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पं लोचन प्रसाद पाण्डेय की 125 वीं जयंती पर संगोष्ठी आयोजित

पं लोचन प्रसाद पाण्डेय की 125 वीं जयंती पर महंत घासीदास संग्रहालय रायपुर के सभागार में संगोष्ठी का आयोजन 4 जनवरी 2012 को किया गया। संगोष्ठी का शुभारंभ वरिष्ठ पुराविद डॉ विष्णुसिंह ठाकुर, संचालक नरेन्द्र शुक्ला, पुरातत्व सर्वेक्षण के रायपुर मंडल के अधीक्षक प्रवीण मिश्रा जी एवं इतिहासकार डॉ रमेन्द्रनाथ मिश्र ने दीप जला कर किया।

इस अवसर पर संचालक संस्कृति विभाग नरेन्द्र शुक्ल ने कहा कि – पाण्डेय जी का कहना था कि विदेशी विद्वानों के अनेक लेखों में भारतीय इतिहास के प्रति दुराग्रह रहा। पर कनिंघम, स्टेन कोनो, फ़्लीट, मार्शल जैसे विद्वानों के पाण्डेय जी प्रशंसक थे और कहते थे कि भारतीय इतिहास की वैज्ञानिक शोध में उन जैसे विदेशियों ने हमें मार्ग दिखाया। पाण्डेय जी मूलत: साहित्यकार थे उनका तथा उनके लघु भ्राता मुकुटधर पाण्डेय का नाम साहित्य में अमर रहेगा। लोचन प्रसाद पाण्डेय ने इतिहास के प्रति विशेष रुचि इसलिए दिखाई कि उनके अनुसार मानव संस्कृति के विकास को समझने के लिए इतिहास का ज्ञान बहुत जरुरी है।

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डॉ रमेन्द्रनाथ मिश्र ने कहा कि – लोचन प्रसाद पाण्डेय जी छत्तीसगढ इतिहास के युग पुरुष थे, उन्होने इतिहास के क्षेत्र में जो काम किया है, 100 साल के इतिहास में किसी ने नहीं किया। हिन्दुस्तान की सबसे पुरानी ऐतिहासिक संस्था “महाकोसल इतिहास परिषद” की स्थापना करके छत्तीसगढ को गौरवान्वित करने का काम किया था। उन्होने 1920 में छत्तीसगढ गौरव प्रचार मंडली की स्थापना की। छत्तीसगढ राज्य की अवधारणा को प्रगट करने में पाण्डेय जी महत्वपूर्ण योगदान है।

पुरातत्व सर्वेक्षण रायपुर मण्डल के अधीक्षक डॉ प्रवीण मिश्रा जी ने इस अवसर पर अपने उद्गार प्रगट करते हुए कहा कि – पं लोचन प्रसाद जी ने अपनी साहित्य विधा का प्रयोग इंडोलाजी में किया। संस्कृत के अध्येता होने के कारण उन्होने अपने ज्ञान का प्रयोग प्राच्य इतिहास को खंगालने में किया। अध्ययन के साथ उन्होने भावी पीढी के लिए मार्ग तैयार किया। हिन्दी में लिखने के कारण अंग्रेजी न जानने वालों लोगों तक पहुंच बनाने का कार्य किया। जनमानस तक प्राच्य इतिहास को पहुंचाने का कार्य पं लोचन प्रसाद जी ने किया। मेरे गुरु कहा करते थे कि पुरातत्व की व्याख्या बिना साहित्यिक श्रोतों के नहीं हो सकती और जब हम पं लोचन प्रसाद जी के कार्यों को देखते हैं तो पाते हैं कि उन्होने साहित्य का अध्ययन किया और उसका प्रयोग पुरातत्व की व्याख्या में किया।

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डॉ विष्णु सिंह ठाकुर ने कहा कि – पं लोचन प्रसाद पाण्डेय के कार्य अविस्मरणीय हैं। उन्होने इतिहास एवं पुरातत्व के क्षेत्र में महती कार्य किया। उनकी परम्परा को अब राहुल सिंह एवं जी एल रायकवार आगे बढा रहे हैं।

अरुण कुमार शर्मा ने पुरातत्व के अध्यन और प्रशिक्षण बल देते हुए कहा कि आज हमारे प्रदेश में पुरातत्व के अध्ययन और उत्खनन करने वालों की नितांत आवश्यकता है। स्थानीय विश्वविद्यालयों को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है।

राहुल सिंह ने पं लोचन प्रसाद पाण्डेय के विषय में संस्मरण बताए। उन्होने कहा कि पाण्डेय जी मिलने आने वालों से उनके गाँव की भौगोलिक स्थिति और उसके आस पास के विषय में चर्चा करते थे। उनसे मिलने आने वाले अगर किसी स्थान पर घुमने जाते थे तो उन्हे यह पता होता था कि पंडित जी उस स्थान के विषय में जरुर पूछेगें। इसलिए वे उस स्थान के विषय में अधिक जानकारियां जुटाते थे। वे प्रारंभिक जानकारियाँ अपने से मिलने आने वालों से ही ग्रहण करते थे और उसे अपनी डायरी में नोट कर लेते थे। ताला गाँव वे ऐसी ही जानकारी के आधार पर पैदल चल कर गए।

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जी एल रायकवार एवं प्रोफ़ेसर लक्ष्मीशंकर मिश्र ने द्वितीय सत्र में अपने विचार प्रगट किए। इस अवसर पर  बसंत वीर उपाध्याय, राहुल सिंह, जी के अवधिया, डॉ वंदना किंगरानी, ब्लॉगर ललित शर्मा, बालचंद कछवाहा, शकुंतला तरार, डॉ पंचराम सोनी, ललित पाण्डे, शम्भुनाथ यादव, प्रभात सिंह, अतुल प्रधान  सहित अन्य सुधिजन भी उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन राकेश तिवारी ने किया।

ललित शर्मा

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