आचार्य ललित मुनि

futuredलोक-संस्कृति

यदि वन न रहें तो…वन से आत्मसंवाद

“यदि वन न रहें तो…” विषय पर यह भावनात्मक और तथ्यात्मक आलेख जंगल में चलते एक व्यक्ति के आत्मसंवाद के माध्यम से वन संरक्षण, जनसंख्या दबाव और भविष्य की चुनौतियों को प्रस्तुत करता है।

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futuredमेरा गाँव मेरा बचपन

मेरे आंगन की गौरैया अब दिखती नहीं

मेरे आंगन की गौरैया अब दिखती नहीं—इस भावनात्मक और तथ्यात्मक हिंदी आलेख में गौरैया के घटते अस्तित्व, पर्यावरणीय कारणों और संरक्षण के उपायों का मार्मिक वर्णन।

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futuredधर्म-अध्यात्म

नवसंवत्सर: प्रकृति के नव श्रृंगार का उत्सव

भारतीय नववर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारंभ होने वाला सृष्टि, ऋतु-चक्र, खगोलीय विज्ञान और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा पावन पर्व है, जो भारतीय जीवन-दर्शन और प्रकृति-सामंजस्य का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।

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futuredसमाज

हिंदू समाज की सुरक्षा और एकता में शत्रुबोध की आवश्यकता

हिंदू समाज में शत्रुबोध की अवधारणा, उसके क्षरण के कारण, सेकुलर विमर्श की भूमिका और वर्तमान संदर्भों का संतुलित, तथ्याधारित व मानवीय विश्लेषण।

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futuredमनकही

रायगढ़ के पॉलिटेक्निक का नाम परिवर्तन कर सेठ किरोड़ीमल की विरासत को मिटाने का प्रयास

रायगढ़ के दानवीर सेठ किरोड़ीमल के योगदान, पॉलिटेक्निक कॉलेज के नाम परिवर्तन विवाद और इससे जुड़ी भावनाओं व ऐतिहासिक महत्व का विस्तृत विश्लेषण।

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futuredलोक-संस्कृति

रंगों में रचा भारतीय जीवन, भक्ति और वसंतोत्सव : रंग पंचमी

रंग पंचमी भारतीय चेतना का जीवंत प्रतीक है। यह बताती है कि रंग केवल उत्सव का माध्यम नहीं बल्कि प्रेम, भक्ति और जीवन की ऊर्जा का प्रतीक हैं। कालिदास, जयदेव और सूरदास की काव्य परंपरा हमें यह सिखाती है कि रंग तभी सार्थक हैं जब वे मन की शुद्धि और प्रेम की भावना से जुड़े हों।

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