भारतीय संस्कृति का जीवन दर्शन : सतयुग से कलियुग तक समरसता, संगठन और एकात्म का संदेश

कहा जाता है कि सतयुग में समाज पूर्णतः एकरस था और उस समय के समाज में भारतीय संस्कृति की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती थी। एक कहानी के माध्यम से इस बात को बहुत आसानी से समझा जा सकता है। सतयुग के खंडकाल में एक किसान ने अपनी जमीन बेची। जिस व्यक्ति ने वह जमीन खरीदी थी, उसे उस जमीन की खुदाई के दौरान सोने के सिक्कों से भरा हुआ एक घड़ा मिला।
उस घड़े को लेकर वह किसान जमीन के विक्रेता के पास पहुँचा और बोला कि आपकी जमीन में से यह सोने के सिक्कों से भरा घड़ा मिला है। चूँकि मैंने आपसे केवल जमीन खरीदी है, अतः इन सोने के सिक्कों पर मेरा अधिकार नहीं है। आप यह घड़ा अपने पास रख लें, क्योंकि इन सिक्कों पर आपका अधिकार है। जमीन के विक्रेता ने सोने के सिक्कों से भरे उस घड़े को लेने से यह कहकर साफ इनकार कर दिया कि मैंने तो वह जमीन आपको बेच दी है, अतः बाद में उस जमीन से जो भी वस्तु आप प्राप्त करते हैं, उस पर आपका ही अधिकार है। उस वस्तु पर मेरा अधिकार कैसे हो सकता है?
जब जमीन के क्रेता और विक्रेता के बीच कोई सहमति नहीं बन सकी, तो वे सोने के सिक्कों से भरे उस घड़े को लेकर अपने राज्य के राजा के पास पहुँचे। दोनों ने राजा को पूरी बात बताई और आग्रह किया कि राजा साहब इन सोने के सिक्कों को राज्य के खजाने में जमा करा दें। राजा ने भी यह कहकर इंकार कर दिया कि राज्य के नियमों में इस प्रकार का कोई प्रावधान नहीं है कि बिना किसी उचित कारण के प्राप्त धन को राज्य के खजाने में जमा कर दिया जाए। इस संबंध में जो नियम निर्धारित हैं, उनके आधार पर यह सोने के सिक्के राज्य के खजाने में जमा नहीं किए जा सकते।
ऐसा था सतयुग का खंडकाल। जो वस्तु हमारी नहीं है, उसे हम अपने पास कैसे रख सकते हैं? प्रत्येक नागरिक इसी भावना के साथ समाज में एकरस भाव से जीवन व्यतीत करता था।
सतयुग के बाद त्रेतायुग आया। इस युग में समाज में समरसता के भाव में कुछ कमी दिखाई देने लगी। जैसे एक समाज (दानव) के राजा रावण ने दूसरे समाज (देव) की माता सीता का अपहरण कर अपने राज्य में कैद कर लिया। प्रभु श्रीराम ने आदिवासियों और वानरों के समूह को एक कर, उनमें समरसता का भाव जागृत करते हुए रावण के राज्य पर आक्रमण किया और माता सीता को उसके चंगुल से छुड़ाकर सकुशल अयोध्या लाने में सफल हुए।
प्रभु श्रीराम ने त्रेतायुग में यह संदेश दिया कि यदि सर्व समाज संगठित रहता है, तो किसी भी बुराई से पार पाया जा सकता है। इस प्रकार त्रेतायुग में संगठन की महत्ता सिद्ध हुई।
त्रेतायुग के बाद द्वापर युग आया। इस खंडकाल में तो समाज क्या, बल्कि दो परिवारों के बीच की एकता भी समाप्त हो चुकी थी। कौरव परिवार ने अपने ही पांडव भाइयों को मात्र पाँच गाँव देने से इंकार कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत का युद्ध हुआ।
आज के खंडकाल कलियुग की स्थिति तो और भी भिन्न है। आज पश्चिमी जगत में प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने सुख के लिए कार्य करता हुआ दिखाई देता है। परिवार के अन्य सदस्यों के प्रति जैसे उसकी कोई जिम्मेदारी ही नहीं बची है। आज के कलियुग में नागरिक अपने आप में केंद्रित हो गए हैं और परिवार, समाज तथा राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व का भाव क्षीण होता जा रहा है।
भारतीय संस्कृति में सामाजिक समरसता को अत्यंत महत्व दिया गया है। यहाँ स्वयं के साथ-साथ परिवार, समाज, नगर, राष्ट्र और पूरे विश्व को समता के भाव से देखने की परंपरा है। पूरी सृष्टि को एक परिवार मानने की भावना “वसुधैव कुटुंबकम”, “सर्वे भवन्तु सुखिनः” और “सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय” जैसे सूत्रों में प्रकट होती है।
आज पूरे विश्व में अशांति का वातावरण है। कई देश आपस में युद्धरत हैं और अनेक देशों के भीतर विभिन्न मत-पंथों को मानने वाले लोग परस्पर संघर्ष में लिप्त हैं। ऐसे गंभीर समय में केवल भारतीय संस्कृति ही विश्व में पुनः शांति की स्थापना का मार्ग दिखा सकती है।
विवेकानंद केंद्र, कन्याकुमारी में सेवा कार्य से जुड़ी आदरणीय दीदी निवेदिता रघुनाथ भिड़े ने अपनी पुस्तक “भारतीय संस्कृति : चुनौतियाँ एवं संभावनाएँ” में भारतीय संस्कृति के जीवन दर्शन की व्याख्या करते हुए बताया है कि जिस ज्ञान के द्वारा साधक विभक्त प्राणियों में अविभाज्य, अविनाशी भाव को देखता है, वही सात्त्विक ज्ञान कहलाता है। भारतीय संस्कृति का जीवन दर्शन इसी सात्त्विक ज्ञान से निर्धारित हुआ है। ईश्वर, मानव और सृष्टि अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही तत्त्व के रूप हैं। इसलिए भारतीय संस्कृति का जीवन दर्शन एकात्म है।
इसके विपरीत, जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सभी प्राणियों में अलग-अलग भावों को अलग-अलग रूप से देखता है, वह राजस ज्ञान कहलाता है। ईसाई और इस्लाम पंथ इसी ज्ञान से प्रेरित माने गए हैं। वहीं, जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य केवल एक कार्य या शरीर में ही आसक्त हो जाता है, जो हेतुरहित, तत्त्वार्थ से रहित और संकुचित होता है, वह तामसिक ज्ञान है। पूँजीवाद, कम्युनिज़्म, नक्सलवाद, साम्यवाद, मार्क्सवाद और माओवाद इसी तामसिक जीवन दर्शन से प्रेरित माने गए हैं।
उक्त पुस्तक में यह भी बताया गया है कि जीवन दर्शन के आधार पर ही किसी राष्ट्र के जीवन मूल्य और जीवन तत्त्व निर्मित होते हैं। भारतीय संस्कृति के कुल बारह जीवन मूल्य बताए गए हैं। इनमें सभी के प्रति आदर और सम्मान, प्रत्येक जीव को ईश्वर का स्वरूप मानना, ईश्वर की खोज को अंतःकरण का विषय मानना, विविधता में एकता का भाव, चतुर्विध पुरुषार्थ, महिलाओं का सम्मान, उदारता और समावेशिता, कर्म सिद्धांत, अवतार की संकल्पना, अनुभूति आधारित आध्यात्म, यज्ञ का सामाजिक महत्व और आत्मसंयम प्रमुख हैं।
भारतीय संस्कृति में जीवन दर्शन के आधार पर जीवन मूल्य और जीवन तत्त्व निर्धारित होते हैं और फिर समाज की जीवन व्यवस्था का निर्माण होता है। कुलधर्म, जातिधर्म, समाजधर्म, पंच महायज्ञ, चार आश्रम, चार वर्ण, जाति व्यवस्था और भारतीय शिक्षा पद्धति—all ये जीवन व्यवस्था के अंग माने जाते हैं।
मुगल काल और ब्रिटिश शासन काल में भारतीय संस्कृति को नष्ट करने के अनेक प्रयास किए गए, किंतु यह संस्कृति नष्ट नहीं हो सकी। इसी दौरान ग्रीक, रोमन, फारसी और मिस्र जैसी अनेक प्राचीन संस्कृतियाँ विलुप्त हो गईं, लेकिन भारतीय संस्कृति आज भी जीवित है। इन्हीं कारणों से अब यह कहा जा रहा है कि विश्व में स्थायी शांति की स्थापना के लिए वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति का उत्थान अत्यंत आवश्यक है।
लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं।

