सूरज राही की अधूरी लेकिन अमर नाट्य-यात्रा : भूले-बिसरे कलाकार

(ब्लॉगर एवं पत्रकार )
परम्परागत लोक गीत, लोक संगीत, लोक नृत्य और लोक नाटक मानव समाज में हजारों वर्षों से प्रचलित कला-विधाएँ हैं, जो मनुष्य का मनोरंजन करती हैं और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उसे सामूहिकता में मिलजुल कर रहने का संदेश भी देती हैं। इन पारम्परिक मंचीय कला-विधाओं की जड़ें हमारी भारतीय लोक संस्कृति में बहुत गहराई से रची-बसी हैं और बहुत दूर-दूर तक फैली हुई हैं। हमारे लोक रंगमंचों में लोक नाटकों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। रंगमंच और नाटक चाहे आधुनिक हों या पारम्परिक, उनमें अगर गीत, संगीत और नृत्य का समावेश न हो तो उनकी रंगत फीकी हो जाती है। दरअसल गीत, संगीत और नृत्य किसी भी नाटक का आभूषण होते हैं। नए ज़माने में यही बात फ़िल्मों पर भी लागू होती है।
आज हम छत्तीसगढ़ी लोक रंगमंच और लोक नाटकों की बात करें। भारत के मानचित्र पर लगभग 25 साल पहले उभरे छत्तीसगढ़ राज्य में लोक रंगमंच का इतिहास सैकड़ों वर्ष पुराना है। छत्तीसगढ़ी भाषा सहित यहाँ प्रचलित विभिन्न आंचलिक बोलियों में लोक नाटकों की एक समृद्ध परम्परा है।
अगर देश की कला-संस्कृति के इतिहास में झाँकें और सरगुजा अंचल के रामगढ़ की एक पर्वतीय गुफा सीता बेंगिरा को प्राचीनतम नाट्यशाला मानकर चलें, तो छत्तीसगढ़ में रंगमंचों का इतिहास लगभग दो हजार साल पुराना माना जा सकता है, हालाँकि इस पर इतिहासकारों और पुरातत्वविदों में मतभेद है। फिर भी यह तो माना जा सकता है कि लोक नाटक यहाँ के जन-जीवन में हजारों वर्षों से रचे-बसे हैं। पहले लोक नाटकों का कोई विशेष मंच नहीं होता था। जिन दिनों बिजली नहीं थी, लाउडस्पीकर नहीं थे, गाँव की गलियों में मशाल की रोशनी में खुले आकाश के नीचे, किसी लिखित पटकथा के बिना भी हमारे लोक कलाकार अपने नाटकों का मंचन कर लेते थे।
बहुत बाद के वर्षों में सादगीपूर्ण ढंग से कहीं किसी बने-बनाए चबूतरे पर या स्टेज बनवाकर भी लोक नाटकों का मंचन होने लगा। सैकड़ों, हजारों ज्ञात, अल्पज्ञात और लगभग गुमनाम लोक-कलाकारों ने पारम्परिक छत्तीसगढ़ी रंगमंच को अपनी नाट्य-प्रतिभा से सजाया, संवारा और उसे अपार लोकप्रियता दिलाई। लेकिन कला के उपवन में, विशेष रूप से रंगमंचीय कलाओं के मनोरम बागीचे में, कुछ ऐसी भी कलियाँ होती हैं, जो खिलने से पहले ही नियति के क्रूर हाथों द्वारा तोड़ ली जाती हैं, जिनकी रंगत देश और समाज के लिए रोशनी की मीनार साबित हो सकती थी, लेकिन समय के सागर में वे असमय ही विलीन हो जाती हैं। ऐसी ही खिलती, महकती कलियों में सूरज राही भी शामिल थे। वह आंचलिक छत्तीसगढ़ी रंगमंच के क्षितिज पर तेजी से उभर रहे थे, लेकिन अफ़सोस कि वह अब सिर्फ हमारी यादों में आते-जाते रहते हैं।
क़रीब 46 साल पहले छत्तीसगढ़ के रंग-क्षितिज पर सूरज राही की नाट्य-प्रतिभा का सूरज तेजी से उभरने लगा था। उन्हीं दिनों, उम्र के तैंतीसवें पड़ाव की ओर बढ़ते हुए, एक सड़क हादसे में उन्हें अपनी ज़िंदगी का सफ़र अधूरा छोड़कर दुनिया से जाना पड़ा। उनकी कला-प्रतिभा का ‘सूरज’ अचानक डूब गया।
अफ़सोस की बात यह भी है कि उनकी कोई तस्वीर इस लेखक को बहुत खोजने या पता लगाने पर भी नहीं मिली, लेकिन जैसा कि मैंने उन्हें देखा था, स्मृतियों के आधार पर कह सकता हूँ कि वे घुँघराले काले बालों वाले, गौर वर्ण के दुबले-पतले कलाकार थे। नाट्य-प्रतिभा उन्हें अपने माता-पिता से विरासत में मिली थी।
लगभग पाँच दशक पहले महासमुंद तहसील के अंतर्गत विकासखंड मुख्यालय पिथौरा एक छोटा-सा कस्बेनुमा गाँव हुआ करता था, जहाँ एक बार देहली नेशनल ड्रामा पार्टी का आगमन हुआ था। इस व्यावसायिक नाट्य संस्था के प्रमुख कलाकारों में सूरज राही और उनके माता-पिता भी शामिल थे। सूरज राही के पिता श्री मोहम्मद यासीन और माता श्रीमती सरोजा देवी लगभग 20 वर्षों तक इस नाट्य संस्था से सम्बद्ध रहे। दोनों कुशल रंगकर्मी थे। इस प्रकार सूरज राही (पारिवारिक नाम सैय्यद मंसूर अली) की अभिनय-कला अपने माता-पिता के सानिध्य में खूब पुष्पित और पल्लवित होती चली गई।
वह एक बेहतरीन अभिनेता होने के अलावा अच्छे शायर, संगीतकार और मधुर गायक भी थे। देहली नेशनल ड्रामा पार्टी के मंच पर खेले गए हिन्दी और उर्दू के कई सामाजिक, धार्मिक और ऐतिहासिक नाटक पिथौरा क्षेत्र में काफी लोकप्रिय हुए। इनमें से कई नाटकों में सूरज राही भी एक प्रमुख किरदार हुआ करते थे। कुछ दिनों बाद यह ड्रामा पार्टी तो अगले पड़ाव के लिए चली गई, लेकिन पिथौरा की मोहक ग्रामीण आबोहवा ने इसके कुछ कलाकारों का मन मोह लिया और वे यहीं के निवासी बन गए। सूरज राही के माता-पिता भी सपरिवार यहाँ बस गए।
छत्तीसगढ़ के मध्यवर्ती इलाकों में लोक-नाटकों की एक प्रमुख और परम्परागत विधा के रूप में ‘नाचा’ का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यह मेहनतकश किसानों और मज़दूरों के मनोरंजन का एक सहज माध्यम हुआ करता था। ग्रामीण परिवेश के लोक-जीवन में रची-बसी रोचक कहानियों पर आधारित गम्मत यानी प्रहसन नाचा को सम्पूर्णता प्रदान करते थे। ग्रामीण क्षेत्रों में ‘नाचा’ का रंगमंच बहुत सादगीपूर्ण हुआ करता था। जब गाँवों में बिजली नहीं थी, तब रात में पेट्रोमैक्स (गैस बत्ती) या उससे भी पहले मशाल की रोशनी में नाचा सम्पन्न हो जाता था। इसमें दो राय नहीं कि राज्य की लोक-संस्कृति और लोक-मानस में इस नाट्य-विधा का जादू पीढ़ी-दर-पीढ़ी, लम्बे समय तक छाया रहा।
छत्तीसगढ़ी भाषा में नाचा और गम्मत, दोनों अपने दर्शकों को भरपूर मनोरंजन देते रहे हैं। सिनेमा के दौर में भी जनता में, और विशेष रूप से ग्रामीणों में, नाचा और गम्मत का सम्मोहन कम नहीं हुआ था। गणेशोत्सव और दुर्गोत्सव के सार्वजनिक कार्यक्रमों में आयोजक जनता के मनोरंजन के लिए आर्केस्ट्रा पार्टियों के साथ-साथ नाचा मण्डलियों को भी अलग-अलग तारीखों में आमंत्रित किया करते थे। उन दिनों नाचा और गम्मत के अधिकांश कलाकार (अभिनेता, गायक, वादक और नर्तक) ग्रामीण क्षेत्रों से ही आते थे। महिला पात्र की भूमिका भी पुरुष कलाकार निभाया करते थे।
गाँवों में विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक आयोजनों में नाचा मण्डलियों को आमंत्रित किया जाता था, जिनके कलाकार फ़िल्मी गानों और लोकगीतों के साथ रात-रात भर थिरकते, नाचते, गाते और गम्मत के जरिए दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करते थे। नाचा और गम्मत की यह सांस्कृतिक परम्परा किसी न किसी रूप में आज भी कायम है।
बीते कुछ दशकों में टेलीविजन चैनलों की चौतरफ़ा बाढ़ और अब इंटरनेट आधारित यूट्यूब चैनलों की भरमार होने के कारण नाचा और गम्मत के मंचन का स्वरूप काफी बदल गया है। अब तो बिजली की रंग-बिरंगी रोशनी की चकाचौंध और अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक वाद्य-यंत्रों की स्वरलहरियों के बीच नाचा के रंगमंच और अधिक भव्यता लिए हुए नज़र आते हैं। वीडियोग्राफी की सुविधा होने से नाचा मण्डलियों के मंचन की रिकॉर्डिंग भी आसानी से होने लगी है। इनमें से कई मण्डलियों के कार्यक्रम अब यूट्यूब पर भी उपलब्ध हैं। राज्य की प्रमुख नाचा मण्डलियों में महासमुंद जिले के मचेवा की नाचा मण्डली को आज भी याद किया जाता है। मण्डली की सक्रियता शायद आज भी बनी हुई है।
मचेवा के ‘नाचा’ से जुड़ गए थे सूरज राही
माता-पिता और परिवार के साथ पिथौरा में स्थायी रूप से बसने के बाद सूरज राही जल्द ही मचेवा की नाचा मण्डली से जुड़ गए। वे इस मण्डली के नाट्य निर्देशक बन गए। उनके जैसे एक मंजे हुए कलाकार की प्रतिभा और अनुभव का लाभ इस मण्डली के लोक-कलाकारों को मिला और मचेवा का नाचा प्रसिद्धि के शिखर की ओर बढ़ने लगा। नाचा में प्रचलित पारम्परिक गम्मतों (प्रहसनों) को सूरज राही ने नए ज़माने के अनुरूप कई नए विषयों से जोड़ा।
सामाजिक समस्याओं पर तैयार किए कई छत्तीसगढ़ी नाटक
छत्तीसगढ़ी लोक-नाटकों की परम्परागत धारा को उन्होंने एक नई दिशा दी। उनके निर्देशन में सामाजिक समस्याओं पर आधारित कई लोक-नाटकों का प्रभावशाली मंचन किया जाने लगा। इन लोक-नाटकों की स्क्रिप्ट वे स्वयं तैयार करते थे और उनमें गीत और संगीत का माधुर्य घोलकर दर्शकों का मन मोह लेते थे। उनके द्वारा तैयार छत्तीसगढ़ी नाटकों में ‘छोटे-बड़े मंडल’, जहाँ समाज में व्याप्त आर्थिक विषमताओं पर प्रहार करता था, वहीं ‘कोर्ट मैरिज’ में विवाह की रूढ़ मान्यताओं के खिलाफ समाज में जागृति लाने की कोशिश होती थी। लोक-नाटक ‘किसान’ में सूरज राही ने एक किसान की विधवा के जीवन-संघर्ष का जीवन्त चित्रण किया था, वहीं ‘दहीवाली’ में एक पतिव्रता नारी का अपने पथभ्रष्ट पति को सही रास्ते पर लाने की घटना का मंचन भी काफी प्रभावशाली होता था।
सूरज के निर्देशन में छत्तीसगढ़ी नाटकों को मिली अपार लोकप्रियता
मचेवा की नाचा मण्डली ने सूरज राही के निर्देशन में इन नाटकों से काफी ख्याति अर्जित की। प्रसिद्धि और लोकप्रियता का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह मण्डली प्रायः वर्ष भर कहीं न कहीं कार्यक्रमों में व्यस्त रहती थी। न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि सीमावर्ती महाराष्ट्र और ओड़िशा राज्यों में भी इसने छत्तीसगढ़ की कला और संस्कृति का गौरवशाली प्रदर्शन किया। इस्पात नगरी भिलाई में आयोजित वार्षिक लोक कला महोत्सव में भी इसे काफ़ी प्रशंसा मिली। सूरज राही ने कुछ अन्य नाचा मण्डलियों को भी अपना रचनात्मक सहयोग दिया।
शायद ही वह किसी वर्ष कभी अपने गृह-ग्राम पिथौरा में दो माह से अधिक समय लगातार रहे हों। मचेवा की नाचा मण्डली के साथ वह हमेशा सुदूर गाँवों, कस्बों और शहरों के दौरों पर रहते। वर्ष का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने छत्तीसगढ़ी लोक-नाटकों के लिए समर्पित कर दिया था। जब भी उन्हें समय मिलता, वह अपने गृह-ग्राम पिथौरा के शौकिया कलाकारों का मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन करने में सबसे आगे रहते थे। नवोदितों के लिए उनके मन में अपार स्नेह था।
नवोदित कलाकारों को देते थे प्रशिक्षण
स्थानीय किशोरों और नवयुवकों की ‘पिथौरा संगीत समिति’ की स्थापना में उनका अविस्मरणीय योगदान रहा। यहाँ ‘ताज मटका पार्टी’ की स्थापना भी उनके द्वारा की गई थी। मटकों में बँधे घुँघरुओं की रुनझुन ध्वनि गीत-ग़ज़लों और कव्वालियों की मिठास में दुगुनी वृद्धि कर देती थी। वर्ष 1977-78 में स्थापित इन दोनों संस्थाओं के शौकिया कलाकारों को सूरज ‘राही’ ने समर्पित भाव से प्रशिक्षण दिया। वे एक सुयोग्य संगीतज्ञ भी थे।
बंगाल में जन्मे, छत्तीसगढ़ में हुआ निधन
कोलकाता (बंगाल) में 4 अगस्त 1947 को नेशनल ड्रामा पार्टी के शिविर में जन्मे सूरज राही की कला-यात्रा 28 फ़रवरी 1980 को यादों के अमिट निशान छोड़कर अचानक समाप्त हो गई। नाचा का कार्यक्रम प्रस्तुत करने वह अपनी मण्डली के साथ कहीं जा रहे थे कि तभी छत्तीसगढ़ में बागबाहरा (वर्तमान जिला-महासमुंद) के पास सड़क दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल हो गए। कई दिनों तक डी. के. अस्पताल रायपुर में उनका इलाज चला, पर अंततः नियति के क्रूर हाथों ने उन्हें हमसे छीन लिया। इलाज के दौरान ही उनका निधन हो गया। मंच पर थिरकते पैर थम गए, हवाओं में गीत और संगीत का माधुर्य घोलती आवाज़ थम गई, हजारों-हजार दिलों पर छा जाने वाला अभिनेता मौत के अंधेरे में खो गया। रंग-क्षितिज पर तेजी से उभरता एक ‘सूरज’ अचानक डूब गया, छोड़कर अंधेरी रातों के लिए आँसुओं में डूबी यादों के असंख्य झिलमिलाते सितारे।
— स्वराज्य करुण
(ब्लॉगर एवं स्वतंत्र पत्रकार)

