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नेपाल त्रासदी, दरबार स्कवेयर व नया टूरिज्म

महीना वही, बस साल और घटनाएं बदल गई हैं। बीते वर्ष 26 अप्रेल को ही पड़ोसी मुल्क नेपाल की राजधानी काठमांडू के त्रिभुवन हवाई अड्डे पर इंडियन एयरलाइंस के विमान से उतरा था। मेरे साथ मेरी अफगानी पत्रकार मित्र फ्रेस्ता करीम व दिल्ली स्थित राष्ट्रीय चैनल की पत्रकार साथी कमला श्रीपदा भी थीं। खराब मौसम के फलन में शहर में चारों ओर अंधकार का एकक्षत्र राज था। इसे संयोग कहें या व्यस्थापक की अतिथि के प्रति अति चिंता कि यूएसए की संस्था- इंटरनेशनल सेंटर फॉर जर्नलिस्ट्स (आईसीएफजे) – ने वहां के आलीशान होटल ‘याक एंड यति’ में रहने के इंतजामात कर दिए थे, सो रात भर बिजली गुल के बाद होने वाली कोई परेशानी नहीं हुई।

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इस लेखन को लिखते वक्त, मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, काठमांडू के साथ-साथ ललितपुर व बुटवल आदि स्थानों में तम का राज पिछले चार दिनों से जारी है। बस, एक प्राकृतिक भूडोल ने प्राकृतिक सुंदरता एवं शांति के लिए तारीफ़ बटोरने वाले देश नेपाल के समूचे भूगोल को ही बदल डाला। अविश्वश्नीय, दुखद किन्तु सत्य। चाहे वो काठमांडू में पहुंचने वाले हर शैलनी के लिए एक अनिवार्य पर्यटन स्थल प्राचीन दरबार स्कवेयर हो अथवा पाटन दरबार स्थित धरहरा जैसी नौ-तल्ला इमारत, जिसे 1832 में तात्कालीन मुख्तियार भीमसेन थापा नें बनवाया था, सब आज जमीन के समतल हो गए चुके हैं।

दरअसल यह अनुमान भर ही है, हो सकता है कि सत्य के करीब भी हो, कि मुझ जैसे कई भारतीयों का नेपाल देश से पहला परिचय वहां से यहां के शहरों व छोटे कस्बों में आकर काम करने वाले दरबानों ने एवं हिंगवालों ने करवाया। मीठे बोल नेपाली जनमानस का सबसे बड़ा नैसर्गिक गुण है। यह धारणा भारत में रहने, काम करने वाले नेपाली लोगों के अलावा वहां पहुंचकर अन्य युवा साथियों से संवाद स्थापित करने के बाद और भी ठोस हुई।

आज वहां की एतिहासिक इमारतें, जिनको देखने जाना व कैमरे में सहेजना वहां पहुंचने वाले पर्यटकों की सबसे बड़ी प्राथमिकता होती थी, ढह चुकी हैं। इसका दुष्परिणाम अभी से ज्यादा आने वाले दिनों में हम सबके समक्ष होगा क्योंकि पर्यटन से ही वर्तमान में संकट से जुझ रहे प्रत्येक नेपाली के जीविकोपार्जन का सबसे बड़ा हिस्सा आता है।

काठमांडू में इस प्रलयकारी घटना के पूर्व प्रमुख टुरिज्म पशुपितनाथ के दर्शन करना, दरबार स्कवेयर में कपड़े व हस्तशिल्प की सामग्री खरीदना, बौधनाथ की परिक्रमा लगाना, थामेल में नाइट पार्टियों को एन्जॉय करना, स्वयंभूनाथ मंदिर (जिसे मन्की टेम्पल भी कहते है) की पहाड़ी पर चढ़कर समूचे शहर को अपनी आंखों व कैमरे में कैद करना व हिमालय हाइकिन्ग करना होता था। पर आज वहां भग्नावशेषों की तस्वीरें खीचकर समूचे विश्व को नेपाल की संवेदना के साथ जोड़ना नए टुरिज्म के जन्म का संकेत है। आने वाले समय में न चाहते हुए भी नेपाल की त्रासदी, गरीबी व बिछड़न का दुख इसमें शामिल हो जाएंगे।

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आज तक मृतकों का आंकड़ा 9000 की दहलीज लांघ चुका है। पशुपतिनाथ मंदिर के पीछे बागमति नदी स्थित है जिसके छोटे से घाट पर मनुष्य की मुक्ति के सारे क्रियाकर्म संपन्न होते रहे हैं। यहाँ फोटो खींचना पहले मना था किन्तु आज इंटरनेट पर सामूहिक दाहसंस्कार की असंख्य तस्वीरें देखकर मन विचलित हो उठा।

अपनी नेपाल यात्रा, जो कि मेरी उस देश की पहली यात्रा भी थी, से लौटने के बाद कई दिनों तक अफगानी पत्रकार मित्र मुर्तजा हाशिमी की बात, ”बिकास, आप इतने बगल में होकर इस खुबसुरत देश में पहली बार आए हैं!” लगातार कानों में गूंज रही थी। इस दुखद घटना के कुछ दिनों पूर्व ही तय किया था कि वापस जाऊंगा जून माह में अपने पडोसी देश। आज जब पूरा विश्व एक होकर नेपाल की मदद करने हेतु हाथ बढ़ा रहा है तो मन में बस एक सवाल उठा रहा है, “क्या मैं भी इस नए टूरिज्म में शामिल हो जाऊंगा?” शायद हां, शायद नहीं!  दरबार स्कवेयर के पगोडा शैली में निर्मित मंदिर गर यथावत होते तो शायद ये सवाल नहीं कौंधता। नेपाली जनता को सलाम…

(लेखक युवा पत्रकार हैं एवं संप्रति रायपुर से प्रकाशित एक अंग्रेजी दैनिक में कार्यरत हैं)

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– बिकास के शर्मा

 

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