गांधीजी का अंतिम अनशन, पचपन करोड़ और पीड़ित शरणार्थियों के घाव
अनशन और अहिंसक आंदोलन से स्वतंत्रता संग्राम में एक नया मोड़ लाने वाले गांधीजी का अंतिम अनशन स्वतंत्रता के बाद 13 जनवरी 1948 को आरंभ हुआ, जो पाँच दिन चला था। भारत में साम्प्रदायिक सद्भाव बनाने के लिये किये गये इस अनशन की कुल पाँच माँगों में दो माँगे प्रमुख थीं। एक तो दिल्ली में उन मुसलमानों के घर हिन्दू शरणार्थियों से खाली कराए जाएँ, जो पाकिस्तान चले गये थे, और दूसरा रोके गये पचपन करोड़ रुपये पाकिस्तान को जारी किये जाएँ।
भारतीय स्वतंत्रता का सूरज सामान्य नहीं था। देश विभाजन के समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले दायित्ववान अधिकारियों ने उन नागरिकों की पूरी सुरक्षा की गारंटी ली थी, जो स्वेच्छा से अपना देश बदलना चाहते हैं। लेकिन पाकिस्तान में ऐसा न हो सका। मुस्लिम लीग के सशस्त्र गार्ड स्वतंत्रता से पहले जो बलपूर्वक मतान्तरण का अभियान चला रहे थे, वह पाकिस्तान का आकार लेते ही विस्फोटक हो गया। वहाँ उन्होंने बलपूर्वक वहाँ रह रहे हिन्दू नागरिकों पर मतान्तरण करने का दबाव बनाया। जो नहीं माने, उनके साथ बर्बर हिंसक घटनाएँ घटीं। लाखों रोते-बिलखते, लुटे-पिटे लोग किसी प्रकार भारत पहुँचे। पंजाब से लेकर दिल्ली तक देश शरणार्थियों से पट गया था। अकेली दिल्ली में लाखों शरणार्थी थे।
इधर दिल्ली में हजारों की संख्या में मुस्लिम नागरिक स्वेच्छा से चले गये थे। कुछ तो अपने मकान बेच गये थे और कुछ ताला लगाकर गये थे, और कुछ परिवारों में आधे लोग गये और आधे संपत्ति के कारण रह गये थे। इससे बाद साम्प्रदायिक हिंसा और तनाव में पूरा वातावरण डूब गया था।
स्वतंत्रता के समय गांधीजी दिल्ली में नहीं थे। वे 9 सितम्बर 1947 को दिल्ली आये और बिरला हाउस में ठहरे। पाकिस्तान से आने वाली हिंसा की खबरों की प्रतिक्रिया कुछ दिल्ली में भी होने लगी। उधर पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्जा करने का कुचक्र आरंभ कर दिया, वहाँ भी हिंसा आरंभ हो गई। यह अफवाह भी फैलाई गई कि कश्मीर पर पाकिस्तान का अधिकार होने वाला है। इससे कश्मीर के हिन्दुओं में भय उत्पन्न हुआ और दिल्ली आने वाले शरणार्थियों में कश्मीर के भी लोग आने लगे।
जिस प्रकार पाकिस्तान ने कश्मीर पर अधिकार करने का कुचक्र किया, इसे विभाजन की शर्तों का उल्लंघन माना गया और भारत सरकार ने समझौते के अनुरूप पाकिस्तान को दिये जाने वाले पचपन करोड़ की राशि रोक ली। इधर मुस्लिम समाज के जो लोग पाकिस्तान चले गये थे, उनके खाली पड़े मकानों पर शरणार्थियों को बसाने का काम भी आरंभ हो गया। ये दोनों बातें गांधीजी को पसंद नहीं आईं।
वस्तुतः गांधीजी पहले भारत विभाजन के पक्ष में नहीं थे और जब हुआ, तब उनका मानना था कि व्यक्ति स्वेच्छा से आये-जाये, किसी पर किसी प्रकार की कोई रोक-टोक न हो, इंसानियत के नाते सब मिल-जुलकर रहें। किन्तु पाकिस्तान और मुस्लिम लीग ने ऊपर से तो यह कहा, पर उनके भीतर कितनी कुटिलता थी, यह बात विभाजन की भूमिका बनाने के लिये अगस्त 1946 में डायरेक्ट एक्शन और विभाजन के बाद की साम्प्रदायिक हिंसा से बहुत स्पष्ट थी। पर गांधीजी अपने मानवीय सिद्धांत पर अडिग रहे।
वे चाहते थे कि जिन खाली पड़ी मस्जिदों को शरणार्थी कैंप बनाये गये हैं, उन्हें खाली किया जाए। मुसलमानों के जिन खाली पड़े मकानों पर शरणार्थियों ने कब्जा कर लिया है, उनसे खाली कराया जाए और समाज व सरकार मिलकर यह प्रबंध करे कि मुस्लिम समाज के लोग निर्भय होकर रह सकें तथा जो लोग एक बार पाकिस्तान चले गये थे, वे यदि लौटकर आ रहे हैं तो उन्हें बेरोकटोक रहने दिया जाए।
गांधीजी ने अपनी बातें सरकार तक पहुँचाईं और जब बात नहीं बनी तो अनशन की घोषणा कर दी। गांधीजी का यह आमरण अनशन 13 जनवरी 1948 को प्रातः 11:55 बजे आरंभ हुआ। गांधीजी की बातों को सरकार तक पहुँचाने का काम उनके निजी सहायक प्यारेलाल जी ने किया। पहले गांधीजी को समझाने का प्रयास हुआ, किन्तु गांधीजी नहीं माने।
गांधीजी के समर्थन और विरोध में सभाएँ होने लगीं। पाकिस्तान से आये हिन्दू-सिख शरणार्थी प्रदर्शन को भी पहुँचे, लेकिन बात नहीं बनी। अंततः सरकार झुकी और गांधीजी की सभी माँगे स्वीकार कर ली गईं। यह अनशन कुल पाँच दिन चला।
पाँचवें दिन रविवार को दिन के 11 बजे कांग्रेस के अध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और मौलाना अब्दुल कलाम आजाद सहित कांग्रेस के विभिन्न नेता गांधीजी के पास आये। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी ने गांधीजी की माँगे मानने का हस्ताक्षर-युक्त पत्र सौंपा। मौलाना आजाद और जवाहरलाल नेहरू ने संतरे का रस अपने हाथों में लेकर गांधीजी को पिलाकर अनशन तुड़वाया।
यह अनशन गांधीजी के जीवन का अंतिम अनशन था। इसकी प्रतिक्रिया दोनों प्रकार से हुई। एक ओर गांधीजी के मानवीय सिद्धांतों को बल मिला और पाकिस्तान में हिन्दुओं के साथ हो रही हिंसा की जो थोड़ी-बहुत प्रतिक्रिया भारत में होने लगी थी, वह रुकी। किन्तु दूसरी ओर गांधीजी द्वारा पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने और हिन्दू शरणार्थियों से मकान खाली कराने को हिन्दू-विरोधी माना गया और यही बात अंततः उनकी हत्या का एक बड़ा कारण बनी।
