बदलते गाँव में नीलाम होती अन्नपूर्णा !

स्वराज्य करुण

भांजी के   विवाह समारोह के बाद सूर्योदय से पहले भिनसारे बारात को बिदा कर थकान मिटाने के इरादे से दो दिन गाँव में रुक गया . बचपन के दिन याद आने लगे . विद्यार्थी-जीवन याद आने लगा .याद आया वह बरसाती नाला , जिसके किनारे जाम-बाड़ी के नाम से हम सबका जाना-पहचाना अमरुद का बगीचा था, जहां हर साल कार्तिक-अगहन से लेकर पौष-माघ तक जाड़े के मौसम में मीठे-स्वादिष्ट अमरुदों की मीठी महक हम सबको अनायास अपनी ओर खींच लिया करती थी . याद आ गए वे दिन जब ठण्ड के इन्हीं दिनों में इसी बरसाती नाले के सूखे रेतीले आंचल में बैठ कर हम कुछ दोस्त जाम-बाड़ी के  मीठे अमरूदों  का स्वाद लिया करते थे . याद आने लगे हरे-भरे खेत, लोक-गीतों की गुनगुनाहट के साथ हल चलाते  किसान . याद आ गयी गाँव से लगे हरे-भरे  पहाड़ के नीचे दूर तक फ़ैली खेतों की हरियाली .
दोपहर सायकल से निकला गाँव घूमने , तो लगा जैसे मैं कहीं और आ गया हूँ . जिन गलियों में बैल-गाडियां आराम से आया-जाया करती थीं , आज उनमे दो सायकल-सवार आसानी से आ-जा नहीं सकते . गलियों के आमने-सामने के घरों के लोग थोड़ा-थोड़ा चबूतरा निकाल कर गली को और संकरा करते जा रहे हैं . किसी के घर फोर-व्हीलर में शहर से कोई मेहमान आ जाए तो गाड़ी पार्किंग की कोई गुंजाइश नहीं .  सड़क के दोनों ओर पहले की तरह  किराना और मनिहारी सामान की दुकानें आज भी हैं,जहाँ पहले आसानी से पैदल घूम कर खरीदारी की जा सकती थी  ,लेकिन अब उस रास्ते पर मोबाइल फोन टेलीविजन सेट्स की भी कई दुकानें  लग चुकी हैं .कुछ बेरोजगार लड़कों ने फोटो-स्टूडियो लगा लिया है . ग्राहक अपनी सायकल-मोटर-सायकल उसी रास्ते पर खड़ी कर खरीदारी में लग जाते हैं ,तो छोटे से कस्बेनुमा इस गाँव में भी ट्राफिक-जाम का नज़ारा देखा जा सकता है .बसों की बढ़ती तादाद के लिहाज से और बढ़ते अतिक्रमण के कारण  गाँव  का बस-स्टैंड भी अब छोटा लगने लगा है. साफ़-सुथरे ,रूपहले पानी का बड़ा  तालाब भी  सिमट  कर जल- कुम्भियों से भरे डबरे में तब्दील हो रहा है. निकासी कीउचित  व्यवस्था नहीं होने के कारण घरों का गंदा पानी इसी डबरे में  डल रहा है .
बढ़ती आबादी और बढ़ते विकास के इस दौर में अब यह गाँव ‘ग्राम-पंचायत ‘से  ‘नगर-पंचायत ‘  बन गया है . फिर भी अपने आत्मीय संस्कारों और सहज-स्वभाव के चलते नगर-पंचायत में भी गाँव की आत्मा कायम है . मेरे कुछ यार-दोस्त स्थानीय चुनाव में जन-प्रतिनिधि बन कर ‘नगर-पंचायत ‘ की कमान सम्हाल रहे हैं . यह पूछने पर कि गाँव की गलियों और दुकान-बाज़ार की सड़कों से अवैध-कब्जा क्यों नहीं हटाते , उनसे जवाब मिलता है-  सब तो अपने ही लोग हैं . कोई किसी का सगा , तो कोई किसी का मुंहबोला चाचा या फिर मुंहबोला भतीजा , या नहीं तो मुंहबोला भाई है. कौन किसे और कैसे हटाए ? . तुम तो दो दिन के लिए आए हो . नौकरी के लिए शहर लौट जाओगे .हमको तो यहीं , इनके  बीच रहना है.  अवैध कब्जा हटाएंगे तो दुआ-सलाम का रिश्ता भी नहीं रह जाएगा . मुझे कोई जवाब नहीं सूझा . बरसाती नाले की तरफ गया . अब वहाँ अमरुद का बगीचा नहीं था . कुछ लोग   रेत   निकाल कर ट्रकों और  ट्रेक्टरों में भर रहे थे -बगल के शहर के किसी कोलोनाइजर को सीमेंट-कांक्रीट का जंगल खडा करने के लिए रेत की ज़रूरत थी .पहाड़ पर पेड़ कम होते साफ़ दिख रहे रहे थे.ऐसा लग रहा था मानो कोई उसके हरे-भरे नीले परिधान को बुरी तरह नोच-खसोट रहा है .पहाड़ के नीचे पत्थर तोड़ने वाली स्टोन-क्रशिंग मशीनें लग रही हैं. कल तक शान से खड़ा पहाड़ मानो भयभीत होकर काँप रहा है .
गांव के आस-पास खेतों में धान की फसल कहीं कट चुकी थी और कहीं कट रही थी . इक्का-दुक्का खेतों में आधुनिक हार्वेस्टर से कटाई चल रही थी . कुछ-कुछ बुलडोज़र की तरह दिखने  वाली यह भारी मशीन मात्र एक घंटे में फसल की कटाई कर बालियों से दाने निकाल कर बारदानों में भर देती है . अगले कुछ वर्षों में शायद फसल को खेतों से खलिहानों तक ले जाने , उसे थप्पियों में ‘खरही’ के रूप में सहेज कर रखने   वहां मिंजाई करने और फिर दानों की सफाई -छंटाई के  लिए हाथ से चलने वाली उड़ावनी मशीन के इस्तेमाल की ज़रूरत नहीं रह जाएगी . सब कुछ खेत में ही हो जाएगा .तब शायद खलिहान गैर-ज़रूरी हो जाएंगे और वहाँ कोई पक्का मकान खडा हो जाएगा . फिर खलिहानों पर कवितायेँ कौन लिखेगा ? खेत – खलिहानों की महिमा पर गीत कौन गाएगा ?
खेती तो गाँव में आज भी हो रही है , लेकिन कहीं -कहीं खेतों में बनते आधुनिक शैली के पक्के मकानों को देख कर मैंने मन ही मन खुद से पूछा – क्या  भविष्य में खेत विलुप्त हो जाएंगे ? कोई जवाब नहीं मिला !कुछ  किसानों के बेटे शहरों में पढ़ कर डॉक्टर-इंजीनियर बन गए हैं , कुछ वहाँ सरकारी-गैर-सरकारी नौकरियों में हैं . उनमे से कोई भी अब गाँव में रहना नहीं चाहता अपने  पुश्तैनी खेतों की ज़मीन पर उतरना नहीं चाहता . ऐसे में उनके माँ-बाप अपने दम पर कब तक खेती सम्हालें ?  कुछ दोस्तों ने बताया कि  राष्ट्रीय राज-मार्ग से लगे हमारे गाँव से लेकर आगे कम से कम पचास किलोमीटर तक सड़क के दोनों किनारों पर हज़ारों एकड़ खेत शहरों में रहने वाले रसूखदार लोगों ने खरीद लिए हैं . इन लोगों ने फिलहाल  ज़मीन खरीद कर रख दी है . आने वाले समय में इनमे से कोई इस पर फैक्ट्री खड़ी करेगा , या नहीं तो प्लाटिंग करके कॉलोनी बना कर  सीमेंट-कंक्रीट के बेजान जंगल उगाएगा .अब यहाँ कृषि-भूमि कई -कई लाख रूपए एकड़ में बिक रही है . शहरों से भू-माफियाओं  के दलाल आते हैं , किसानों को तरह-तरह के प्रलोभनों में फांस कर और तो और लाखों रूपए एडवांस में देकर ज़मीन की बुकिंग कर लेते हैं. फिर पंजीयक के दफ्तर में जाकर रजिस्ट्री भी करवा लेते हैं. किसान को लगता है कि कड़ी मेहनत से फसल उगा कर एक एकड़ में दस लाख रूपए कभी नहीं मिल सकते ,लेकिन यहाँ तो घर बैठे इतने रूपए मिल रहे हैं . वह भूमि बेच देता है . कोई दलाल पांच लाख रूपए एकड़ में , तो कोई दस लाख और कोई पन्द्रह लाख रूपए एकड़ के हिसाब से खेतों का सौदा करने लगता है. मुझे सुनकर लगा कि यहाँ तो अन्नपूर्णा की सरे-आम नीलामी हो रही है.ऊंचे से ऊंचे रेट में किसान अपनी अन्नपूर्णा जैसी भूमि बेचने को तत्पर है. व्यापार-व्यवसाय का अनुभव नहीं होने के कारण वह समझ नहीं पाता कि इतनी बड़ी राशि का वह क्या करे ?वह  उस रूपए से मोटर-बाईक यहाँ तक कि मोटर-कारें भी खरीद लेता है. कुछ किसान पक्के मकान बनवा लेते हैं और कुछ मुफ्तखोरों के झांसे में आकर दारू-मुर्गे में रूपए उड़ा देते हैं . होश आने पर पता लगता है कि अब तो वे भूमिहीन हो गए हैं. यह सब देख-सुनकर मै भविष्य की आशंका से सिहर उठा . मैंने अपने-आप से सवाल किया -हम अपनी संस्कृति में  धरती को  माता कहते हैं ,  खेतों को अन्नपूर्णा और  किसान को अन्नदाता .फिर अपनी माता को ही किसी सौदागर के हाथों बेचने पर आमादा क्यों हो जाते हैं ? देवी अन्नपूर्णा के प्रतीक अपने खेतों का सौदा क्यों करने लगते है . ? अन्नपूर्णा ही नीलाम होकर  बिक जाएगी ,तो खेती कौन करेगा ? अन्नदाता के पास दुनिया को देने के लिए अनाज कहाँ रह जाएगा ? तब क्या दुनिया भूखे नहीं मरेगी ?
कुछ देर के लिए अगर भौतिक दृष्टि से भी सोचें तो खेतों को हम अनाज उगाने वाली  फैक्ट्री मान सकते हैं और उसके महत्व को समझ सकते हैं .मुझे लगता है कि हमारा किसान भी एक उद्योगपति है.  किसी भी उद्योग के लिए भूमि, पूंजी और मानव -श्रम की ज़रूरत होती है .खेती के लिए भी तो इन  चीजों की ज़रूरत  होती है . फिर किसान को भी हम उद्योगपति क्यों नहीं मान सकते ? किसान जिस अनाज तैयार करने वाले उद्योग का मालिक है , वह कुदरत से प्राप्त अपनी इस सुंदर-सलौनी फैक्ट्री को शहरीकरण की भेड़-चाल में , भू-माफियाओं के बहकावे में आकर क्यों बेच रहा है ?  खेद है कि मुझे इस बार भी अपने ही इन सवालों का कोई जवाब  नहीं मिला ! एक ज़माना था ,जब  खेती को उद्योग का दर्जा देने-दिलाने की मांग सड़क से संसद तक जोर-शोर से उठा करती थी .अखबारों में लोगों के बयान छपा  करते थे. पढ़ कर लगता था कि उनका कहना जायज है. कुछ लोग तो हैं ,जो किसानों की फ़िक्र करते हैं  लेकिन आज वह आवाज़ कहाँ खो गयी ? क्या उसे उदारीकरण याने कि ‘उधारीकरण ‘ का राक्षस निगल गया ?गाँव  बदल रहा है और अन्नपूर्णा  किसी के हाथों बिक रही है . अन्नपूर्णा का बिक जाना हमारे संस्कारों का और एक सम्पूर्ण संस्कृति का बिक जाना नहीं तो और क्या है ? ऐसा क्यों हो रहा है और हम चुप क्यों हैं ? अगर आपके पास इन सवालों का कोई जवाब हो , तो ज़रूर बताएं !
स्वराज्य करुण

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Posted by on Jan 11 2011. Filed under लेख, समाज. You can follow any responses to this entry through the RSS 2.0. You can leave a response or trackback to this entry

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