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विदेशी पर्वों से भारतीय समाज में खंडित होती मर्यादा और बढता सांस्कृतिक प्रदूषण

आचार्य ललित मुनि

भारतीय समाज में वेलेंटाइन डे का बढ़ता प्रभाव केवल एक नए उत्सव का प्रसार भर नहीं है, बल्कि यह बड़े सांस्कृतिक प्रदूषण का संकेत भी है। पिछले दो तीन दशकों में यह दिन महानगरों से निकलकर छोटे शहरों और कस्बों तक पहुंच चुका है। बाजारों की सजावट, सोशल मीडिया का उत्साह और युवाओं की सक्रिय भागीदारी इसे एक बड़े आयोजन का रूप दे देती है। लेकिन इसी के साथ यह प्रश्न भी उठ रहा है कि क्या यह विदेशी त्योहार भारतीय संस्कृति का अपसंस्कृतिकरण होने का कारण बनते जा रहा है और क्या इससे नैतिक मर्यादाएं तथा सामाजिक वर्जनाएं टूट रही हैं?

भारतीय संस्कृति की मूल संरचना संयम, मर्यादा और संबंधों की गरिमा पर आधारित रही है। यहां प्रेम केवल आकर्षण नहीं, बल्कि जिम्मेदारी है। यह केवल निजी भावना नहीं, बल्कि सामाजिक संस्था का आधार है। दांपत्य संबंध को संस्कार माना गया, परिवार को जीवन का केंद्र और समाज को व्यापक परिवार का रूप। प्रेम का अर्थ केवल दो व्यक्तियों के बीच भावनात्मक या शारीरिक निकटता नहीं, बल्कि कर्तव्य, त्याग और परस्पर सम्मान का स्थायी बंधन था। इस दृष्टि से देखा जाए तो प्रेम को एक विशेष दिन में सीमित कर देना भारतीय विचार परंपरा से भिन्न प्रतीत होता है।

वेलेंटाइन डे का स्वरूप मुख्य रूप से बाजार द्वारा निर्मित है। प्रेम की अभिव्यक्ति को उपहारों, महंगे आयोजनों और सार्वजनिक प्रदर्शन से जोड़ा गया है। भावना की जगह प्रस्तुति पर जोर है। इस प्रक्रिया में प्रेम का आध्यात्मिक और नैतिक आयाम पीछे छूट जाता है। जब किसी भावना को बाजार संचालित करने लगता है तो वह धीरे धीरे उपभोग की वस्तु बन जाती है। प्रेम भी उसी दिशा में जाता दिखाई देता है। यह बदलाव केवल शैली का परिवर्तन नहीं, बल्कि सोच के ढांचे में परिवर्तन है।

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अपसंस्कृतिकरण का अर्थ केवल विदेशी प्रभाव को स्वीकार करना नहीं है। इसका अर्थ है अपनी जड़ों से दूरी बना लेना और अपने मूल्यों को हीन समझना। आज कई युवा भारतीय परंपराओं को पुरातन कहकर नकार देते हैं, जबकि पश्चिमी प्रतीकों को आधुनिकता का पर्याय मान लेते हैं। यह मानसिकता धीरे धीरे सांस्कृतिक आत्मविश्वास को कमजोर करती है। जब अपनी परंपराओं पर गर्व कम हो जाता है तो बाहरी प्रभावों को बिना विवेक के अपनाना आसान हो जाता है। वेलेंटाइन डे इसी प्रवृत्ति का एक उदाहरण बनकर सामने आता है।

नैतिकता और सामाजिक वर्जनाओं का प्रश्न भी इसी संदर्भ में उठता है। हर समाज कुछ सीमाएं तय करता है, जिन्हें वह मर्यादा कहता है। ये सीमाएं व्यक्ति की स्वतंत्रता को पूरी तरह रोकने के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए होती हैं। भारतीय समाज में सार्वजनिक व्यवहार, स्त्री पुरुष संबंधों और पारिवारिक जीवन के संबंध में कुछ मानदंड रहे हैं। जब प्रेम प्रदर्शन को खुले प्रदर्शन और शारीरिक निकटता तक सीमित कर दिया जाता है, पारंपरिक वर्जनाएं टूट रही हैं। कॉलेज परिसरों और सार्वजनिक स्थलों पर दिखने वाले दृश्य असहज करने वाले होते हैं।

यह भी देखा गया है कि इस अवसर पर युवाओं के बीच संबंधों का बनना और बिगड़ना बहुत तेजी से होता है। आकर्षण के आधार पर बने संबंध अक्सर स्थायित्व नहीं रखते। जब अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं तो निराशा जन्म लेती है। मानसिक तनाव, अवसाद और आत्मसम्मान में कमी जैसी समस्याएं सामने आती हैं। यदि प्रेम केवल क्षणिक उत्साह बनकर रह जाए तो वह व्यक्ति को स्थिरता नहीं दे पाता। भारतीय संस्कृति में संबंधों की स्थिरता पर विशेष बल दिया गया था। विवाह को केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक संस्था माना गया। आज जब प्रेम को तात्कालिक अनुभव के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो वह उस दीर्घकालिक दृष्टि से टकराता है।

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सांस्कृतिक प्रदूषण की बात तब और बड़ी हो जाती है जब मनोरंजन उद्योग और डिजिटल माध्यमों में प्रेम को अत्यधिक शारीरिक रूप में प्रस्तुत किया जाता है। अश्लील सामग्री की बढ़ती उपलब्धता और उसका सामान्यीकरण युवाओं की सोच को प्रभावित करता है। वेलेंटाइन डे जैसे अवसर इस उपभोगवादी मानसिकता को और बढ़ावा देते हैं। इससे नैतिक सीमाएं धुंधली पड़ने लगती हैं। जो बातें कभी निजी और मर्यादित मानी जाती थीं, वे सार्वजनिक प्रदर्शन का हिस्सा बनने लगती हैं। यह परिवर्तन डफ़ली वालों को स्वतंत्रता का विस्तार लगता है, जबकि अन्य इसे सामाजिक संतुलन के लिए खतरा मानते हैं।

महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का मुद्दा भी यहां जुड़ता है। प्रेम के नाम पर छल, दबाव और शोषण की घटनाएं समाज में चिंता पैदा करती हैं। जब संबंधों का आधार स्थिर प्रतिबद्धता की बजाय तात्कालिक आकर्षण हो तो धोखे की संभावना बढ़ती है। कई बार युवतियां भावनात्मक रूप से आहत होती हैं और उन्हें सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति इस बहस को और गंभीर बना देती है कि क्या आधुनिक उत्सवों के नाम पर हम अपने नैतिक ढांचे को कमजोर कर रहे हैं।

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परम्पराओं को समस्या प्रेम से नहीं, बल्कि उसके अर्थ के संकुचन से है। यदि प्रेम को केवल रोमांटिक आकर्षण और उपभोग तक सीमित कर दिया जाए तो वह समाज को स्थायी आधार नहीं दे सकता। भारतीय परंपरा में प्रेम अनेक रूपों में व्यक्त हुआ है। माता पिता का स्नेह, गुरु शिष्य का संबंध, भाई बहन का बंधन और पति पत्नी का विश्वास, सभी प्रेम के ही रूप हैं। यदि समाज केवल एक रूप को अत्यधिक महत्व देने लगे और अन्य आयामों को भूल जाए तो संतुलन बिगड़ता है।

समाधान विरोध या हिंसा में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक आत्मचिंतन में है। युवाओं को यह समझाना होगा कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों को काट देना नहीं है। वैश्विक प्रभावों को समझदारी से अपनाया जा सकता है, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखते हुए। अपसंस्कृतिकरण तब होता है जब समाज अपनी मूल चेतना से दूर हो जाता है।

यदि हम अपने मूल्यों को जीवित रखें, परिवार व्यवस्था को मजबूत करें और युवाओं को नैतिक दृष्टि से सजग बनाएं तो कोई भी बाहरी प्रभाव हमारी संस्कृति को कमजोर नहीं कर सकता। आवश्यकता केवल इस बात की है कि प्रेम को उपभोग नहीं, बल्कि मूल्य के रूप में देखा जाए। तभी सांस्कृतिक प्रदूषण की आशंका कम होगी और नैतिकता तथा मर्यादा का संतुलन बना रहेगा।