औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध संगठित संघर्ष का प्रतीक बुधू भगत

भारत के स्वतंत्रता संग्राम की अग्नि केवल शहरों तक सीमित नहीं है। यह अग्नि पगडंडियों के माध्यम से घने जंगलों से होकर गुजरती थीं। यह उन पहाड़ियों से भी गुजरती है जहां धुंध के बीच वनवासी गांव बसे थे। वहां न बड़े किले थे, न तोपों की कतारें। वहां मिट्टी की झोपड़ियां थीं। खेत थे। जंगल थे। और था अपने हक के लिए जीने और मरने का संकल्प।
इन्हीं जंगलों ने एक ऐसे योद्धा को जन्म दिया जिसका नाम आज भी सम्मान से लिया जाता है। वह थे वीर बुधू भगत। वे किसी राजघराने में पैदा नहीं हुए थे। वे साधारण किसान परिवार से थे। पर उनका साहस असाधारण था। उन्होंने अपने समय के सबसे शक्तिशाली साम्राज्य को ललकारा। उन्होंने शोषण के सामने सिर झुकाने से इंकार कर दिया। छोटानागपुर की धरती आज भी उनके बलिदान को याद करती है।
बुधू भगत का जन्म 17 फरवरी 1792 को रांची के पास सिलागाई गांव में हुआ। वे ओरांव समुदाय से थे। उनका परिवार खेती करता था। जीवन सरल था। प्रकृति के साथ तालमेल था। जमीन सामूहिक मानी जाती थी। इसे खूंटकट्टी व्यवस्था कहा जाता था। गांव का हर परिवार खुद को उस भूमि का रक्षक समझता था। जमीन केवल आजीविका नहीं थी। वह पहचान थी। वह संस्कृति थी। वह आत्मा थी।
इसी बीच अंग्रेजी शासन ने इस क्षेत्र में अपने कदम जमा लिए। ईस्ट इंडिया कंपनी का नियंत्रण बढ़ने लगा। 1793 में स्थायी बंदोबस्त लागू किया गया। इस नीति ने सब कुछ बदल दिया। जमीन का मालिकाना हक जमींदारों को दे दिया गया। ये जमींदार अक्सर बाहरी थे। उन्हें स्थानीय परंपराओं से कोई लगाव नहीं था। उनका उद्देश्य केवल लगान वसूलना था।
धीरे धीरे वनवासियों की जमीन छीनी जाने लगी। लगान बढ़ा दिया गया। समय पर भुगतान न करने पर कठोर दंड दिए जाते। बेगारी कराई जाती। जंगलों पर रोक लगाई गई। लकड़ी काटने, शिकार करने और महुआ चुनने तक पर पाबंदी लगने लगी। महाजन कर्ज देते और फिर ऊंचा ब्याज वसूलते। कई परिवार कर्ज के जाल में फंस गए। अपमान और अत्याचार बढ़ने लगे।
बुधू भगत ने बचपन से यह सब देखा। उन्होंने अपने बुजुर्गों को चिंतित देखा। उन्होंने खेतों को छिनते देखा। उन्होंने बेगारी करते लोगों को मुफ़्त में स्वदे बहाते देखा। यह सब उनके मन में आग बनकर संग्रहित होता गया। वे शारीरिक रूप से मजबूत थे। उन्हें धनुष चलाना आता था। वे तलवार और कुल्हाड़ी चलाने में दक्ष थे। कहा जाता है कि वे रोज अभ्यास करते थे। उनका लक्ष्य अचूक था। लोग उन्हें साहसी युवक के रूप में जानते थे।
समय बीतता गया। असंतोष गहराता गया। 1820 के दशक तक हालात विस्फोटक हो चुके थे। गांवों में बैठकों का दौर शुरू हुआ। लोग आपस में चर्चा करते। वे पूछते कि क्या अपनी जमीन बचाने का कोई रास्ता नहीं है। क्या अन्याय को हमेशा सहना ही होगा। ऐसे समय में बुधू भगत आगे आए। उन्होंने लोगों को संगठित करना शुरू किया।
1831 में वह क्षण आया जब असंतोष खुलकर सामने आया। यह कोल विद्रोह के नाम से जाना गया। इसमें कोल, ओरांव, मुंडा, हो और अन्य जनजातियां शामिल थीं। बुधू भगत इसके प्रमुख नेताओं में थे। उन्होंने गांव गांव जाकर लोगों को एकजुट किया। वे कहते थे कि जमीन हमारी मां है। इसे बचाना हमारा धर्म है। उनके शब्द सीधे दिल तक पहुंचते थे।
यह विद्रोह केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं था। यह संगठित प्रयास था। लोगों ने हथियार उठाए। उनके पास आधुनिक बंदूकें नहीं थीं। उनके पास तीर थे। भाले थे। कुल्हाड़ियां थीं। पर उनमें विश्वास था। वे अपने भूगोल को जानते थे। वे जंगल की हर पगडंडी से परिचित थे। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई। वे अचानक हमला करते। फिर जंगल में गायब हो जाते।
ब्रिटिश प्रशासन चकित हो गया। कई जमींदारों के ठिकानों पर हमले हुए। अत्याचार करने वालों को दंड दिया गया। बंदी बनाए गए लोगों को मुक्त कराया गया। विद्रोह तेजी से फैलने लगा। इसे लारका विद्रोह भी कहा गया। हजारों लोग इसमें शामिल हो गए। यह केवल एक क्षेत्र का आंदोलन नहीं रहा। यह सामूहिक प्रतिरोध बन गया।
बुधू भगत केवल योद्धा नहीं थे। वे प्रेरक थे। वे लोगों को अनुशासन का महत्व समझाते। वे कहते कि लड़ाई केवल गुस्से से नहीं जीती जाती। एकता जरूरी है। संयम जरूरी है। उन्होंने विभिन्न जनजातियों के बीच संवाद स्थापित किया। उन्होंने पुरानी दुश्मनियों को भुलाने की अपील की। उनका व्यक्तित्व लोगों को भरोसा देता था।
कुछ समय तक विद्रोह ने ब्रिटिश सत्ता को अस्थिर कर दिया। प्रशासन ने इसे गंभीर खतरे के रूप में देखा। बड़ी संख्या में सैनिक भेजे गए। आधुनिक हथियारों से लैस टुकड़ियां जंगलों की ओर बढ़ीं। बुधू भगत के सिर पर इनाम रखा गया। एक हजार रुपये का इनाम घोषित हुआ। उस समय यह बहुत बड़ी राशि थी। इसका उद्देश्य लोगों में भय पैदा करना था।
लेकिन डर कम ही लोगों के मन में आया। सिलागाई और आसपास के गांवों में विद्रोहियों का मनोबल ऊंचा था। वे जानते थे कि सामने शक्तिशाली सेना है। फिर भी वे पीछे हटने को तैयार नहीं थे। 13 फरवरी 1832 को निर्णायक टकराव हुआ। ब्रिटिश सेना ने गांव को घेर लिया। गोलीबारी शुरू हुई। धुआं छा गया। अफरा तफरी मच गई।
बुधू भगत ने मोर्चा संभाला। उनके साथ उनके पुत्र हलधर और गिरधर भी थे। पिता और पुत्र साथ लड़े। तीरों की वर्षा हुई। कई सैनिक घायल हुए। पर अंग्रेजी सेना के पास बंदूकें थीं। गोलियां लगातार चल रही थीं। संख्या भी अधिक थी। संघर्ष लंबा चला। अंत में बुधू भगत वीरगति को प्राप्त हुए। उनके पुत्र भी शहीद हुए। अनेक साथी भी मारे गए।
उनकी आयु लगभग चालीस वर्ष थी। जीवन छोटा था। पर प्रभाव गहरा था। उनकी मृत्यु ने विद्रोह की ज्वाला बुझाई नहीं। बल्कि उसे और तीखा बना दिया। छोटानागपुर के गांवों में शोक था। पर साथ ही गर्व भी था। लोग कहते थे कि उन्होंने अन्याय के सामने घुटने नहीं टेके।
बुधू भगत की कहानी लिखित इतिहास से अधिक लोकस्मृति में जीवित रही। गांवों में गीत गाए गए। कथाएं सुनाई गईं। बच्चों को बताया गया कि कैसे एक साधारण किसान ने साम्राज्य को चुनौती दी। उनका नाम सम्मान के साथ लिया जाने लगा। वे वीर बुधू भगत कहलाए।
उनका संघर्ष आगे आने वाले आंदोलनों की प्रेरणा बना। 1855 में संथाल विद्रोह हुआ। 1899 में बिरसा मुंडा का उलगुलान हुआ। इन सभी आंदोलनों में भूमि और सम्मान का प्रश्न केंद्रीय था। इतिहासकार मानते हैं कि प्रारंभिक वनवासी विद्रोहों ने ब्रिटिश शासन को यह दिखा दिया था कि ग्रामीण और जनजातीय समाज भी प्रतिरोध कर सकता है। 1857 का व्यापक विद्रोह भी इसी पृष्ठभूमि में हुआ।
बुधू भगत का महत्व केवल एक घटना तक सीमित नहीं है। वे उस व्यापक संघर्ष के प्रतीक हैं जिसमें आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक दमन के खिलाफ आवाज उठाई गई। उनकी लड़ाई पर्यावरण से भी जुड़ी थी। जंगल उनके जीवन का आधार था। जब जंगल पर नियंत्रण छीना गया तो जीवन संकट में पड़ गया। आज जब हम पर्यावरण न्याय की बात करते हैं तो उनका संघर्ष प्रासंगिक लगता है।
उन्होंने दिखाया कि संगठन ही शक्ति है। उन्होंने विविध जनजातियों को एक मंच पर लाया। उन्होंने सामूहिक नेतृत्व का उदाहरण दिया। वे जानते थे कि अकेले लड़ना कठिन है। पर मिलकर लड़ना संभव है। उनकी सोच में स्वशासन की भावना थी। वे बाहरी नियंत्रण को अन्याय मानते थे।
आज झारखंड में उनकी जयंती मनाई जाती है। उनकी प्रतिमाएं स्थापित हैं। विद्यालयों और संस्थानों में उनका नाम लिया जाता है। फिर भी राष्ट्रीय स्तर पर उनका उल्लेख सीमित है। यह हमारे इतिहास लेखन की चुनौती भी है। हमें उन नायकों को सामने लाना होगा जिन्होंने दूरस्थ क्षेत्रों में संघर्ष किया।
बुधू भगत की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन नहीं है। स्वतंत्रता का अर्थ सम्मान है। अपनी भूमि पर अधिकार है। अपनी संस्कृति को जीने का अधिकार है। जब ये अधिकार छीने जाते हैं तो प्रतिरोध जन्म लेता है।
उनकी कुल्हाड़ी केवल हथियार नहीं थी। वह प्रतीक थी। वह आत्मसम्मान का प्रतीक थी। वह इस विश्वास का प्रतीक थी कि अन्याय का सामना किया जा सकता है। आज भी जब कोई आदिवासी समुदाय अपने अधिकार के लिए आवाज उठाता है तो बुधू भगत की स्मृति जीवित हो उठती है।
इतिहास का यह अध्याय हमें झकझोरता है। यह बताता है कि स्वतंत्रता संग्राम बहुस्तरीय था। इसमें किसान थे। वनवासी थे। स्त्रियां थीं। युवा थे। हर किसी ने अपनी तरह से योगदान दिया। कुछ नाम किताबों में दर्ज हुए। कुछ लोकगीतों में बचे रहे।
वीर बुधू भगत उन लोकगीतों के अमर नायक हैं। उनका जीवन छोटा था। पर उनका संदेश दीर्घकालिक है। अन्याय के सामने चुप मत रहो। संगठित रहो। अपने अधिकार के लिए खड़े रहो। यही उनकी विरासत है। यही उनका इतिहास है। यही उनकी अमरता है।
