समकाल की आवाज़ : पुस्तक चर्चा
समकालीन हिन्दी कविता के सशक्त और महत्वपूर्ण रचनाकार, रंगकर्मी और नाट्य निर्देशक विजय सिंह छत्तीसगढ़ के जगदलपुर (जिला -बस्तर) के निवासी हैं। उनकी 73 अतुकांत कविताओं का संग्रह ‘समकाल की आवाज़ ‘ सीरिज की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में सामने आया है।उनकी चयनित कविताओं की यह किताब नई दिल्ली के न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन द्वारा वर्ष 2023 में प्रकाशित की गई है। पुस्तक 132 पेज की है।
इसमें सबसे पहले छपे प्रकाशकीय वक्तव्य में हिन्दी के महत्वपूर्ण कवियों के लिए शुरू किए गए ‘समकाल की आवाज़ ‘सीरिज के बारे में कहा गया है कि इसके अंतर्गत अब तक 39 लेखकों को प्रकाशित किया गया है और न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन द्वारा इसी श्रृंखला में 25 कवियों की पुस्तकें प्रकाशित की जा चुकी हैं।
यह सीरिज क्यों शुरू की गई है, इस बारे में प्रकाशक ने लिखा है -” हमारा विश्वास है कि जब भी मनुष्यता पर संकट आया, समकालीन कविताएँ मनुष्यता को बचाने के लिए सबसे पहले सामने आती हैं। इसलिए हमें कविता पर विश्वास है “। प्रकाशकीय वक्तव्य में आगे लिखा गया है –” किसी भी काल में एक साथ अनेक आवाज़ें मौज़ूद रहती हैं, लेकिन कोई जरूरी नहीं कि उनमें से हर आवाज़ ‘समकाल की आवाज़ ‘हो। समकाल की आवाज़ उसी आवाज़ को कहा जा सकता है, जो अपने समय और समाज को सही रूप में प्रतिबिम्बित करने के साथ -साथ उसे आगे की ओर ले जाती हो अर्थात आधुनिक जीवन मूल्यों की वाहक और वैज्ञानिक चेतना से लैस हो। हम ‘समकाल की आवाज़ ‘ श्रृंखला के माध्यम से साहित्य में मौज़ूद इस आवाज़ को पकड़ने और सामने लाने की एक छोटी -सी कोशिश कर रहे हैं। यह एक शुरुआत है, हम इस सिलसिले को बहुत दूर तक ले जाना चाहते हैं। ”
संग्रह में कवि विजय सिंह ने ‘आत्म परिचय ‘ के अंतर्गत अपनी साहित्यिक यात्रा की शुरुआत और यात्रा के मार्ग में आए विभिन्न पड़ावों का उल्लेख करते हुए अंत में लिखा है -मैं बस्तर से हूँ। बस्तर से मेरा जीवन है। बस्तर के जनजीवन को लगातार अपनी कविताओं से छूने की कोशिश में लगा हूँ। ”
अब आते हैं संग्रह में शामिल उनकी कविताओं पर। दरअसल कोई भी कवि काव्य सृजन के दौरान अपने परिवेश से अलग नहीं रह सकता। यह परिवेश स्थानीय से लेकर देश और दुनिया तक विस्तारित रहता है। एक सच्चे और अच्छे कवि की संवेदनाएँ अपने आसपास से लेकर देश और दुनिया की हर उस घटना से जुड़ती है, जो मानव जीवन के तमाम पहलुओं को प्रभावित करती है। इस नज़रिए से देखें तो विजय सिंह की कविताओं का कैनवास बहुत दूर तक फैला हुआ नज़र आता है। इन सुकोमल कविताओं में गहन मानवीय संवेदनाओं का संसार रचा-बसा है।
संग्रह में शामिल विजय की कविताओं में बस्तर के ग्रामीण जन जीवन की और वहाँ के सुख -दुःख की, जन भावनाओं की मर्म स्पर्शी अभिव्यक्ति है। जैसे कविता ‘दूध नदी ‘ को लीजिए।इंद्रावती की तरह यह नदी भी बस्तर की जीवन रेखा है, जो गढ़िया पहाड़ और उसके नज़दीक खड़े कांकेर शहर के मध्य में बहती है। कवि ने अपनी इस लम्बी कविता में लिखा है –
“दूध नदी की कल -कल से
मैंने कई बार
गढ़िया पहाड़ के
शिखर को छुआ है
नदी का नाम दूध नदी कैसे पड़ा?
क्या गढ़िया पहाड़ जनता है या
जानते हैं शहर के लोग?
मुझे पता है गढ़िया पहाड़ की
मुँह लगी है दूध नदी।
गढ़िया पहाड़ है तो दूध नदी है,
दूध नदी है तो शहर है।
दूध नदी को जानने वाले
लोग कहाँ गए?
वे जानते थे दूध की तरह
उफनती नदी से उनके
खेतों में आती थी हरियाली।
इसी कविता की कुछ और मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ हैं –
आज भी गढ़िया पहाड़ के
जानवर दूध की नदी के पास
आते हैं, लेकिन उल्टे पाँव
लौट जाते हैं जंगल की ओर,
दूध नदी से नहीं डरते
गढ़िया पहाड़ के जानवर
डरते हैं शहर के लोगों से,
जहाँ भीड़ है, शोर शराबा है
बंदूक की आवाज है।
दूध नदी कब से शहर में
बह रही है, यह किस हालात में है,
कोई नहीं जानता,
जबकि दूध नदी के पुल से
निकलती हैं हजार -हजार
किसम -किसम की गाड़ियाँ,
लगज़री बसें और जाने क्या -क्या?
संग्रह की कविताओं की तरह उनके शीर्षक भी संवेदनशील और सहृदय पाठकों के दिलों को छू जाते हैं। जैसे -छानी में तोरई फूल, मुहल्ले में ट्रक, समय, सुन्दर -सुन्दर अक्षर, मुहल्ले में कपास का फूल, मुहल्ले का नारियल पेड़, उनके घर भात, पहाड़ बोलता है, जंगल की हँसी, नोनी की हँसी, इंद्रावती का पुल,और भी कई शीर्षक। इनमें उनकी एक बहु चर्चित कविता ‘बंद टॉकीज ‘भी शामिल है। जगदलपुर में कवि के घर के सामने वर्षो से बंद पड़ी एक टॉकीज है, जो अब लगभग खंडहर बन चुकी है।यह भी एक लम्बी कविता है। बंद टॉकीज को लेकर कवि की भावनाएँ दूर -दूर तक उमड़ती -घुमड़ती रहती है। कवि ‘जंगल का समय’ शीर्षक अपनी कविता में कहते हैं –
“अंधेरे में जाग रहे हैं खेत
बीज के लिए आतुर मिट्टी
अभी करवट ले रही है।
पगडंडी में सुस्ता रहे हैं
पांवों के निशान। ”
एक अन्य कविता ‘जंगल जी उठता है ‘में चौंकाने वाली पंक्तियाँ देखिए –
गाँव की लड़कियों
की हँसी में जंगल है,
जंगल अब भी जंगल है यहाँ
गाँव की लड़कियाँ जानती हैं।
टुकनी मुंड में उठाए,
गाँव -खेड़ा से बाहर
जब निकलती हैं गाँव की लड़कियाँ,
टोरा, तेन्दू पत्ता, चार,
महुआ फूल बिनने तब
जंगल का जंगल जी उठता है
उनके स्वागत में।
संग्रह की सभी कविताओं में कवि के सुकोमल हृदय की भावुक अनुगूँज है। इन रचनाओं को पढ़कर मैंने यह महसूस किया है कि इनमें कवि की अनुभूतियों और कल्पनाओं का संसार समाया हुआ है।

(ब्लॉगर एवं पत्रकार )