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भई प्रगट कुमारी भूमि-विदारी जन हितकारी भयहारी : माता जानकी जयंती विशेष

रेखा पाण्डेय (लिपि)

भारतीय चेतना में सीता जी केवल एक धार्मिक पात्र नहीं है, बल्कि भारतीय नारी जगत की आदर्श भी हैं। धरती से उत्पन्न होने पर राजा जनक नें इनका सीता नामकरण किया और राजा जनक की पुत्री होने के कारण इनका एक नाम  जानकी भी हुआ। माता जानकी उस गहन, अविभाज्य और शाश्वत संबंध की जीवंत प्रतिमा हैं, जो प्रकृति और नारी के बीच सदियों से प्रवाहित होता आया है। भारतीय संस्कृति में नारी को केवल सामाजिक भूमिका के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि की मूल शक्ति, उर्वरा ऊर्जा और धैर्य की अखंड धारा के रूप में देखा गया है। सीता जी इसी धारा का सर्वोच्च प्रतीक हैं। उनका जन्म धरती से है, उनका जीवन धरती की तरह सहनशील है, और उनके जीवन का समापन भी धरती में समा जाने से होता है। यह संयोग नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन की गहन प्रतीकात्मकता है, जहाँ प्रकृति और नारी एक-दूसरे की प्रतिछवि हैं।

वाल्मीकि रामायण में सीता जी का जन्म कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि अत्यंत अर्थगर्भित प्रसंग है। राजा जनक जब यज्ञ के लिए भूमि जोत रहे होते हैं, तब हल की नोक से एक दिव्य कन्या प्रकट होती है। जनक स्वयं इस प्रसंग का वर्णन करते हुए कहते हैं-


अथ मे कृषतः क्षेत्रं लाङ्गलादुत्थिता ततः।
क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाम्ना सीतेति विश्रुता॥
भूतलादुत्थिता सा तु व्यवर्धत ममात्मजा।
दीर्घशुक्लेति मे कन्या स्थापितेयमयोनिजा॥
अर्थ यह कि खेत जोतते समय मुझे एक कन्या प्राप्त हुई, जो भूमि से उठी थी; वही मेरी पुत्री बनी और सीता नाम से प्रसिद्ध हुई। यहाँ ‘भूतलादुत्थिता’ शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ केवल यह नहीं कि सीता भूमि से निकलीं, बल्कि यह कि वे स्वयं भूमि की शक्ति का मानवीय रूप हैं। उनका जन्म गर्भ से नहीं, अपितु धरती की गोद से हुआ, वे अयोनिजा हैं। यह उन्हें सामान्य मानव सीमाओं से ऊपर उठाकर प्रकृति की पुत्री बनाता है।

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धरती भारतीय संस्कृति में केवल भौतिक भूमि नहीं है। वह माता है, पोषक है, धैर्य की चरम सीमा है। धरती सब कुछ सहती है, बीज बोए जाने का आघात, हल का स्पर्श, मानव के अत्याचार, फिर भी जीवन देती है। सीता का जीवन भी इसी धरातल पर चलता है। वे वनवास सहती हैं, अपहरण सहती हैं, लोक-निंदा सहती हैं, परंतु कभी अपनी मर्यादा नहीं छोड़तीं। जैसे धरती अपने भीतर अग्नि, जल और कंपन समेटे रहती है, वैसे ही सीता जी के भीतर अपार शक्ति निहित है, जो आवश्यकता पड़ने पर प्रकट होती है। तुलसीदास ने रामचरितमानस में सीता जी के जन्म को अत्यंत भावपूर्ण और काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया है-


“भई प्रगट कुमारी भूमि-विदारी जन हितकारी भयहारी।
अतुलित छबि भारी मुनि-मनहारी जनकदुलारी सुकुमारी॥”
यहाँ भूमि के विदीर्ण होने से कुमारी का प्रकट होना केवल चमत्कार नहीं, बल्कि यह संकेत है कि जब समाज को संतुलन और करुणा की आवश्यकता होती है, तब प्रकृति स्वयं नारी रूप में प्रकट होती है। सीता जी ‘जन हितकारी’ हैं, वे समस्त सृष्टि के कल्याण के लिए अवतरित होती हैं। उनकी सुकुमारता धरती की कोमलता है, और उनकी शक्ति धरती की सहनशीलता।

भारतीय दर्शन में प्रकृति और पुरुष का संबंध अत्यंत गहरा है। सांख्य दर्शन में प्रकृति को सृजन की मूल शक्ति माना गया है, जबकि पुरुष चेतना है। प्रकृति सक्रिय है, उर्वरा है, परिवर्तनशील है, पुरुष साक्षी है। रामायण में भगवान राम और माता सीता इसी दर्शन के मूर्त रूप हैं। श्रीराम चेतना हैं, मर्यादा हैं, सीता जी प्रकृति हैं, उर्वरता हैं। दोनों के मिलन से ही धर्म और सृष्टि का संतुलन संभव है। सीता जी के बिना श्री राम की मर्यादा अधूरी है, और श्री राम के बिना सीता जी की शक्ति दिशाहीन। यह संबंध भारतीय चिंतन में नारी और प्रकृति के केंद्रीय स्थान को रेखांकित करता है।

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सीता जी का वनवास केवल एक पारिवारिक निर्णय नहीं, बल्कि प्रकृति में लौटने का प्रतीक है। अयोध्या के वैभव से निकलकर पंचवटी के वन में उनका प्रवेश उस नारी का प्रकृति से पुनः जुड़ना है, जो मूलतः धरती की पुत्री है। वन में वे वृक्षों, लताओं और पशुओं के बीच सहज रहती हैं। अशोक वाटिका में उनका धैर्य प्रकृति के मौन धैर्य की तरह है, जहाँ वे पीड़ा सहती हैं, पर अपनी जड़ों से नहीं टूटतीं। वे शोक में डूबती हैं, पर आशा नहीं छोड़तीं। यह वही धरती है, जो सूखा सहकर भी वर्षा की प्रतीक्षा करती है।

अग्निपरीक्षा का प्रसंग भी इसी प्रतीकात्मकता से भरा है। अग्नि भारतीय तत्व दर्शन में शुद्धि का माध्यम है। सीता जी अग्नि में प्रवेश करती हैं, जैसे धरती की गोद में बीज जाता है और शुद्ध होकर बाहर आता है। वे स्वयं को सिद्ध नहीं करतीं, बल्कि समाज के संदेह को सहती हैं। यह नारी की वह पीड़ा है, जो धरती की तरह मौन रहती है, परंतु भीतर से टूटती नहीं।

उत्तरकांड में सीता जी का धरती में समा जाना भारतीय साहित्य के सबसे मार्मिक और अर्थपूर्ण प्रसंगों में से एक है। जब वे कहती हैं कि यदि मैं निष्पाप हूँ तो धरती मुझे अपनी गोद में ले ले, तब पृथ्वी विदीर्ण होती है और सीता जी उसमें समा जाती हैं। यह कोई पराजय नहीं, बल्कि नारी की अंतिम विजय है। यह उस शक्ति का पुनः अपने मूल में लौटना है, जिसने सब कुछ सह लिया, परंतु अपमान की सीमा के बाद स्वयं को लौटा लिया। यह संदेश है कि नारी और प्रकृति दोनों असीम सहनशील हैं, पर अनंत नहीं। एक सीमा के बाद वे स्वयं को वापस ले लेती हैं। स्तुतियों में सीता जी को स्पष्ट रूप से प्रकृति के रूप में नमन किया गया है-

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“भूमेर्दुहितरं विद्यां नमामि प्रकृतिं शिवाम्।”
यहाँ सीता जी को भूमि की पुत्री, विद्या और कल्याणकारी प्रकृति कहा गया है। वे केवल पतिव्रता नहीं, बल्कि शक्ति हैं। उनकी पतिव्रता दासता नहीं, बल्कि स्वेच्छा से किया गया समर्पण है, जैसे धरती सूर्य के चारों ओर घूमती है, पर उसकी अपनी गति और शक्ति होती है।

आज के संदर्भ में सीता जी का यह स्वरूप और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। सीता जी का जीवन हमें सिखाता है कि धरती और नारी का सम्मान एक-दूसरे से जुड़ा है। जिस समाज में नारी अपमानित होती है, वहाँ प्रकृति भी असंतुलित होती है। और जहाँ धरती का दोहन होता है, वहाँ नारी की गरिमा भी खतरे में पड़ती है।

इस प्रकार, सीता जी केवल रामायण की पात्र नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। वे धरती हैं, वे नारी हैं, और वे वह शाश्वत शक्ति हैं, जो सृष्टि को संतुलित रखती है। धरती से उत्पन्न जानकी का जीवन हमें यह स्मरण कराता है कि नारी और प्रकृति का संबंध केवल रूपक नहीं, बल्कि अस्तित्व का मूल सत्य है। उनका सम्मान करना धरती का सम्मान करना है, और उनकी गरिमा की रक्षा करना सृष्टि के संतुलन की रक्षा करना है।

लेखिका साहित्यकार एवं हिन्दी व्याख्याता हैं।