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सृजनशील भारत के लिए सतत् प्रेरणा भगवान विश्वकर्मा

आचार्य ललित मुनि

भगवान विश्वकर्मा केवल एक देवता नहीं, बल्कि भारतीय चेतना में सृजन, निर्माण और श्रम की जीवंत अवधारणा हैं। माघ शुक्ल त्रयोदशी को मनाई जाने वाली विश्वकर्मा जयंती उस दृष्टि को स्मरण करने का अवसर है, जिसमें हाथ, बुद्धि और आत्मा एक साथ मिलकर सभ्यता का निर्माण करते हैं। यह दिवस हमें यह याद दिलाता है कि भारत की महानता केवल विचारों में नहीं, बल्कि उन हाथों में भी बसती है जो लकड़ी को आकार देते हैं, लोहे को तपाकर औज़ार बनाते हैं, पत्थरों को जोड़कर मंदिर गढ़ते हैं और कल्पना को मूर्त रूप देते हैं।

भारतीय परंपरा में विश्वकर्मा को सृष्टि का प्रथम शिल्पकार माना गया है। पुराणों में वे देवताओं के वास्तुकार हैं, जिन्होंने स्वर्गलोक की रचना की, इंद्र का वज्र बनाया, लंका और द्वारका जैसे नगरों की संरचना की और दिव्य अस्त्रों का निर्माण किया। परंतु विश्वकर्मा की महत्ता केवल पौराणिक कथाओं तक सीमित नहीं है। वे उस सोच का प्रतीक हैं जिसमें ज्ञान और श्रम अलग नहीं होते, जिसमें कला और विज्ञान एक-दूसरे के पूरक होते हैं, और जिसमें सृजन को पवित्र कर्म माना जाता है।

भारत की सभ्यता मूल रूप से सृजनशील रही है। सिंधु घाटी की नगर योजना, हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की जल निकासी व्यवस्था, मौर्यकालीन स्तंभ, गुप्तकालीन मंदिर, चोलों की स्थापत्य कला और मध्यकालीन कारीगरी यह प्रमाण देती है कि निर्माण भारत की आत्मा का हिस्सा रहा है। इन सभी के पीछे किसी न किसी रूप में विश्वकर्मा परंपरा की ही छाया दिखाई देती है। यह परंपरा कहती है कि निर्माण केवल उपयोग के लिए नहीं, बल्कि सौंदर्य, संतुलन और सामंजस्य के लिए भी होना चाहिए।

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विश्वकर्मा जयंती हमें श्रम की गरिमा का बोध कराती है। आधुनिक समय में अक्सर बौद्धिक श्रम को शारीरिक श्रम से ऊपर रखा जाता है, लेकिन भारतीय दृष्टि में दोनों समान रूप से पूज्य हैं। बढ़ई, लोहार, कुम्हार, शिल्पकार, इंजीनियर, तकनीशियन और कारीगर सभी आधुनिक विश्वकर्मा हैं। उनके बिना न घर बन सकता है, न पुल, न मशीन और न ही कोई औद्योगिक ढांचा। विश्वकर्मा जयंती इन सभी को सम्मान देने का दिन है, जो अपने हाथों और कौशल से समाज को आकार देते हैं।

आज जब भारत आत्मनिर्भर बनने की बात करता है, तब विश्वकर्मा दर्शन की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। आत्मनिर्भरता केवल नीतियों से नहीं आती, वह कौशल, प्रशिक्षण और सम्मान से आती है। जब तक कारीगर को उसका उचित स्थान नहीं मिलेगा, तब तक सृजनशील भारत का सपना अधूरा रहेगा। विश्वकर्मा जयंती हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि हम अपने पारंपरिक शिल्प और आधुनिक तकनीक के बीच सेतु कैसे बना सकते हैं।

भारतीय ज्ञान परंपरा में निर्माण को कभी भी प्रकृति के विरुद्ध नहीं देखा गया। विश्वकर्मा दर्शन पंचमहाभूतों के संतुलन पर आधारित है। लकड़ी, मिट्टी, पत्थर, धातु और जल का उपयोग इस प्रकार किया जाता था कि प्रकृति को क्षति न पहुंचे। आज के समय में, जब पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है, तब पारंपरिक भारतीय निर्माण पद्धतियाँ हमें टिकाऊ विकास का मार्ग दिखा सकती हैं। विश्वकर्मा जयंती इस दृष्टि से भी एक चेतना दिवस है।

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सृजनशीलता केवल भौतिक निर्माण तक सीमित नहीं है। विचारों का निर्माण, संस्थाओं का निर्माण और समाज का निर्माण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। विश्वकर्मा की भावना हमें यह सिखाती है कि हर व्यक्ति अपने क्षेत्र में सृजनकर्ता बन सकता है। शिक्षक कक्षा में भविष्य गढ़ता है, किसान खेत में अन्न उगाकर समाज को पोषित करता है, वैज्ञानिक प्रयोगशाला में नवाचार करता है और कलाकार रंगों से भावनाएँ रचता है। ये सभी सृजन के अलग-अलग रूप हैं।

विश्वकर्मा जयंती का सामाजिक संदेश भी गहरा है। यह दिवस हमें श्रम आधारित वर्गों के प्रति दृष्टिकोण बदलने की प्रेरणा देता है। जिस समाज में कारीगर को सम्मान मिलता है, वही समाज स्थायी रूप से प्रगति करता है। इतिहास गवाह है कि जिन सभ्यताओं ने अपने शिल्पकारों और तकनीशियनों को महत्व दिया, वही सभ्यताएँ दीर्घकाल तक टिक पाईं।

आज भारत युवा देश है। युवाओं के हाथों में ऊर्जा है, दिमाग में कल्पना है और दिल में कुछ नया करने की चाह है। यदि इस ऊर्जा को विश्वकर्मा दर्शन से जोड़ा जाए, तो भारत सृजन का वैश्विक केंद्र बन सकता है। स्टार्टअप, नवाचार, मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया जैसे अभियानों की आत्मा में भी यही दर्शन निहित है। आवश्यकता है कि हम इन अभियानों को केवल आर्थिक लक्ष्य न मानकर सांस्कृतिक पुनर्जागरण के रूप में देखें।

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विश्वकर्मा जयंती हमें यह भी सिखाती है कि तकनीक मानवीय होनी चाहिए। निर्माण ऐसा हो जो मनुष्य को प्रकृति से काटे नहीं, बल्कि उससे जोड़े। आधुनिक इंजीनियरिंग और पारंपरिक ज्ञान का समन्वय ही सच्चा विकास है। भारत के गांवों में आज भी ऐसी तकनीकें मौजूद हैं जो कम संसाधनों में टिकाऊ समाधान देती हैं। इन्हें पहचानना और प्रोत्साहित करना सृजनशील भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।

अंततः विश्वकर्मा जयंती केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक पर्व नहीं है, यह एक वैचारिक पर्व है। यह हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र निर्माण ईंट-पत्थर से नहीं, बल्कि सोच, श्रम और सम्मान से होता है। जब हम हर हाथ को सृजनकर्ता मानेंगे, हर कौशल को पूज्य समझेंगे और हर निर्माण को जिम्मेदारी से करेंगे, तभी भारत सच अर्थों में महान बनेगा।

माघ शुक्ल त्रयोदशी का यह पावन दिवस हमें अतीत की विरासत से जोड़ते हुए भविष्य की दिशा दिखाता है। विश्वकर्मा जयंती सृजनशील भारत के लिए प्रेरणा दिवस है, क्योंकि यह हमें सिखाती है कि निर्माण केवल वस्तुओं का नहीं, बल्कि मूल्यों का भी होना चाहिए। यही दर्शन भारत को न केवल आर्थिक रूप से सशक्त बनाएगा, बल्कि सांस्कृतिक और मानवीय रूप से भी समृद्ध करेगा।