फ़ूंकनी चिमटा और कैस की मुहब्बत

लैला और कैस की मुहब्बत परवान चढ रही थी,दोनो अपनी मुहब्बत को अंजाम तक पहुंचाने के लिए तत्पर थे। यह तो सब जानते हैं कि लैला अमीर की बेटी थी और कैस गरीब था। जब कभी वे मिलते तो बहुत सारी बातें होती,घर गृहस्थी को लेकर। एक दिन लैला ने पूछ ही लिया कि-” अगर मिलन हो गया तो मुझे तुम्हारे घर में रहना होगा यह तो तय है,तुम्हारे घर में क्या फ़ूंकनी चिमटा है?“लैला के यह पूछते ही बात बिगड़ गयी। कैस के घर में फ़ूंकनी चिमटा नहीं था। इतने मंहगे यंत्र वह गरीब कहां से लेकर आता। यह तो अमीरों के घरों में पाए जाते थे।
लैला-मजनुं
उसने कहा कि “नहीं है? लेकिन तुम्हारे से शादी के बाद खूब कमाऊंगा और तुम्हारे लिए फ़ूंकनी चिमटा लेकर आऊंगा।” लैला ने कहा-“मुझे तुम्हारा खाना तो बनाना पड़ेगा,क्या बिना फ़ूंकनी के चुल्हा फ़ूंकते-फ़ूंकते मेरे चेहरे की वाट लग जाएगी ,सारा मेकअप उतर जाएगा।बिना चिमटे के रोटियाँ तवे से उतारते हुएं मेरी उंगलियाँ नहीं जल जाएंगी?वैसे तो तुम चांद-तारे तोड़कर लाने की बातें करते हो,एक फ़ूंकनी चिमटा नहीं ला सकते?” कैस चुप हो गया,उसके पास कोई जवाब नहीं था। तत्काल इतनी मंहगी चीजों की व्यवस्था कहां से करता? फ़ूंकनी चिमटे के कारण नजदीकियाँ दूरियों में बदल गयी और कैस को लैला नहीं मिल सकी।एक फ़ूंकनी चिमटे ने बरसों की गहरी मुहब्बत को ठिकाने लगा दिया।
फ़ूंकनियाँ ही फ़ूंकनियाँ
उस जमाने में चिमटा और फ़ूंकनी चुल्हे-चौके के महत्वपूर्ण यंत्र होते थे। हर गृहस्थ चाहता था कि उसके चौके में ये दोनो चीजें हों। ऐसे ही एक मुहब्बत और ठिकाने लग गयी। गोपाल दास”नीरज”ने लिखा है कि-“फ़िर भी मेरे स्वप्न मर गए अविवाहित केवल इस कारण। मेरे पास सिर्फ़ कुंकुम था,कंगन पानीदार नहीं था।”आज जितना महत्व पानीदार कंगन का है उतना ही महत्व लैला और कैस की मुहब्बत के जमाने में फ़ूंकनी और चिमटे का था। मुहब्बत में कोई कमी नहीं थी,लेकिन वर्तमान की आवश्यक्ताएं आड़े आ गयी। जनम जनम के प्रीत की वाट लग गयी।
चिमटा-हमीद का हथियार
वैसे आज भी मुहब्बत के सामने कुछ प्राथमिकताएं अनिवार्य हो गयी हैं। प्रेम करने के लिए कुछ अहर्ताएं है जिनका होना निहायत ही जरुरी है तभी आप प्रेम करने के अधिकारी हो सकते हैं। मसलन प्रेमिका को घुमाने के लिए एक अदद गाड़ी(बाईक या कार),एक मोबाईल और एक एटीएम कार्ड या क्रेडिट कार्ड का होना जरुरी है। अगर किसी के पास ये तीनों चीजें नहीं है तो प्रेमाधिकारी नहीं हो सकता। बस दो दिन बाद जब हकीकत पता चलेगी तो चिड़िया उड़कर उसके पास बैठी हुई नजर आएगी जिसके पास यह तीनों सुविधाएं होंगी।
हमीद और अम्मा
कितनी महत्वपूर्ण हैं फ़ूंकनी और चिमटे जैसी चीजें,गृहस्थी इनसे से ही चलती है,सिर्फ़ कोरी मुहब्बत से नहीं से। मुंशी प्रेमचंद भी अपनी कहानी में लिख़ते हैं कि हमीद मेले में से चिमटा ही खरीद कर लाया। क्या मेले में अन्य चीजें नहीं मिलती थी?लेकिन हमीद को जमाने के साथ चलना था। वह दूर तक सोचता था,बहुत आगे तक की सोचता था। चिमटा खरीद कर उसने मुहब्बत करने के लिए जरुरी सामान का इंतजाम कर लिया था। दादी के लिए चिमटा खरीद लाया था,क्योंकि खाना बनाते वक्त उसकी उंगलियाँ जल जाती थी। फ़ूंकनी उसके घर में पहले से मौजूद होगी।मुहब्बत को बचाने के दोनो सामान इकट्ठे करके उसने अपनी दूर दृष्टि का परि्चय दिया था। चिमटा लाने से दादी भी खु्श और होने वाली बीबी भी खुश,एक तीर से दो शिकार किए हमीद ने। अब वह मुहब्बत करने के लिए अहर्ताएं पूरी करके तैयार था। नहीं तो उसकी मुहब्बत का भी हाल लैला और कैस जैसे ही हो जाता। अब गर्व से महबूबा से कह सकता था कि-“मेरे पास चिमटा है,फ़ूंकनी है और दादीमाँ भी है।”उम्मीद तो है कि जब वह जवान हुआ होगा तो उसे अन्य प्रेमियों जैसे तकलीफ़ नहीं उठानी पड़ी होगी।फ़ूंकनी-चिमटे होने की खबर सुनकर कई उस पर मर मिटी होगीं।
आशिक की शादी
कई माँए चुल्हा फ़ूंक-फ़ूंक कर सोचती रही होगीं कि कब उसका बेटा जवान हो और कब उसकी शादी करें?कितने बरसों तक फ़ूंकनी और चिमटे के बिना चुल्हा फ़ूंकना पड़ेगा और धुंए से अपना मुंह काला करना पड़ेगा। कई तो भगवान से कहती होगीं कि-“हे भगवान! मेरे बेटे को जल्दी से बड़ा कर दे कि मैं बहु ले आऊँ,अब मेरे से चौंके चुल्हे का काम नहीं होता है।” माँ को बेटा जल्दी जवान इसलिए करना पड़ रहा है कि जब बहु आए तो दहेज में साथ में चिमटा-फ़ूंकनी भी लेकर आए और वह चौड़ी छाती करके गर्व से घुम-घुम कर दुश्मनों का जी जलाने के लिए गांव भर में कहती फ़िरे कि-“मेरी बहु तो चिमटा-फ़ूंकनी लेकर आई है।”लोग उसकी तरफ़ ईर्ष्या भरी निगाहों से देखें और कहें कि-“देखो जी कितनी नसीब वाली है हमीद की अम्मा,बहु भी आई और दहेज में चिमटा-फ़ूंकनी भी लेकर आई,मैं तो अपने गुल्लु की शादी भी ऐसे घर् में करुंगी जहां फ़ूंकनी और चिमटा हो। कम से कम बिना मांगे दहेज में तो मिल जाएंगे।” सुनकर माँ को अपार तृप्ति होती।
जागते रहो-चौकिदारी
फ़ूंकनी का अविष्कार चुल्हे में आग जलाने के लिए किसी जमाने में क्रांतिकारी अविष्कार रहा होगा। पहले बांस की फ़ूंकनी बनी होगी। जिससे चुल्हा फ़ूंका जाता होगा। बांस की फ़ूंकनी बार-बार जल जाती होगी तो फ़िर किसी पिता ने दहेज में अपनी लाडली बेटी के लिए स्थायी रुप से लोहे-पीतल आदि की फ़ूंकनी बनवाकर दी होगी या किसी प्रेमी से अपनी प्रेमिका की दु्ख तकलीफ़ न देखी गयी होगी,इसलिए फ़ूंकनी-चिमटे का अविष्कार हुआ होगा। जिसके घर में फ़ूंकनी चिमटा नहीं होगें उसे समाज में अपना रुतबा बढाने के लिए क्या-क्या पापड़ नहीं बेलने पड़ते होगें?बीबी की सुविधा के लिए घूस खानी पड़ती होगी,गबन करना पड़ता होगा। रोज-रोज के उलाहने एवं जली-कटी बातें सुनने की बजाए डूब मरना ही पसंद किया होगा।
लोग फ़ूंकनी-चिमटा चोरी होने से बचाने के लिए उसकी पहरेदारी करते होंगें। चौकीदार भी रात को हांक लगाता होगा कि-“जागते रहो,अपना फ़ूंकनी चिमटा बचा कर रखो।” सास भी बहु को ताने देती होगीं-“करमजली,किस भू्खे घर की पल्ले पड़ गयी,कम से कम फ़ूंकनी चिमटा तो लेकर आती।” जीवन में फ़ूंकनी चिमटे का कितना महत्वपूर्ण स्थान रहा होगा। पत्नी से जली-कटी नहीं सुननी है तो फ़ूंकनी और चिमटे का जुगाड़ करके रखें।

ललित शर्मा

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Posted by on Jan 10 2011. Filed under व्यंग्य, समाज. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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