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वानप्रस्थ मुनि नेगीराम जी का 90 वर्ष की आयु में निधन, वैदिक परंपरा के संवाहक के रूप में याद किए जाएंगे

रायगढ़/ गुरुविरजानन्द संस्कृत कुलम् से सम्बद्ध आचार्य धनञ्जयः शास्त्री जातवेदाः जी के पूज्य पिताश्री वानप्रस्थ मुनि नेगीराम जी का उत्तरायण, चैत्र शुक्ल पक्ष राका चतुर्दशी तिथि, 1 अप्रैल 2026 को प्रातः 5 बजे 90 वर्ष की आयु में जिला चिकित्सालय रायगढ़, छत्तीसगढ़ में निधन हो गया। उनके निधन से संस्कृत, वैदिक परंपरा तथा गुरुकुल शिक्षा परंपरा से जुड़े विद्वानों और समाज में शोक की लहर व्याप्त है।

वानप्रस्थ मुनि नेगीराम जी जीवनपर्यन्त वैदिक संस्कारों, भारतीय ज्ञान परंपरा तथा संस्कृत भाषा के संरक्षण के लिए समर्पित रहे। उनका जीवन सादगी, अनुशासन और आध्यात्मिक साधना का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। वे स्वयं संस्कृत भाषा में संवाद करते थे और इस बात पर विशेष बल देते थे कि आने वाली पीढ़ियां संस्कृत बोलें, समझें और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी रहें। अंतिम समय में भी उनके मुख पर ओ३म् तथा गायत्री मंत्र का जाप चलता रहा, जो उनके आध्यात्मिक जीवन का प्रमाण माना जा रहा है।

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स्वर्गीय नेगीराम जी के परिवार में तीन पुत्र एवं दो पुत्रियां हैं। उनके चार दौहित्र-दौहित्री तथा छह पौत्र हैं। उनके परिवार के अनेक सदस्य विभिन्न गुरुकुलों में अध्ययनरत रहे हैं, जिससे स्पष्ट होता है कि परिवार में वैदिक शिक्षा और संस्कृत परंपरा का विशेष महत्व रहा है। उनके ज्येष्ठ पुत्र आचार्य धनञ्जयः शास्त्री जातवेदाः संस्कृत माध्यम से गुरुकुल का संचालन कर रहे हैं और वैदिक शिक्षा के प्रसार में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

वानप्रस्थ मुनि नेगीराम जी का अन्त्येष्टि संस्कार 1 अप्रैल 2026 को अपराह्न 2 बजे रायगढ़ स्थित केलो नदी काया घाट में वैदिक विधि-विधान से गुरुकुल के आचार्यों द्वारा यथाशक्ति सम्पन्न किया गया। इस अवसर पर परिजन, शिष्यगण तथा संस्कृत एवं वैदिक परंपरा से जुड़े लोगों ने उपस्थित होकर श्रद्धांजलि अर्पित की।

उनकी स्मृति में शान्तियज्ञ का आयोजन 10 अप्रैल 2026 को छत्तीसगढ़ के रायगढ़ नगर स्थित दुर्गा चौक, गाड़ीवान मुहल्ला में किया जाएगा, जिसमें परिजन, विद्वान एवं श्रद्धालुजन सम्मिलित होकर दिवंगत आत्मा की शांति हेतु वैदिक मंत्रों के साथ आहुति प्रदान करेंगे।

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वानप्रस्थ मुनि नेगीराम जी का जीवन भारतीय संस्कृति, वैदिक परंपरा और संस्कृत भाषा के संरक्षण के प्रति समर्पित रहा। उनका व्यक्तित्व सादगी, संयम और आध्यात्मिक आस्था से परिपूर्ण था। वे मानते थे कि संस्कृत भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान, दर्शन और सांस्कृतिक निरंतरता की आधारशिला है। उनके द्वारा स्थापित संस्कार और आदर्श आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे।