जीवन के अर्थ ढूँढती कविता : पुस्तक-चर्चा दिलवालों का देश कहाँ?
कला मानव-जीवन की अपूर्णता में पूर्णता का अनुष्ठान है, जो रूप, रस, गंध, स्पर्श, शब्द में अभिव्यक्त होती है। संवेदित मानव-चेतना जब शिखर-यात्रा पर निकलती है, तब मनुष्य-मनुष्येतर, चेतन-अचेतन, मूर्त-अमूर्त, देश-काल की सीमा-रेखाएँ मिट-मिट जाती हैं और सामंजस्य की प्रतीति होती है—“कहियत भिन्न-न-भिन्न।” परिणामतः “रसो वै सः” की अनुभूति होने लगती है कवि-मानस को। तात्पर्य यह है कि कविता अथवा कोई भी कला वस्तुतः कवि-कलाकार की मानस-पुत्री होती है, जो ‘सत्यं शिवं सुंदरम्’ की छांदस अभिव्यक्ति से मानव-जीवन में राग-तत्व को पुष्ट करती है।
छत्तीसगढ़ के सुपरिचित कवि स्वराज्य करुण की कविता का स्थायी भाव करुणा है, जिससे मुझे अनायास ही महाकवि भवभूति के ‘उत्तररामचरितम्’ का स्मरण होता है। भवभूति ने इस कृति में “एको रसः करुण एव” कहकर करुण रस को रसराज श्रृंगार से ऊपर निरूपित किया है। सच ही है, करुणा या संवेदना कविता की जननी ही नहीं, मानवता की धात्री भी है। आदिकवि वाल्मीकि के हृदय में उद्भूत करुणा ही ‘रामायण’ रच सकी—“शोकः श्लोकत्वं गतः।”
स्वराज्य करुण के कविता-संग्रह दिलवालों का देश कहाँ में उनकी 83 कविताएँ संकलित हैं। इन कविताओं में मानवीय सरोकारों की देशज अनुभूति से प्रसूत जीवन-बोध की सहज अभिव्यक्ति है, जिनमें राग-तत्व स्वयं मनुष्य में, रिश्ते-नातों में, खेत-खलिहान में, गाँव-शहर में, पर्वत-घाटियों में, झील-झरनों में, नद-नालों में, ताल-सरोवर में, धरती-आकाश में, देश-दुनिया में अनुनादित होता है। इन रचनाओं में कवि का यथार्थ (यथा अर्थ)-बोध कहीं भी तिरोहित नहीं है, प्रत्युत विभाव, अनुभाव और संचारी भाव बनकर स्थायी भाव को परिपुष्ट करता है और श्रोता और पाठक को रसानुभूति कराता है। स्वराज्य करुण की कविता जीवन के अर्थ ढूँढती हैं।
उनकी इस पुस्तक का एक गीत प्रत्येक देशवासी में वह संकल्प जगाता है, जो “माता भूमि पुत्रोऽहम् पृथिव्याः” की उदात्त भावभूमि का स्पर्श करता है—
अँधियारे की आग बुझाने
किरणों का गंगा-जल सीचेंगे।
धरती माता के आँचल में
हरियाली की छवि खींचेंगे।
सच ही है—“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।” कवि स्वराज्य करुण लिखते हैं—
देश है अपना, धरा है अपनी,
अपना यह आकाश है।
या—
सूरज-चाँद-सितारों वाले आसमान के नीचे
मेरे देश की बाँहों में सतरंगे बाग-बगीचे।
पर्वतमालाओं से बहनेवाली नदियों का संगीत
सुनकर झूम उठे यह दुनिया मानव के श्रम-गीत।
अपने ख़ून-पसीने से जो इस धरती को सींचे,
फ़सल काटने के मौसम में नहीं रहेंगे पीछे।
जब जीवन में राग-तत्व का अभाव होता है, तभी वह “मौन कराहों और आहों का जीवित शब्दकोश” बन जाता है, “एक अजीब दास्तान” बन जाता है जीवन, “अधूरी नींव पर सपनों का मकान” लगता है। मानवीय संवेदना मर जाती है, कवि की करुणा फूट पड़ती है—
कौन सुनेगा तेरी पीड़ा, अपने में मशगूल यहाँ सब,
ओठों पर रख ले तू उँगली, मत ज़ोरों से चीख़ ज़िंदगी।
इसी तरह अपनी एक अन्य रचना में ‘करुण’ कहते हैं—
चीख़ रही है जाने कब से बेगानों के बीच ज़िंदगी,
इंसानों को ढूँढ रही है इंसानों के बीच ज़िंदगी।
गीतों का उद्भव माँ की लोरी से हुआ, जिसके मूल में संवेदना है। आधुनिकता की आँधी में गीत की क्या दशा हो गई है, ‘करुण’ के शब्दों में—
गीतों की झुक गई कमर, बूढ़ी हर आवाज़ हो गई,
सूरज का विश्वास नहीं अब, किरणें धोखेबाज़ हो गईं।
इस कविता-संग्रह की शीर्षक-रचना में कवि लिखते हैं—
सोने-चाँदी के चक्कर में चीर रहे धरती का सीना,
खेती के रिवाज़ को चाहे पल भर में गिरा दें लोग।
उनके नक़्शे में न जाने दिल वालों का देश कहाँ,
शायद असली के बदले दिल नकली लगवा दें लोग।
जो गाँव कभी अपनेपन के लिए जाना जाता था, पूरा गाँव एक परिवार होता था, सुख-दुःख में सभी साथ रहते थे, वह अब स्मृतियों में रह गया है—
भूल गए सब गाँव की दुनिया,
पनघट, पीपल, छाँव की दुनिया।
दौड़े आए दूर-दूर तक,
नहीं मिली सद्भाव की दुनिया।
स्वतंत्रता से देश में आशा की किरणें फैलीं, जिससे लोग उन्मुक्त भाव से उन्नति के आकाश में उड़ान भर सकें, परंतु—
सुनो साथियो, पंख-कटी चिड़िया का नाम है आज़ादी,
दाने-दाने को मोहताज सुबह-शाम है आज़ादी।
शिक्षा का विस्तार तो हुआ, परंतु देश में समग्र विकास का स्वप्न अधूरा रह गया। (अ) धार्मिक उन्माद तथाकथित पढ़े-लिखे लोगों में अधिक पनपने लगा। इससे व्यथित होकर कवि स्वराज्य करुण कहते हैं—
धर्म-जाति के भेद-भाव में पढ़े-लिखे भी बहक गए,
इससे तो अनपढ़ रह जाना, मित्र, बहुत ही अच्छा है।
धर्मों के नाम पर हो रहे ख़ूनी झगड़ों ने कवि-हृदय को भी आहत किया है। वे कहते हैं—
पूछ रहे हैं मंदिर-मस्जिद,
पूछ रहे हैं काशी-काबा,
रंग-बिरंगी इस दुनिया में
आख़िर कब तक ख़ून-ख़राबा।
शिक्षा संस्कार के लिए होती है, चरित्र-निर्माण के लिए होती है, परंतु संवेदनहीनता से मानवता-विरोधी गतिविधियाँ भला कैसे सिर न उठाएँ। लूट-खसोट, काला-धन, भाई-भतीजावाद, महँगाई, बेरोज़गारी, धोखेबाज़ी, रिश्वतखोरी का बोलबाला होता है—
चोर, लुटेरे, डाकू सब के सब हैं मौज-मज़े से,
काले धन का मंत्र जाप कर रहे फेर कर माला।
कोई किसी का भाई-भतीजा, कोई किसी का बेटा,
कोई किसी का जीजा है तो कोई किसी का साला।
समाचार-पत्र लोकतंत्र का चौथा स्तंभ माने जाते हैं, परंतु जहाँ केवल कुछ लोग विज्ञापनों के बल पर महान बन रहे हों, जहाँ द्रौपदी का चीरहरण हो रहा हो, बच्चों की मुस्कान ग़ायब हो, वहाँ कवि के शब्दों में—
क्या देखें, क्या पढ़ें, समाचार की बातें,
हर तरफ़ हो रहीं अत्याचार की बातें।
पर्यावरण की चिंता इस सृष्टि के जीव-जगत और वनस्पति-जगत, दोनों की चिंता है। प्रकृति तो प्रकृति है, परंतु मानव की दुष्प्रकृति ने प्रकृति को आहत कर दिया है। फलस्वरूप—
अब नज़र आती नहीं कोई चिड़िया डाल पर,
शिकारी की नज़र है, बिछे हुए जाल पर।
थम गया क्यों यहाँ पेड़ों का हिलना,
हवाओं का बहना और कलियों का खिलना।
मानव संघर्ष करके ही सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी कहलाता है। सच पूछा जाए तो ‘करुण’ के शब्दों में—
जीवन तो संघर्षों का इतिहास है,
जीतने के बाद हर अध्याय मधुमास है।
स्वराज्य करुण आश्वस्त हैं कि—
संघर्षों के पथ पर बढ़ने की अभिलाषा अजर-अमर है,
जीवन क्या है, रोटी-कपड़ा और मकान का महासमर है।
देह भले ही मिट जाए, पर मन का तो विध्वंस न होगा,
बीज अगर हों संकल्पों के, ख़त्म वृक्ष का वंश न होगा।
यदि जन्म लेना, साँसें लेना-छोड़ना, रोटी-कपड़ा-मकान आदि ही ‘जीवन’ के पर्याय होते, तो ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाएँ विकसित नहीं होतीं। न कोई संत होता, न कोई कवि होता, न कोई दार्शनिक होता, न कोई वैज्ञानिक, न कोई गायक होता, न कोई वादक या नर्तक। सारे विश्व-कोश भी आज तक जीवन को परिभाषित नहीं कर सके हैं—ऐसा है जीवन, जो उसी तरह पकड़ से छूट जाता है, जैसे मुट्ठी में से रेत। दरअसल, जीवन एक अनुभूति है, एक दृष्टि है। जैसी दृष्टि, वैसी सृष्टि।
जीवन के प्रति आस्था जगाती स्वराज्य ‘करुण’ की कविता प्रीत के छंद लिए जीवन की चाँदनी बिखेरती है और कहती है—
हमें पहुँचना है वहाँ ज़िंदगी के गीत जहाँ,
घर-आँगन घूमते हों, बाँटते प्रीत जहाँ।
संक्षेप में, स्वराज्य करुण की कविताएँ जीवन के नए-नए आयामों में अर्थ-संधान तो करती ही हैं, जीवन को एक दृष्टि भी देती हैं—सौंदर्य-दृष्टि।
—डॉ. चित्तरंजन कर
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष,
साहित्य एवं भाषा-अध्ययन शाला,
पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय,
रायपुर (छत्तीसगढ़)
पुस्तक— दिलवालों का देश कहाँ?
कविता-संग्रह, कवि—स्वराज्य करुण
प्रकाशक—सर्वप्रिय प्रकाशन, दिल्ली-रायपुर
पृष्ठ—128, मूल्य—200 रुपये
