लिखावट पर भीषण खतरा

मेरा प्रथम परिचय फ़ाउंटेन पेन से तीसरी क्लास में हुआ था। लिखने के लिए बहुत ही गजब की चीज थी यह्। इससे पहले हम पेंसिल(बरती) से स्लेट पर लिखते थे और दिन में 20 बार मिटा देते थे। कभी मन में इच्छा होती थी कि पेन से लिखें। लेकिन पेन उस जमाने में एक लक्जरी आईटम था। शीश पेंसिल मिल जाती थी,लेकिन पेन नहीं मिलता था। फ़ाउंटेन पेन से लिखने का मजा ही अलग था। साथ में स्याही की शीशी एवं एक ड्रापर भी रखना पड़ता था। टिकिया से भी स्याही बनाई जाती थी। स्याही बनाना भी एक कला ही थी। निब मोटी-पतली लिखावट के लिए अलग-अलग आती थी। लेकिन जब फ़ाउंटेन पेन नाराज हो जाता था तो सजा बिना कहे ही दे डालता था। पूरी युनिफ़ार्म खराब हो जाती थी। चुड़ियाँ घिसने पर जब वह पोंक (लीक)देता था तो उंगली और अंगुठे में स्याही का दाग भी छोड़ जाता था।
कलम-दवात
फ़ाउंटेनपेन के अविष्कार के पहले लोग कलम और दवात का इस्तेमाल करते थे। कलम सरकंडे से बनती थी,उसे तेजधार चाकू से छील कर निब जैसी बनाई जाती थी और स्याही की दवात में डूबा-डूबा कर लिखा जाता था। चित्रों में देखा है कि पहले कि विद्यार्थी और ॠषि मुनि पंख का भी उपयोग करते थे। बार बार दवात में कलम डूबा कर लिखने से कागज पर स्याही कहीं कम कहीं ज्यादा होकर फ़ैल जाती थी। होल्डर के रुप में इसका सुधार हुआ। होल्डर में निब लगी रहती थी। उसे भी दवात में डूबाकर लिखा जाता था। यह बड़ी काम की चीज थी। किसी किसी बड़े आदमी के पास पारकर का फ़ाउंटेनपेन भी उपलब्ध रहता था। लोग देखते थे कि उसे स्याही में डूबाकर लिखने की जरुरत नहीं थी। इससे अक्षर सुडौल बनते थे। लिखावट में सुधार आता था।
बॉल पेन-डॉट पेन
अमेरिका की चंद्रयान यात्रा के लिए बॉल पेन (डॉट पेन) का अविष्कार हुआ। अंतरिक्ष यात्री इसे अपने साथ ले गए थे। कुछ वर्षों के बाद अंतरिक्ष यात्रियों के हाथों से निकल कर यह पेन आम आदमी के लिए बाजार में आया। लेकिन स्कूलों में डॉट पेन से लिखने पर गुरुजी मना करते थे। कहते थे इससे लिखावट बिगड़ जाएगी और फ़ाउंटेन पेन का ही उपयोग करने को कहते थे। इसलिए हमें 8 वीं तक तो फ़ाउंटेन पेन का उपयोग करना पड़ा। जब 9 वीं कक्षा में पहुंचे तो डॉट पेन का इस्तेमाल करना प्रारंभ कर दिया और आज तक जारी है।डॉट पेन आने के बाद उसे इस्तेमाल करने में तो सहुलियत थी लेकिन लिखावट के विषय में वह मजा नहीं रहा जो फ़ाउंटेन पेन में था।
एक खत तेरे नाम
मैं जब उर्दु लिखना-पढना सीख रहा था तब बॉल पेन से लिखने में बहुत समस्या आती थी। कुछ हर्फ़ों में फ़र्क ही नहीं कर पाता था। क्योंकि कुछ हर्फ़ अपने खास घुमाव से ही पहचाने जाते हैं। तब मैंने फ़ाउंटेन पेन दुबारा खरीदा और उसकी निब को घिसकर मोटा किया। जिससे हर्फ़ों के मोड़ समझ में आएं और पढ सकुं। शायद उर्दु सीखने वाले हर तालिब को ये समस्या आती होगी। इसे लिखने का अभ्यास लगातार करना पड़ता है। अब तो बहुत दिनों से लिखने का अभ्यास छूट गया है। उर्दु लिखने के लिए फ़ाउंटेन पेन का इस्तेमाल करना ही उत्तम होता है। तभी नया लिखने पढने वाला अक्षर समझ सकता है। नहीं तो खुद लिखे और खुदा बांचे।
निब होल्डर
कलम,होल्डर और फ़ाउंटेन पेन अब तो बीते जमाने की बातें हो गए। अब तो इनके सपने बस आते हैं,वास्तविक रुप से देखने नहीं मिलते। कुछ लोगों ने अभी तक इन्हे संभाल कर रखा है। एक पुरानी यादों के रुप में। अब बहुत बड़ी समस्या लिखने को लेकर सामने आ रही है। पहले जब मैं लिखता था तो छ्पाई के अक्षरों जैसे अक्षर बनते थे। लोग कहते थे,वाह भई,तुम्हारे अक्षर तो सुंदर बनते हैं।लेकिन अब लगभग 2 साल हो गए पेन का प्रयोग किए। जब भी कुछ लिखना होता है कम्प्युटर पर लिख लिया जाता है। सिर्फ़ की बोर्ड खटखटाना पड़ता है। कुछ दिनों पहले भतीजे की शादी में मुझे कार्ड पर पेन से पता लिखना था। जब लि्खा तो देखा बहुत ही गंदी लिखावट थी। बहुत अफ़सोस हुआ और कम्प्युटर पर लिखने से होने वाले नुकसान के विषय में पता चला। अब मैं कम्प्युटर के बिना लिख ही नहीं पाता हूँ।
कम्प्युटर-उंगली से गले तक

अब तो जेब में पेन भी नहीं रहता,हमेशा रखना भूल जाता हूँ। पेन से लि्खने का अभ्यास ही अक्षरों को सुडौल एवं सुंदर बनाता है। अभ्यास छुट्ने के नुकसान के विषय में पता चल गया। कुछ दिनों बाद तो छठ्वीं कक्षा से विद्यार्थी लैपटॉप लेकर स्कूल जाएंगे। जिसमें उनकी सारी किताबें लोड रहे्गी और प्रश्न उत्तर भी उसी पर लिखे जाएंगे। कहीं ऐसा न हो आने वाली पीढी लिपि तो जाने लेकिन लिखना भूल जाए,जब टाईप करने से काम चल जाता हो तो लिखने की जरुरत ही क्या है?परीक्षाएं भी ऑनलाईन हो रही हैं। कागज-पेन का इस्तेमाल तो बहुत ही कम हो गया है। इससे स्पष्ट जाहिर होता है की लिखावट पर भी्षण खतरा मंडरा रहा है। हो सकता है कि भविष्य में लिखावट को बचाने के लिए सरकार को अभियान चलाना पड़े। यही हालात रहे तो वह दिन दूर नहीं है।
ललित शर्मा

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