द्वेष-धर्म के विरुद्ध प्रेम-धर्म का कालजयी घोष हिन्द स्वराज : पुस्तक चर्चा

(ब्लॉगर एवं पत्रकार )
पढ़ने-लिखने वालों के लिए यह एक छोटी, लेकिन बहुत महत्वपूर्ण और मूल्यवान किताब है, जो हमें द्वेष-धर्म की जगह प्रेम-धर्म सिखाती है। आज 30 जनवरी को अमर शहीद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर उनकी इस किताब का भी उल्लेख बहुत प्रासंगिक होगा। यह उनकी प्रसिद्ध और बहुचर्चित पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ है। अगर हृदय की गहराइयों से उनकी भावनाओं को समझना हो, अगर पढ़ने-लिखने में हमारी दिलचस्पी हो, तो हमें उनकी लगभग 117 साल पुरानी यह छोटी-सी किताब कुछ समय निकालकर जरूर पढ़नी चाहिए। गांधीजी ने यह किताब गुजराती में लिखी थी।
खुशी की बात है कि पहली बार छत्तीसगढ़ी भाषा में भी इसका अनुवाद आ चुका है। यह ‘हिन्द स्वराज’ का पहला और इकलौता छत्तीसगढ़ी अनुवाद है। इसके अनुवादक हैं राजधानी रायपुर के कंकाली पारा निवासी लक्ष्मीप्रसाद कनौजे, जिनका विगत 21 दिसम्बर 2022 को निधन हो गया। वे तत्कालीन मध्यप्रदेश सरकार के मछलीपालन विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी थे। कई दशकों की सरकारी नौकरी के दौरान उन्होंने अपने भीतर की लेखकीय प्रतिभा को किसी के भी सामने प्रकट नहीं होने दिया। सेवा-निवृत्ति के बाद सम-सामयिक विषयों पर एक स्थानीय अख़बार में ‘संपादक के नाम पत्र’ कॉलम में उनके विचार छपने लगे और बाद में, जब उनके द्वारा अनूदित पुस्तक ‘छत्तीसगढ़ी हिन्द स्वराज’ छपी, तब लगा कि उन्होंने अपने भीतर दबी साहित्यिक प्रतिभा से हम सबको आश्चर्यचकित कर दिया। छत्तीसगढ़ी अनुवाद का संयोजन और संपादन वरिष्ठ लेखक, अधिवक्ता और चिंतक कनक तिवारी ने किया है।
समुद्री जहाज पर हुआ था ‘हिन्द स्वराज’ का जन्म
यह कोई विशाल ग्रंथ नहीं है। एक छोटी-सी किताब है। आकार में छोटी होकर भी वैचारिक दृष्टि से यह महात्मा गांधी की एक महत्वपूर्ण और कालजयी रचना है। इस पुस्तक का जन्म समुद्री जहाज पर हुआ था। भारत में अंग्रेजी राज के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलनों के दौरान मोहनदास करमचंद गांधी ने 40 वर्ष की उम्र में गुजराती भाषा में यह पुस्तक समुद्री जहाज में उस वक्त लिखी थी, जब वे वर्ष 1909 में लन्दन से दक्षिण अफ्रीका जा रहे थे। उसी दरम्यान 13 नवम्बर से 22 नवम्बर के बीच उन्होंने इसे लिखा और दक्षिण अफ्रीका में अपने अख़बार ‘इंडियन ओपिनियन’ के गुजराती संस्करण में इसे प्रकाशित भी किया।
ब्रिटिश हुकूमत ने लगाया था प्रतिबंध
भारत में पहली बार गुजराती में आई इस पुस्तक पर तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने प्रतिबंध लगा दिया। बाद में हिन्दी और अंग्रेजी भाषाओं में भी इसके अनुवाद प्रकाशित हुए। अंग्रेजी अनुवाद स्वयं गांधीजी ने किया था। यह पुस्तक तत्कालीन भारतीय समाज की विभिन्न सामाजिक-आर्थिक समस्याओं पर प्रश्नोत्तर और वार्तालाप शैली में है। उन समस्याओं पर उस वक्त के जन-साधारण के मन में जो सवाल उठ सकते थे, उनकी कल्पना करके गांधीजी ने स्वयं से वे सवाल किए और स्वयं उनके उत्तर भी लिखे।
द्वेष-धर्म की जगह प्रेम-धर्म सिखाती है यह किताब
गांधीजी ने अपनी इस छोटी-सी पुस्तक के प्रारंभ में ‘हिन्द स्वराज्य के बारे में’ शीर्षक अपनी भूमिका में लिखा है—वर्ष 1909 में लन्दन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए जहाज पर हिंदुस्तानियों के हिंसावादी पंथ को और उसी विचारधारा वाले दक्षिण अफ्रीका के एक वर्ग को दिए गए जवाब के रूप में यह लिखी गई थी। उन्होंने आगे यह भी लिखा था—
“हिंसा हिन्दुस्तान के दुखों का इलाज नहीं है। मेरी राय में यह किताब ऐसी है कि वह बालक के हाथ में भी दी जा सकती है। वह द्वेष-धर्म की जगह प्रेम-धर्म सिखाती है। हिंसा की जगह आत्म-बलिदान को रखती है। पशुबल से टक्कर लेने के लिए आत्मबल को खड़ा करती है।”
ये विचार मेरे हैं भी और नहीं भी
पुस्तक की प्रस्तावना में महात्मा गांधी लिखते हैं—
“जो विचार यहाँ रखे गए हैं, वे मेरे हैं और मेरे नहीं भी हैं। वे मेरे हैं, क्योंकि उनके मुताबिक बरतने की मैं उम्मीद रखता हूँ, वे मेरी आत्मा में गढ़े-जुड़े हुए जैसे हैं। वे मेरे नहीं हैं, क्योंकि सिर्फ़ मैंने ही उन्हें सोचा हो, सो बात नहीं। कुछ किताबें पढ़ने के बाद वे बने हैं। दिल में भीतर-ही-भीतर मैं जो महसूस करता था, उसका इन किताबों ने समर्थन किया।”
काका कालेलकर के नेतृत्व में हुआ था सबसे लोकप्रिय हिन्दी अनुवाद
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वरिष्ठ लेखक और चिंतक कनक तिवारी ने ‘छत्तीसगढ़ी हिन्द स्वराज’ की प्रस्तावना में लिखा है—‘हिन्द स्वराज’ का सबसे लोकप्रिय और पुराना हिन्दी अनुवाद काका कालेलकर के नेतृत्व में अमृतलाल ठाकुरदास नानावटी ने किया, जिसे नवजीवन ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित किया गया था। विनोबा भावे की प्रेरणा से उसका मराठी अनुवाद भी उपलब्ध है। अन्य भाषाओं में ‘हिन्द स्वराज’ के अनुवाद की जानकारी नहीं मिल पाई है, यद्यपि कोशिशें की गई हैं। भारत के संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्णित सभी भाषाओं में ‘हिन्द स्वराज’ के अनुवाद की उपलब्धता संभवतया सर्वसुलभ नहीं है।
छत्तीसगढ़ी भाषा में किए गए अनुवाद में लक्ष्मीप्रसाद कनौजे ने अपनी ओर से लिखा है—
“कौनो भाषा म अनुवाद के काम ह अब्बड़ कठिन होथे। काबर के अनुवाद करत खानी शब्द के चुनाव, भाषा अऊ भावार्थ के अनुसार होना चाही। कभू-कभू शब्द के छत्तीसगढ़ी म सही समानार्थी शब्द नई मिलय, तौ वोहिच शब्द ला लिखे बर परथे, ताकि भावार्थ न बदले। गाँधीजी के हिन्दी म ‘हिन्द स्वराज’ किताब घलाव ह श्री अमृतलाल ठाकोरदास नानावटी द्वारा ऊंखर गुजराती म लिखे गे किताब के अनुवाद हवय।”
शब्द ले ज़्यादा भावार्थ ऊपर ध्यान देना चाही
अनुवादक कनौजे आगे लिखते हैं—
“अनुवाद के अनुवाद करब म कतको कोशिश करौ, मूल के भावार्थ म कुछु न कुछु फरक तो परबेच करथे। येखर बर पढ़ैया मन ला शब्द ले ज्यादा भाषा के भावना अऊ भावार्थ ऊपर ध्यान देना चाही। हिन्द स्वराज के छत्तीसगढ़ी म अनुवाद करब म मोला गांधीजी के विशाल हृदय, मानव मात्र के कल्याण बर एकदम फरी-फरी सोच, अहिंसा अऊ प्रेम के ताकत, भारतवासी मन बर शिक्षा, सेवा, चिकित्सा, व्यापार, विश्व-धर्म, विश्व-बंधुत्व अऊ सबले बड़े कुटीर उद्योग द्वारा भारतवर्ष के उत्तरोत्तर विकास के दूरगामी विचार के संगे-संग आत्मबल बढ़ाए के तरीका, नानचुक किताब म गीता के ज्ञान कस मिलिस।”
वर्ष 2009 गांधीजी की इस मूल्यवान कृति का शताब्दी वर्ष था। इस उपलक्ष्य में ‘छत्तीसगढ़ी हिन्द स्वराज’ का प्रकाशन कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, रायपुर के हिन्द स्वराज शोध पीठ द्वारा किया गया था। आवरण सहित लगभग 116 पृष्ठों की इस किताब में ‘अथ हिन्द सुराज कथा’ शीर्षक से 16 पन्नों में इसकी विषय-वस्तु पर कनक तिवारी ने छत्तीसगढ़ी भाषा में विस्तृत प्रकाश डाला है।
वे लिखते हैं—गांधीजी ह शायद अपन हाथ ले ‘हिन्द स्वराज्य’ ला ही लिखे हवय, अऊ वो हू ह मात्र दस दिन म, 13 नवम्बर ले 22 नवम्बर 1909 के बीच म, लन्दन ले दक्षिण अफ्रीका लहुटत खानी पानी के जहाज म। ये किताब ला गांधीजी ह 11 अऊ 19 दिसम्बर 1909 म दक्षिण अफ्रीका के वोखरेच अख़बार ‘इंडियन ओपिनियन’ के गुजराती संस्करण म छपवाइस। भारत म सबले पहिली गुजराती म लिखे पुस्तक के छपतेच साथ ओकर ऊपर रोक लगा दे गइस। फेर गांधी ह खुद येही किताब के अंग्रेजी म अनुवाद करिस अऊ वोला घलाव दक्षिण अफ्रीका म छपवाइस। दक्षिण अफ्रीका ले सन 1915 म हिंदुस्तान लहुटे के बाद म ‘हिन्द स्वराज्य’ ला भारत म अंग्रेजी म छपवाए गइस। फेर ओकर ऊपर रोक नई लगाए गइस।
कनक तिवारी के अनुसार—
“ये किताब ह आला-दरजा के हवय। येमा आजकल के नवा पश्चिमी सभ्यता के कड़ा आलोचना करे गे हवै। गाँधीजी ह ये किताब म सत्याग्रह अऊ अहिंसा के अलावा स्वतंत्र भारत बर सर्वधर्म समभाव, सत्याग्रह, हिन्दू-मुस्लिम एकता, शिक्षा, कानून, चिकित्सा अऊ मशीन आदि के संबंध म अपन मौलिक, विवादास्पद अऊ भविष्यमूलक विचार मन ला प्रकट करे हवंय। संपादक अऊ पाठक के बीच म वार्ता के रूप म ये किताब ह आज दुनिया के विचार-केंद्र बनत जात हवय। ‘हिन्द स्वराज्य’ के सौ ले जियादा बछर हो गे हे। येही एकठन किताब ला पढ़े से हिन्दुस्तान ल लेके संस्कृति, सभ्यता, इतिहास, राजनीति, अर्थशास्त्र अऊ भविष्य के नियम मनन म अतका गाँधी-विचार मिलथे, जेकर कौनो मुकाबला दुनिया म नईये।”
इन दिनों, जबकि पूरे देश में एक साजिश के तहत महात्मा गांधी के महत्व और सामाजिक समानता तथा सद्भावना पर आधारित उनके विचारों को ख़ारिज करने का एक सुनियोजित और विषैला प्रचार अभियान बड़े ही मनोवैज्ञानिक तरीके से चल रहा है, तब ऐसे नाज़ुक दौर में ‘हिन्द स्वराज्य’ का अनुवाद भारत के हर राज्य की स्थानीय भाषाओं में प्रकाशित किया जाना चाहिए, ताकि भारतीय समाज को दिनों-दिन फैलते जा रहे वैचारिक प्रदूषण से बचाया जा सके।
— स्वराज्य करुण
