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स्वतंत्रता संग्राम के निर्भीक क्रांतिकारी और बीबीडी बाग के अमर नायक : बिनय कृष्ण बसु

आचार्य ललित मुनि

बिनय कृष्ण बसु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रांतिकारी थे, जिन्होंने ब्रिटिश राज के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका जन्म 11 सितंबर 1908 को मुंशीगंज जिले के रोहितभोग गांव (अब बांग्लादेश) में एक मध्यमवर्गीय कायस्थ परिवार में हुआ था। उनके पिता रेबतीमोहन बसु एक इंजीनियर थे, जिससे परिवार की आर्थिक स्थिति स्थिर थी और बिनय को अच्छी शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिला।

ढाका में मैट्रिक पास करने के बाद, उन्होंने मिटफोर्ड मेडिकल स्कूल (वर्तमान सर सलीमुल्लाह मेडिकल कॉलेज) में दाखिला लिया, जहां वे चिकित्सा की पढ़ाई कर रहे थे। लेकिन 20वीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में बंगाल में फैली स्वतंत्रता की लहर ने उन्हें क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर आकर्षित किया। बिनय ने क्रांतिकारी हेमचंद्र घोष द्वारा संचालित मुक्ति संघ नामक गुप्त संगठन में शामिल होकर देश के लिए लड़ने का संकल्प लिया। यह संगठन जुगांतर पार्टी से जुड़ा था और युवाओं को ब्रिटिश दमन के खिलाफ तैयार करता था।

बिनय का जीवन उस समय की राजनीतिक उथल-पुथल से प्रभावित था। 1905 के बंगाल विभाजन ने विरोध की आग भड़काई थी, और अनुशीलन समिति तथा जुगांतर जैसे संगठनों ने सशस्त्र संघर्ष को बढ़ावा दिया। 1928 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के दौरान सुभाष चंद्र बोस ने बंगाल वॉलंटियर्स नामक संगठन की स्थापना की, जिसकी कमान मेजर सत्य गुप्ता के हाथों में थी।

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ह संगठन युवाओं को प्रशिक्षित करता था और ‘ऑपरेशन फ्रीडम’ जैसी योजनाओं के माध्यम से ब्रिटिश अधिकारियों को निशाना बनाता था। बिनय इसी संगठन से जुड़े और अपने साथियों बादल गुप्ता (जन्म 1912, पूरब शिमुलीया, ढाका) तथा दिनेश चंद्र गुप्ता (जन्म 6 दिसंबर 1911, जोशोलोंग, मुंशीगंज) के साथ मिलकर इतिहास रच दिया। बादल के चाचा धरणीनाथ गुप्ता और नागेंद्रनाथ गुप्ता 1908 के अलीपुर बम कांड में शामिल थे और अरविंदो घोष के साथ जेल गए थे, जिससे बादल को प्रेरणा मिली। दिनेश ढाका कॉलेज के छात्र थे और बंगाल वॉलंटियर्स में शामिल होकर हथियार चलाने में निपुण हो गए।

बिनय की पहली प्रमुख कार्रवाई 29 अगस्त 1930 को ढाका के मिटफोर्ड अस्पताल में हुई। उस दिन बंगाल प्रांत के पुलिस महानिरीक्षक फ्रांसिस जॉन लॉमन और ढाका के पुलिस अधीक्षक एरी हडसन नारायणगंज के बीमार जेल अधीक्षक का हाल जानने आए थे। अस्पताल परिसर में खड़े होकर बात कर रहे थे, तभी मेडिकल छात्र बिनय ने तेजी से पहुंचकर रिवॉल्वर से पांच गोलियां चलाईं। दो गोलियां लॉमन को लगीं और तीन हडसन को।

लॉमन दो दिन बाद 2 सितंबर को मर गए, जबकि हडसन बच गए। भागते हुए बिनय को एक पुलिसकर्मी ने पकड़ने की कोशिश की, लेकिन बिनय ने उसे गोली मार दी और रिवॉल्वर फेंककर दीवार फांदकर भाग निकले। ब्रिटिश सरकार ने उनकी गिरफ्तारी या जानकारी के लिए पहले 5000 रुपये और बाद में 10000 रुपये का इनाम घोषित किया, लेकिन बिनय कभी पकड़े नहीं गए। वे कोलकाता भाग गए और वहां छिपकर रहे। इस घटना ने ब्रिटिश अधिकारियों में दहशत फैला दी और क्रांतिकारियों के मनोबल को बढ़ाया।

करीब 101 दिन बाद, 8 दिसंबर 1930 को बिनय, बादल और दिनेश ने कोलकाता के डलहौजी स्क्वायर स्थित राइटर्स बिल्डिंग (तत्कालीन सचिवालय) पर हमला किया। यह इमारत ब्रिटिश प्रशासन का केंद्र थी। तीनों यूरोपीय कपड़ों में सजे-धजे पहुंचे ताकि सुरक्षा में घुस सकें। उनका लक्ष्य जेलों के आईजी कर्नल एनएस सिंपसन थे, जो राजनीतिक कैदियों को यातनाएं देने के लिए कुख्यात थे। उन्होंने सिंपसन को उनके कार्यालय में घुसकर गोली मार दी, जिसमें सिंपसन की मौके पर मौत हो गई।

अन्य अधिकारी ट्विनाइम, प्रेंटिस और नेल्सन घायल हुए। दूसरे तल की बरामदे पर हुई गोलीबारी को ‘बरामदे की लड़ाई’ कहा जाता है। घिर जाने पर बादल ने पोटेशियम साइनाइड खाकर आत्महत्या कर ली, जबकि बिनय और दिनेश ने खुद को गोली मार ली। बादल (उम्र 18) की मौके पर मौत हो गई, बिनय (उम्र 22) 13 दिसंबर 1930 को अस्पताल में शहीद हो गए। दिनेश (उम्र 19) बच गए, लेकिन ट्रायल के बाद 7 जुलाई 1931 को अलीपुर जेल में फांसी दे दी गई। इस हमले ने ब्रिटिशों को स्तब्ध कर दिया और प्रशासनिक इमारतों में सुरक्षा बढ़ा दी गई।

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इस घटना के बाद ब्रिटिश सरकार ने दमन बढ़ाया, लेकिन क्रांतिकारियों का मनोबल ऊंचा रहा। बिनय, बादल और दिनेश की शहादत ने युवाओं को प्रेरित किया और स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी। 1947 के बाद डलहौजी स्क्वायर का नाम बदलकर बीबीडी बाग (बिनय-बादल-दिनेश बाग) कर दिया गया। उनकी कहानी बंगाली साहित्य, फिल्मों (जैसे 2021 की ‘बिनय बादल दिनेश’) और स्कूली पाठ्यक्रमों में शामिल है।

अधिकांश इतिहासकार उन्हें औपनिवेशिक दमन के खिलाफ जरूरी प्रतिरोध मानते हैं। बिनय का जीवन युवा बलिदान का प्रतीक है, जहां उन्होंने चिकित्सा करियर छोड़कर राष्ट्र के लिए जीवन समर्पित किया। ये घटनाएं स्वतंत्रता संग्राम की विविधता दर्शाती हैं, जहां अहिंसा के साथ-साथ सशस्त्र प्रतिरोध भी था। बिनय की कहानी हमें याद दिलाती है कि आजादी कितने बलिदानों से मिली है। विवादास्पद होते हुए भी, उनकी बहादुरी निर्विवाद है और वे राष्ट्र के लिए कृतज्ञता के पात्र हैं।