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अयोध्या की वानर सेना

 

पहले भी अयोध्या आया था, तब भी देखा था, अभी भी देखा है, बदला कुछ भी नहीं है, वही विक्रम की सवारी, पहले दो-दो रुपए लेते थे अब 5-5 और 10-10 लेने लगे हैं, लिट्टी चोखा का ठेला, बिड़ला धर्मशाला के समीप होमियोपैथी के डॉक्टर की दुकान, पुलिस चौकी, जलेबी और इमरती की दुकान, सड़क पर घूमते हुए आवारा पशु, गंदगी से बजबजाती हुई नालियाँ। सरयु के तट पर फ़ैली हुई गंदगी, छतरी लगाए पाटे पर बैठे पंडे। हवा के साथ उड़ती हुई पालीथिन की खाली थैलियाँ। चिलम फ़ूंकते साधु वेषधारी असाधु। चेले-चेली मुंडते संत महंत। नगो-पत्थरों की दुकानें, सुग्गा ज्योतिषियों का पसरा, सुरमा बेचते लोग, हरी काई रची पुरानी इमारतें। लोगों का सामान लूटते बंदर। कुछ नहीं बदला है। बदलने की बजाए कुछ जुड़ा है तो एक सायबर कैफ़े,बिड़ला धर्मशाला के समीप। सायबर कैफ़े का मिलना एक ब्लॉगर के लिए सुखद रहा।
यहाँ के बंदरों की तो बात ही मत पूछिए। आँखों से काजल चुराने जैसी बात है। अगर आपका ध्यान कहीं भटका और तनिक असावधान हुए तो आपकी आँखों पर लगा चश्मा भी गायब हो सकता है। आप मुंह फ़ाड़े देखते रह जाएगें।पिछली बार जब हम राम लला के दर्शन करने जा रहे थे, तब जाली वाले गेट के पास एक बंदर ने कमलेश का एक हाथ पकड़ लिया और अपना एक हाथ उसकी पैंट की जेब में डाल दिया। मैं आगे चल रहा था, पीछे से कमलेश आवाज दे रहा था, अंकल-अंकल! मैने पीछे मुड़ कर देखा तो नजारा देखने लायक था। कमलेश के चेहरे से हवाईयाँ उड़ रही थी। बंदर ने उसे काबू में कर रखा था। मैने बंदर को घुड़की थी, मतलब उसकी बोली में समझाया तो उसने कमलेश की जेब में रखी टिकिट की फ़ोटो स्टेट कापी निकाल ली और भाग गया। एक आदमी ने प्रसाद चढाने के लिए हाथ में रखा था, उसे लेकर भाग गए। वह आदमी हड़बड़ा गया। राम लला की सुरक्षा करने के लिए सुरक्षा बल तैनात हैं। एक-एक आदमी की खाना तलाशी लेते हैं। मैटल डिटेक्टर से लेकर मैनुअली भी चेक करते हैं, साथ ही बंदर भी सुरक्षा जांच में अपनी भूमिका निभाते हैं। बची-खुची जाँच ये पूरी कर लेते हैं।
एक व्यक्ति ने कहा कि सुरक्षा बलों की ड्यूटी सरकार ने फ़ालतू ही लगा रखी है। सारी जाँच तो बंदर ही पुरी कर लेते हैं। मजाल है कोई कुछ लेकर भीतर चला जाए। एक बार कोई सायकिल पर टिफ़िन लेकर जा रहा था, बंदर ने उसका टिफ़िन छीन लिया। बंदर द्वारा टिफ़िन छीनते ही वह व्यक्ति सायकिल छोड़कर भाग गया। टिफ़िन खोलने पर उसमें से विस्फ़ोटक पदार्थ निकला। जो सुरक्षा बल नहीं पकड़ पाए, उसे बंदरों ने पकड़ लिया। रामलला का एक अघोषित अदृश्य सुरक्षा घेरा बंदरों का भी है, लगता है जिसे तोड़ पाना किसे के बस की बात नहीं। मेरे सामने ही एक महिला का पर्स ले भागे, पेड़ पर चढ कर उसे फ़ाड़ दिया और उसका सामान एक-एक करके उड़ाते रहे वह महिला सामान बिनती रही। उसके पर्स में रुपए भी थे उसे भी फ़ाड़ कर फ़ेंकते रहे। एक व्यक्ति ने भजनों की सीडी खरीदी थी, वह थोड़ा असावधान हुआ और उसके हाथ की सीडी ले उड़े। चाहे सामान उनके काम का हो या न हो व्यक्ति के असावधान होते ही हाथ मार देते हैं।
हमारे साथ की महिलाएं इन बंदरों से बहुत परेशान थी, काकी के ने आधा किलो सेव लिए थे, उसकी थैली हाथ में धरे थी कि कहीं बैठ कर खाई जाएगी। मंदिर कार्यशाला से आते हुए हम मणिराम दास की छावनी की ओर जाने वाले गली में जैसे ही मुड़े वहां 100 से अधिक बंदरों ने रास्ता घेर रखा था। महिलाएं उस रास्ते पर जाने से डर रही थी, मैने बंदरो को घुड़की दी, हाथ में ले रखी छड़ी से डराया तो पेड़ की डाल पर चढ गए, कोई मुंडेर पर बैठ गया, हम चौकन्ने होकर गली पार करने लगे। काकी ने सेव की थैली पीछे हाथ करके साड़ी में छिपा ली। पता नहीं कहां से एक छोटी सी बंदरिया आई और थैली पर झपट्टा मार कर भाग गयी। काकी देखते ही रह गयी। उसका ध्यान बड़े बंदर पर था पर कमाल छुटकी बंदरिया कर गयी। इनका गिरोह अपने इलाके में रहकर ही वारदात करता है। दुसरे के इलाके में जाने पर इनमें युद्ध भी होता है। कई बंदर तो हाथ-पैर भी गंवा चुके है। पर खाने के लिए उद्यम तो करना ही पड़ता है।
पान ठेले वाले ने बताया कि बंदरों की टोलियाँ पूरे नगर में घूमते रहती हैं। जिसका घर खुला दिखा तो पूरी सेना ही भीतर घुस कर उसे तहस नहस कर देती है। कपड़े भी बाहर सुखाना मुश्किल है। पता नहीं दुबारा मिलेगें कि नहीं। हड़काने पर काट लेते हैं, नोच लेते हैं। बंदरों ने बड़ा आतंक मचा रखा है। यही हाल फ़ैजाबाद नगर का भी है। वहाँ भी बंदरों के आतंक से लोग त्रस्त हैं। बताते हैं कि बंदरों के विरुद्ध 10 हजार शिकायत पत्र फ़ैजाबाद के डीएम के दफ़्तर में जमा हैं, इन शिकायत पत्रों से डीएम का दफ़्तर अटा पड़ा है। जिला अस्पताल में एक महीने में बंदरों द्वारा काटे जाने के सौ-दो सौ मामले आ जाते हैं। लगभग इतने ही मामले प्राईवेट अस्पतालों में जाते हैं। मंदिर-मस्जिद मुद्दे से अधिक बड़ा अयोध्या वासियों के लिए बंदरों से मुक्ति का मुद्दा है। इसके लिए जन अभियान चलाने जैसी योजना भी सामने आ रही है। बताते हैं कि इस इलाके में 20 हजार से अधिक बंदर हैं। इन्हे शहर से अलग बसाने के लिए अभ्यारण्य तैयार करने की मांग उठने लगी है।
भारत में बंदरों के साथ धार्मिक आस्था भी जुड़ी हुई है, इसलिए बंदरों को मारा नहीं जाता, कोई भी इन्हे हानि नहीं पंहुचाता, तभी बजरंग बली की यह सेना बेखौफ़ होकर नगर में लूट-पाट करते फ़िरती है। शहर के बीच-बाजार में कहीं पर भी फ़ल फ़्रूट की दुकान के पास आपको देख कर दांत किटकिटाते मिल जाएगें। स्टेशन पर लगी हुई टीन की चद्दरों पर धमाचौकड़ी करते हुए इनका दल यात्रियों को डराते-सहमाते रहता है। चलती गाड़ी के डिब्बों पर चढ कर करतब दिखाते हैं। यहाँ के निवासियों को तो बंदरों के कारनामे झेलने की आदत पड़ गयी है, पर बाहर से आने वाले दर्शनार्थियों से इनका मिलना त्रासदी पूर्ण ही है। कुछ लोगों की पेट रोजी ये बंदर ही चला रहे हैं। लोगो ने बंदरों का दाना बेचने की दुकाने खोल रखी हैं जहाँ से खरीद कर श्रद्धालु इन्हे भक्ति भाव से खिलाते हैं। पर बंदर आखिर बंदर ठहरे, अपनी आदतों से बाज नहीं आते। बंदरों को भी ब्लॉगरी मौज लेने की आदत पड़ गयी है। पहले तो चलते आदमी को छेड़ते हैं,फ़िर उसके खिसियाने पर पेड़ की डाल पर बैठ कर दांत निपोरते हुए मौज लेते हैं। यही सलाह है कि  बंदरों बच के रहें तभी सही है अन्यथा बंदर तो ………..।
ललित शर्मा

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