर्गेशनंदिनी और कृष्ण चरित्र न केवल मनोरंजन करती थीं बल्कि गहरे दार्शनिक और राष्ट्रवादी विचारों से भरी हुई थीं। बंकिम चंद्र का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने धर्म को राष्ट्र से अलग नहीं माना। उनके अनुसार धर्म राष्ट्र का प्राण है और राष्ट्र धर्म की अभिव्यक्ति। यह विचार आज भी प्रासंगिक है क्योंकि यह हमें याद दिलाता है कि सच्चा राष्ट्रवाद बिना आध्यात्मिक आधार के अधूरा रह जाता है।

उनके युग में पश्चिमी शिक्षा का प्रभाव बढ़ रहा था। कई लोग अंग्रेजी साहित्य और दर्शन को श्रेष्ठ मानने लगे थे। बंकिम चंद्र ने इस प्रवृत्ति का विरोध किया। उन्होंने कहा कि हम कुमारसंभव को छोड़कर स्वाइनबर्न पढ़ते हैं, गीता को छोड़कर मिल पढ़ते हैं। उनकी नजर में भारतीय संस्कृति और धर्म की जड़ें इतनी गहरी थीं कि उन्हें पुनर्जीवित करके ही राष्ट्र का निर्माण संभव था। उन्होंने हिंदू धर्म को एक सजीव शक्ति के रूप में देखा जो न केवल व्यक्तिगत मोक्ष बल्कि सामूहिक उत्थान का साधन भी हो सकता है। धर्मतत्त्व उनकी प्रमुख कृति है जिसमें उन्होंने धर्म की नई व्याख्या प्रस्तुत की।

धर्मतत्त्व में बंकिम चंद्र धर्म को केवल धार्मिक अनुष्ठान या संप्रदाय तक सीमित नहीं रखते। वे इसे मानव जीवन की पूर्ण विकास की प्रक्रिया मानते हैं। उनका कहना है कि धर्म अनुशीलन है। अनुशीलन का अर्थ है मानव की सभी शक्तियों का संतुलित विकास। शारीरिक मानसिक नैतिक और आध्यात्मिक क्षमताओं को पूर्ण रूप से विकसित करके मनुष्य अपनी मानवता को चरम सीमा तक ले जा सकता है। यह विचार पश्चिमी मानववाद से प्रेरित लगता है परंतु बंकिम ने इसे भारतीय दर्शन से जोड़ा। वे कहते हैं कि धर्म सार्वभौम नैतिक नियम है जो सभी मनुष्यों पर लागू होता है चाहे वे हिंदू हों मुस्लिम हों या ईसाई। यह पाश्चात्य धर्म की संकीर्ण परिभाषा से ऊपर है। धर्म केवल ईश्वर की पूजा नहीं बल्कि मानव कल्याण और राष्ट्र सेवा है।

यहां वे भगवद्गीता का सहारा लेते हैं। गीता में भगवान कृष्ण अर्जुन से कहते हैं- यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे। इसका अर्थ है कि जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूं। साधुओं की रक्षा अधर्मियों का विनाश और धर्म की स्थापना के लिए। बंकिम चंद्र इस श्लोक को राष्ट्रवाद से जोड़ते हैं। उनके अनुसार जब राष्ट्र पर विदेशी आक्रमण होता है तो धर्म की रक्षा का दायित्व प्रत्येक नागरिक पर आता है। यह श्लोक उनके लिए प्रेरणा बनता है कि राष्ट्र की सेवा ही धर्म की सेवा है।

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गीता का एक और महत्वपूर्ण श्लोक वे उद्धृत करते हैं जो लोकसंग्रह से संबंधित है। गीता ३.२० में कहा गया है यत् यत् आचरति श्रेष्ठः तत् तत् एव इतरः जनः स यत् प्रमाणं कुरुते लोकः तत् अनुवर्तते। अर्थात श्रेष्ठ पुरुष जो आचरण करता है वही अन्य लोग अनुसरण करते हैं। बंकिम चंद्र कहते हैं कि राष्ट्र निर्माण में ऐसे श्रेष्ठ पुरुष चाहिए जो धर्म के अनुशीलन द्वारा अपनी क्षमताओं को विकसित करें और पूरे समाज को प्रेरित करें। यह विचार व्यक्तिगत साधना से आगे बढ़कर सामूहिक जिम्मेदारी पर जोर देता है।

बंकिम चंद्र ने कृष्ण चरित्र में भगवान कृष्ण को एक आदर्श राष्ट्र पुरुष के रूप में चित्रित किया। वे कृष्ण को इतिहास पुरुष मानते थे न कि केवल अवतार। कृष्ण ने महाभारत में धर्म की स्थापना के लिए युद्ध लड़ा परंतु वह युद्ध व्यक्तिगत नहीं था बल्कि राष्ट्र कल्याण के लिए था। बंकिम कहते हैं कि कृष्ण का जीवन अनुशीलन का उदाहरण है। उन्होंने अपनी सभी शक्तियों का उपयोग राष्ट्र की एकता और धर्म की रक्षा के लिए किया। यह दृष्टिकोण बंकिम के राष्ट्रवाद को मजबूत करता है जहां धर्म और राष्ट्र एक दूसरे के पूरक हैं।

आनंदमठ बंकिम की सबसे प्रसिद्ध रचना है जो धर्म और राष्ट्र के संबंध को जीवंत रूप से प्रस्तुत करती है। इस उपन्यास में संन्यासी ब्रिटिश शासन और अकाल के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। वे मां भारत को देवी के रूप में पूजते हैं। वंदे मातरम गीत इसी उपन्यास से लिया गया है। गीत की पंक्तियां हैं वंदे मातरम सज्जला सजला सस्य श्यामला मातरम। यह गीत राष्ट्र को मां के रूप में देखता है जो पोषण करती है रक्षा करती है। बाद की पंक्तियों में मां को दुर्गा लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में चित्रित किया गया है। बंकिम चंद्र यहां धर्म को राष्ट्रभक्ति से जोड़ते हैं। मां की पूजा राष्ट्र की सेवा है।

उपन्यास में संन्यासियों का नारा है बंधे मातरम। वे कहते हैं कि मां को मुक्त कराने के लिए सब कुछ त्यागना पड़ेगा। यहां धर्म युद्ध का रूप ले लेता है। बंकिम ने वैष्णव परंपरा को राष्ट्रवादी संघर्ष से जोड़ा। चैतन्य महाप्रभु की भक्ति को उन्होंने कर्मयोग से संयोजित किया। संन्यासी केवल ध्यान नहीं करते बल्कि तलवार उठाते हैं क्योंकि राष्ट्र की रक्षा धर्म का हिस्सा है। यह विचार प्राचीन ग्रंथों से लिया गया लगता है। महाभारत के शांति पर्व में राजधर्म की चर्चा है जहां राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा और धर्म की स्थापना है। बंकिम ने इसे आधुनिक संदर्भ में राष्ट्र के लिए लागू किया।

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प्राचीन ग्रंथों से बंकिम चंद्र ने बहुत प्रेरणा ली। अथर्ववेद में भूमि सूक्त है जहां पृथ्वी को मां कहा गया है। बंकिम चंद्र इस मंत्र को राष्ट्रभक्ति का आधार मानते थे। पृथ्वी की सेवा राष्ट्र की सेवा है। इसी प्रकार ऋग्वेद में एकता के मंत्र हैं। ऋग्वेद १०.१९१.४ में कहा गया है संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्। अर्थात एक साथ चलो एक साथ बोलो तुम्हारे मन एक हों। बंकिम ने इस एकता को राष्ट्र निर्माण का आधार बनाया। विभिन्न जातियों और सम्प्रदायों को एक सूत्र में बांधने के लिए धर्म आवश्यक है।

गीता में स्वधर्म का महत्व बार बार आता है। गीता ३.३५ में कहा गया है- स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः। अर्थात अपना धर्म मरने तक श्रेष्ठ है पराया धर्म भयंकर है। बंकिम चंद्र इसे व्यक्तिगत से राष्ट्र स्तर पर ले जाते हैं। राष्ट्र का स्वधर्म है अपनी संस्कृति और धर्म की रक्षा करना। विदेशी प्रभावों से बचकर अपनी जड़ों में लौटना ही सच्चा पथ है। उन्होंने अन्य अलौकिक दर्शन की आलोचना की। उपनिषदों में आत्मा और ब्रह्म की चर्चा है परंतु बंकिम ने कहा कि मोक्ष की खोज के साथ ही लोक कल्याण भी जरूरी है। उपनिषदों का सार गीता में है और गीता का सार कर्मयोग है।

बंकिम चंद्र के विचारों में राष्ट्र एक सजीव इकाई है। यह केवल भूगोल नहीं बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक एकता है। उन्होंने हिंदू राष्ट्रवाद की नींव रखी परंतु यह संकीर्ण नहीं था। उनका राष्ट्रवाद समावेशी था जहां सभी भारतीय धर्म की रक्षा में शामिल हों। आनंदमठ में हिंदू मुस्लिम एकता की अपील है हालांकि इतिहास के संदर्भ में कुछ आलोचनाएं भी हुईं। फिर भी उनका मुख्य संदेश था कि धर्म राष्ट्र को मजबूत बनाता है और राष्ट्र धर्म को जीवंत रखता है।

उनके विचारों का प्रभाव स्वाधीनता संग्राम पर पड़ा। वंदे मातरम गीत कांग्रेस के अधिवेशनों में गाया गया। अरविंद घोष ने बंकिम को ऋषि कहा। उन्होंने हिंदू धर्म और राष्ट्रवादी आदर्शों के बीच अद्भुत सामंजस्य स्थापित किया। बंकिम ने लिखा कि धर्म संस्कृति का सार है और उसका फल उच्चतर जीवन है। अनुशीलन द्वारा व्यक्ति राष्ट्र के लिए तैयार होता है। यह विचार आज के युवाओं के लिए प्रेरणादायक है जो डिजिटल युग में भी अपनी जड़ों को भूले नहीं।

बंकिम चंद्र ने पश्चिमी शिक्षा को पूरी तरह खारिज नहीं किया। उन्होंने उसकी अच्छाइयों को अपनाने की सलाह दी परंतु भारतीयता को सर्वोपरि रखा। उनके अनुसार सच्चा ज्ञान वह है जो धर्म और राष्ट्र दोनों को मजबूत करे। कृष्ण चरित्र में उन्होंने दिखाया कि कैसे कृष्ण ने राजनीति धर्म और युद्ध को संतुलित किया। यह आदर्श राष्ट्र पुरुष का है।

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धर्म और राष्ट्र के संबंध में बंकिम का योगदान अनुपम है। उन्होंने दिखाया कि राष्ट्रवाद बिना धार्मिक जड़ों के खोखला है। धर्म केवल मंदिर या मस्जिद तक सीमित नहीं बल्कि समाज की नैतिक नींव है। अनुशीलन का सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है क्योंकि यह व्यक्ति को पूर्ण बनाता है। प्राचीन ग्रंथों के श्लोक और मंत्र उनके विचारों में जीवंत हो उठते हैं। गीता का यदा यदा श्लोक उन्हें युग पुरुष बनाता है। वेदों का भूमि मंत्र उन्हें मातृभूमि भक्त बनाता है।

आज जब हम राष्ट्र निर्माण की बात करते हैं तो बंकिम चंद्र हमें याद दिलाते हैं कि धर्म राष्ट्र का आधार है। उनका साहित्य हमें प्रेरित करता है कि हम अपनी संस्कृति को संजोएं और राष्ट्र सेवा को धर्म मानें। उनकी लेखनी प्रवाहमय थी मानवीय थी और आज भी दिल को छूती है। बंकिम चंद्र ने साबित किया कि साहित्यकार राष्ट्र के जागरूकता का माध्यम बन सकता है। उनके विचारों में धर्म राष्ट्र को एक सूत्र में बांधता है और राष्ट्र धर्म को अर्थ प्रदान करता है।

यह विचारधारा न केवल उन्नीसवीं शताब्दी के संदर्भ में बल्कि वर्तमान समय में भी मार्गदर्शक है। हम देखते हैं कि कितने लोग अपनी जड़ों को भूलकर पश्चिमी मूल्यों में खो जाते हैं। बंकिम चंद्र कहते हैं कि वापस लौटो अपनी गीता वेद और उपनिषदों की ओर। वहां से राष्ट्र का निर्माण शुरू होगा। अनुशीलन करो अपनी क्षमताओं का विकास करो और मां भारत की सेवा करो। यह ही सच्चा धर्म है।

बंकिम चंद्र की रचनाओं में मानवीय स्पर्श है। वे केवल दार्शनिक नहीं थे बल्कि कथाकार भी थे। आनंदमठ की कहानी हमें भावुक करती है। संन्यासियों का संघर्ष हमारी अपनी लड़ाई लगता है। वंदे मातरम गाते समय हम महसूस करते हैं कि मां पुकार रही है। यह गीत प्राचीन मंत्रों की तरह शक्ति प्रदान करता है।

बंकिम चंद्र चटर्जी ने धर्म और राष्ट्र को अविभाज्य बनाया। उनके विचार आज भी हमें प्रेरित करते हैं कि हम सच्चे भारतीय बनें। धर्म की रक्षा राष्ट्र की रक्षा है और राष्ट्र की सेवा धर्म की पूर्ति है। प्राचीन ग्रंथों के श्लोक उनके लेखन में नई जान फूंकते हैं। गीता वेद और महाभारत उनके लिए जीवंत स्रोत थे। बंकिम चंद्र का यह योगदान भारतीय इतिहास में अमर है।

आचार्य ललित मुनि
लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं लोक संस्कृति के अध्येता हैं।