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भारतीय संस्कृति में जल स्रोतों का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व

आचार्य ललित मुनि

मानव सभ्यता के इतिहास में यदि किसी एक तत्व को जीवन का पर्याय कहा गया है, तो वह जल है। आज भी जब कोई प्राणी चेतना खोता है तो सबसे पहले उस पर जल का छिड़काव किया जाता है, इसलिए जल को अमृत कहा जाता है। पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति से लेकर मानव संस्कृति के विकास तक जल ने निरंतर पोषण, संरक्षण और संतुलन का कार्य किया है। विश्व की जितनी भी सभ्यताएं हैं सभी जल के निकट ही जन्मी और विकसित भी हुई। भारतीय परंपरा में जल केवल भौतिक संसाधन नहीं, बल्कि आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक चेतना का आधार माना गया है। इसी कारण वेदों से लेकर पुराणों तक जल को ‘आप:’, ‘जीवनदायिनी’ और ‘पावन शक्ति’ के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

विश्व जल दिवस (22 मार्च) के अवसर पर जब संपूर्ण विश्व जल संकट, प्रदूषण और संसाधनों के क्षरण जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, इस का प्रमुख कारण अपनी प्राचीन संस्कृति से विमुख होना है,  तब भारतीय ज्ञान परंपरा हमें स्मरण कराती है कि जल संरक्षण केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक उत्तरदायित्व भी है। ऋग्वेद के ‘आपः सूक्त’ से लेकर पुराणों की गंगा-यमुना कथाओं तक, हमारे ग्रंथ जल को माता, औषधि, शक्ति और मोक्षदायिनी मानते रहे हैं।

“आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन । महे रणाय चक्षसे ॥” (ऋग्वेद १०.९.१)

यह श्लोक 22 मार्च जल दिवस पर हमें याद दिलाता है कि जल केवल पेय पदार्थ नहीं, बल्कि जीवन का आधार, शक्ति का स्रोत और दिव्य शक्ति है। भारतीय संस्कृति में जल को ‘अपः’ कहा गया है, जो पंच महाभूतों में सबसे महत्वपूर्ण है। वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में जल को माता, पवित्रकर्ता और सृष्टि का मूल माना गया है। आज जल दिवस पर जब विश्व जल संकट से जूझ रहा है, तब हमारी प्राचीन विरासत हमें सिखाती है कि जल संरक्षण ही सभ्यता की रक्षा है। वेदों में जल को सर्वोपरि माना गया है। ऋग्वेद का प्रसिद्ध ‘आपः सूक्त’ (ऋग्वेद १०.९) जल की महिमा गाता है। यह सूक्त जल को जीवनदायिनी, औषधि रूपी और पवित्र करने वाली शक्ति बताता है। आइए कुछ प्रमुख मंत्रों पर दृष्टिपात करते हैं:-

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आपो हि ष्ठा मयोभुवस्था न ऊर्जे दधातन । महे रणाय चक्षसे ॥ (१)

अर्थात हे जल! तुम सुख के स्रोत हो, हमें ऊर्जा दो और हमें महान दर्शन (या आनंद) प्रदान करो।

इस श्लोक में जल को ‘मयोभुवः’ (सुख का स्रोत) कहा गया है। वैदिक ऋषि समझते थे कि जल के बिना वातावरण शुष्क हो जाता है, पेड़-पौधे सूख जाते हैं और जीवन रुक जाता है। जल वायुमंडल को तरोताजा बनाता है।

यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः । उशतीरिव मातरः ॥ (२)

अर्थात हे जल! तुम्हारा जो सबसे मंगलकारी रस है, उसे हमें दो, ठीक वैसे जैसे माता अपने बच्चों को अपना सर्वश्रेष्ठ देती है।

यहाँ जल को मातृरूप में देखा गया है। भारतीय संस्कृति में नदियों को ‘माँ’ कहना इसी वैदिक भावना से आया है।

शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये । शं योरभि स्रवन्तु नः ॥ (४)

अर्थात हे दिव्य जल! पीने के लिए हमें कल्याण दो और हमारे लिए सुखदायक होकर बहो।

यह श्लोक जल को पीने योग्य और औषधि रूप बताता है। वैदिक काल में जल को केवल पेय नहीं, बल्कि रोग निवारक माना जाता था। सूक्त के आगे के श्लोकों में जल को ‘भेषजम्’ (औषधि) कहा गया है:

अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा । अग्नि च विश्वशंभुवम् ॥ (६)

अर्थात जल में सोम ने कहा कि विश्व की सारी औषधियाँ और अग्नि (ऊर्जा) विद्यमान हैं।

इससे स्पष्ट है कि जल न केवल शरीर को पोषण देता है, बल्कि उसमें अग्नि तत्व भी है जो स्वास्थ्य प्रदान करता है। आपः सूक्त का अंतिम श्लोक जल को पाप नाशक बताता है:

इदमापः प्र वहत यत्किं च दुरितं मयि । यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वा शेप उतानृतम् ॥ (८)

 अर्थात हे जल! मेरे अंदर जो भी दुराचार, छल या असत्य है, उसे बहा लो।

वैदिक संस्कृति में स्नान को पवित्र करने वाला कर्म माना गया। यजुर्वेद और अथर्ववेद में भी जल को ‘वरुण’ देवता का क्षेत्र बताया गया है। वरुण जल के अधिष्ठाता देव हैं। अथर्ववेद में एक मंत्र है: “आपः शान्तिः” – जल शांति का स्रोत है।

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ऋग्वेद का ‘नदी सूक्त’ (ऋग्वेद १०.७५) जल के भौतिक स्रोतों  नदियों की महिमा गाता है। इसमें गंगा, यमुना, सरस्वती, शतुद्री (सतलज), परुष्णी (रावी), असिक्नी (चेनाब), वितस्ता (झेलम) आदि नदियों को देवी रूप में पुकारा गया है। प्रमुख श्लोक:

इमं मे गङ्गे यमुने सरस्वति शुतुद्रि स्तोमं सचता परुष्ण्या । असिक्न्या मरुद्वृधे वितस्तयाऽऽर्जीकीये शृणुह्या सुषोमया ॥ (५)

अर्थात: हे गंगे, यमुने, सरस्वति, शतुद्री, परुष्णी! मेरे इस स्तोत्र को सुनो। हे असिक्नी, मरुद्वृधे, वितस्ता, आर्जीकीये, सुषोमा! सुनो।

इस सूक्त में सिंधु नदी को सबसे शक्तिशाली बताया गया है: “सिन्धुरिव यो अभ्येति गा इव”  सिंधु अन्य नदियों को अपनी ओर खींच लेता है। वैदिक ऋषियों ने नदियों को ‘देवी’ माना क्योंकि वे भूमि को उपजाऊ बनाती हैं, सिंचाई करती हैं और जीवन चक्र चलाती हैं। जल के स्रोतों में वर्षा (पर्जन्य) भी महत्वपूर्ण है। ऋग्वेद में पर्जन्य सूक्त जलवृष्टि की प्रार्थना करता है।

पुराणों में जल को दिव्य माना गया है। विष्णु पुराण और भागवत पुराण में गंगा को ‘विष्णुपदी’ कहा गया है। विष्णु पुराण (२.८.१०४) में श्लोक है :-

वाम-पदाम्बुजाङ्गुष्ठ-स्रोतो-विनिर्गतां । विष्णोर् बिभर्ति यां भक्त्या शिरसाहर्निशं धृतः ॥

अर्थात भगवान विष्णु के वाम चरण कमल के अंगूठे से निकली धारा को शिवजी अपनी भक्ति से सिर पर धारण करते हैं।

इसलिए गंगा को ‘विष्णुपदी’ कहते हैं। भागवत पुराण में गंगा को पाप नाशिनी बताया गया है। यमुना को कृष्ण की लीला स्थली के रूप में महिमामंडित किया गया। स्कंद पुराण और पद्म पुराण में गंगा अवतरण की कथा है – भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाया।

सप्त नदियों का मंत्र पुराणों और दैनिक संस्कृति का हिस्सा है:

गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु ॥

अर्थात हे गंगे, यमुने, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदे, सिंधु, कावेरी! इस जल में अपना सान्निध्य स्थापित करो।

यह मंत्र स्नान के समय बोला जाता है। इससे साधारण जल भी तीर्थ जल बन जाता है। पुराणों में गोदावरी को ‘गौतमी’ कहा गया क्योंकि ऋषि गौतम ने इसे जीवन दिया। कावेरी को अगस्त्य ऋषि के कमंडल से माना जाता है। नर्मदा को ‘रेवा’ कहकर शिव से जोड़ा गया।

रामायण में गंगा को राम-लक्ष्मण की माता के रूप में वर्णित किया गया। महाभारत में गंगा भीष्म की माता हैं और यमुना कृष्ण की प्रिय नदी। पद्म पुराण में कहा गया: “गङ्गायाः स्पर्शमात्रेण पापानां नाशनं भवेत्” – गंगा के स्पर्श मात्र से पाप नष्ट हो जाते हैं। जल के अन्य स्रोत जैसे सरोवर (पुष्कर, मानसरोवर), कूप (कुंभ) और वर्षा को भी पुराण पवित्र मानते हैं। मत्स्य पुराण में कुंभ मेला की उत्पत्ति जल से जुड़ी है।

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संस्कृति में जल हर संस्कार में है। जन्म से मृत्यु तक  गर्भाधान, नामकरण, विवाह, अंत्येष्टि  आदि सभी संस्कारों में जल का उपयोग होता है। संध्या वंदन में ‘आपोऽस्मि’ मंत्र जल को आत्मा बताता है। पूजा में कलश स्थापना जल से होती है। तीर्थ यात्रा के केन्द्र में गंगा स्नान, प्रयाग, हरिद्वार, नासिक जल के स्रोत ही प्रमुख होते हैं। उत्सवों में जल दिवस जैसा महत्व गंगा दशहरा, चातुर्मास, कार्तिक स्नान में है। आदिवासी संस्कृति में भी नदियों को देवी मानकर पूजा होती है। जल के स्रोतों को बचाने के लिए वेदों में ‘जल संरक्षण’ का संदेश है  “मा जलं दूषय” अर्थात जल को दूषित न करो।

आर्थिक दृष्टि से नदियाँ सिंचाई, मछली पालन, व्यापार का आधार हैं। गंगा बेसिन में करोड़ों लोग निर्भर हैं। पुराण कहते हैं कि नदियों का संरक्षण पुण्य है। आज जल संकट वैश्विक है। भारत में गंगा प्रदूषित, यमुना सूख रही है। लेकिन वेद हमें चेतावनी देते हैं कि यदि जल के स्रोत नष्ट हुए तो सभ्यता नष्ट होगी। आपः सूक्त हमें सिखाता है कि जल को माता मानकर संरक्षण करो। जल दिवस पर हम शपथ लें – वृक्षारोपण, जल संरक्षण, प्रदूषण रोकना है। सरकार की ‘नमामि गंगे’ जैसी योजनाएँ पुराणिक भावना को ही जीवंत करती हैं।

भारतीय संस्कृति जल को केवल संसाधन नहीं, अपितु दिव्य शक्ति मानती है। वेदों का आपः सूक्त, नदी सूक्त, पुराणों की गंगा-यमुना कथाएँ और सप्त नदियों का मंत्र हमें सिखाते हैं कि जल ही जीवन है। जल के बिना जीवन की कल्पना भयावह है। जल दिवस पर प्रतिज्ञा करें कि हम अपनी प्राचीन विरासत को संजोएँगे। जल की प्रत्येक बूँद मूल्यवान है। “आपो देवीः शान्तिः” – जल शांति और समृद्धि दे।