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शुद्धि, शिक्षा और स्वदेशी के आर्य प्रहरी स्वामी श्रद्धानंद

आचार्य ललित मुनि

भारत के आधुनिक इतिहास में कुछ ऐसे व्यक्तित्व हुए हैं जिनका जीवन किसी साधारण जीवनी का विषय नहीं बल्कि एक युग की आत्मकथा बन जाता है। स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती उन्हीं में से एक थे। उनका जीवन संघर्ष, आत्ममंथन, आस्था, विद्रोह, सुधार और बलिदान की निरंतर यात्रा था। वे केवल एक संन्यासी नहीं थे, वे समाज की धड़कन को समझने वाले चिंतक थे। वे केवल वक्ता नहीं थे, वे कर्मयोगी थे। वे केवल संगठनकर्ता नहीं थे, वे एक ऐसे पिता थे जिन्होंने अपने निजी सुखों को त्यागकर राष्ट्र को अपना परिवार बना लिया।

बचपन की बेचैनी और आस्था का संकट

सन 1856 में पंजाब के जालंधर जिले के तलवां गांव में एक खत्री परिवार में जन्मे उस बालक का नाम पहले बृहस्पति विज रखा गया। बाद में वे मुंशी राम के नाम से जाने गए। उनके पिता लाला नानक चंद ब्रिटिश शासन में पुलिस इंस्पेक्टर थे। सरकारी नौकरी के कारण परिवार को एक शहर से दूसरे शहर जाना पड़ता था। कभी बनारस, कभी लाहौर, कभी अन्य कस्बे। इस निरंतर परिवर्तन ने बालक के मन में स्थायित्व से अधिक प्रश्नों को जन्म दिया।

मुंशी राम का बचपन सहज था, पर जल्द ही उन्होंने समाज के विरोधाभासों को देखना शुरू किया। मंदिर में प्रवेश से रोके जाने की घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। एक ओर धर्म की महिमा गाई जाती थी, दूसरी ओर भेदभाव खुलकर दिखता था। चर्च के भीतर का वातावरण, पादरी और ननों के व्यवहार की चर्चा, कृष्ण भक्तों द्वारा एक युवती के साथ अन्याय और एक मुस्लिम वकील के घर में एक बच्ची की संदिग्ध मृत्यु जैसी घटनाओं ने उनके भीतर आस्था के स्थान पर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए। वे सोचने लगे कि यदि धर्म मनुष्य को बेहतर नहीं बनाता तो उसका अर्थ क्या है। यही वह दौर था जब वे नास्तिकता की ओर झुके।

स्वामी दयानंद से भेंट और जीवन का मोड़

जीवन की धारा कभी सीधी नहीं बहती। बैरेली में स्वामी दयानंद सरस्वती का व्याख्यान होना था। उनके पिता सुरक्षा व्यवस्था में लगे थे। मुंशी राम व्याख्यान को चुनौती देने के भाव से वहां पहुंचे थे। लेकिन जो हुआ वह अप्रत्याशित था। दयानंद का तेजस्वी व्यक्तित्व, वेदों की निर्भीक व्याख्या और पाखंड पर तीखी चोट ने उनके भीतर सोई हुई जिज्ञासा को जगा दिया। उन्हें लगा कि यहां कोई अभिनय नहीं, यहां सत्य के लिए निर्भीकता है।

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उस दिन के बाद मुंशी राम का जीवन बदलने लगा। वे आर्य समाज से जुड़े। उन्होंने कानून की पढ़ाई पूरी की और फिल्लौर तथा जालंधर में वकालत शुरू की। धन और प्रतिष्ठा मिल रही थी, लेकिन मन अब केवल पेशे तक सीमित नहीं था। समाज की पीड़ा उन्हें पुकार रही थी।

निजी शोक से संन्यास तक

उनकी पत्नी शिवा देवी का निधन तब हुआ जब वे केवल पैंतीस वर्ष के थे। दो पुत्र और दो पुत्रियां पीछे रह गईं। यह आघात साधारण नहीं था। एक गृहस्थ पुरुष अचानक जीवन के रिक्त आकाश के सामने खड़ा था। इस पीड़ा ने उन्हें भीतर से तोड़ा भी और गढ़ा भी। धीरे धीरे उनका मन वैराग्य की ओर झुकने लगा। 1917 में उन्होंने संन्यास ग्रहण किया और स्वामी श्रद्धानंद सरस्वती बने। दिल्ली उनका कर्मक्षेत्र बना।

साहस का प्रत्यक्ष स्वरूप

उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली था। लंबा कद, तेजस्वी मुखमंडल और आंखों में दृढ़ता। लेकिन असली पहचान उनका साहस था। रोवलट एक्ट के विरोध में जब दिल्ली के चांदनी चौक में प्रदर्शन हो रहा था और गोरखा सैनिकों ने गोली चलाने की चेतावनी दी, तब उन्होंने निर्भीक होकर कहा कि यदि गोली चलानी है तो पहले मेरी छाती पर चलाओ। यह केवल शब्द नहीं थे, यह आत्मबल था।

वे प्रारंभ में हिंदू मुस्लिम एकता के समर्थक थे। जामा मस्जिद की मीनार से वेद मंत्रों का उच्चारण और मुस्लिम श्रोताओं का आमीन कहना उस समय की दुर्लभ घटना थी। उनके लिए धर्म का अर्थ टकराव नहीं, आत्मसम्मान था।

समाज सुधार का व्यापक दृष्टिकोण

स्वामी श्रद्धानंद ने हिंदू समाज की कमियों को स्वीकार किया। वे मानते थे कि छुआछूत, बाल विवाह और नारी शिक्षा की उपेक्षा ने समाज को कमजोर किया है। उन्होंने अछूतोद्धार को अपना मुख्य लक्ष्य बनाया। वे कहते थे कि यदि समाज अपने ही लोगों को सम्मान नहीं देगा तो वे कहीं और आश्रय खोजेंगे।

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डॉ भीमराव अंबेडकर ने 1922 में उन्हें अछूतों का सच्चा और ईमानदार समर्थक कहा। यह प्रशंसा उनके काम की सच्चाई को दर्शाती है। उन्होंने दलितों के लिए विद्यालय खोले, उनके सम्मान के लिए अभियान चलाया। वे मानते थे कि धार्मिक सुधार और सामाजिक सुधार एक दूसरे से अलग नहीं हो सकते।

शुद्धि आंदोलन की पृष्ठभूमि और विस्तार

शुद्धि आंदोलन का विचार स्वामी दयानंद ने दिया था, लेकिन इसे व्यापक रूप देने का कार्य स्वामी श्रद्धानंद ने किया। 1920 के दशक में जब जनसंख्या संबंधी आंकड़ों और धर्मांतरण की खबरों ने उन्हें चिंतित किया, तब उन्होंने इसे संगठित रूप दिया।

1923 में भारतीय हिंदू शुद्धि सभा की स्थापना हुई। आगरा और आसपास के क्षेत्रों में मलकाना राजपूतों की शुद्धि का अभियान चला। हजारों लोग पुनः हिंदू समाज में लौटे। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, यह पहचान और आत्मसम्मान का प्रश्न था। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि लौटने वालों को समाज में समान रूप से स्वीकार किया जाए।

इस आंदोलन ने व्यापक प्रभाव डाला। समाज में संगठन की भावना बढ़ी। लेकिन विरोध भी हुआ। मुस्लिम नेतृत्व ने इसे चुनौती दी। राजनीतिक मतभेद भी उभरे। गांधी जी ने इसे समय के अनुकूल नहीं माना। स्वामी श्रद्धानंद ने उत्तर दिया कि यदि कार्य सत्य पर आधारित है तो आलोचना से विचलित नहीं होना चाहिए।

शिक्षा और गुरुकुल का स्वप्न

उनका मानना था कि अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली भारतीय आत्मा को कमजोर कर रही है। इसलिए उन्होंने वैदिक परंपरा और आधुनिक ज्ञान के समन्वय से शिक्षा देने का विचार किया। 1900 में गुजरांवाला में पहला गुरुकुल आरंभ हुआ। 1902 में हरिद्वार के निकट कांगड़ी में गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना हुई। यह स्थान गंगा के तट पर प्राकृतिक वातावरण में था।

यहां छात्र वेद, संस्कृत, योग, व्यायाम के साथ साथ आधुनिक विषय भी पढ़ते थे। उद्देश्य था ऐसे नागरिक तैयार करना जो चरित्रवान, स्वदेशी और राष्ट्रभक्त हों। बाद में यही संस्थान विश्वविद्यालय के रूप में विकसित हुआ।

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स्वदेशी और राष्ट्रीय आंदोलन में भूमिका

स्वामी श्रद्धानंद केवल धार्मिक नेता नहीं थे। वे स्वतंत्रता आंदोलन में भी सक्रिय रहे। रोवलट एक्ट के विरोध से लेकर कांग्रेस के अधिवेशनों तक उन्होंने भाग लिया। वे स्वदेशी के समर्थक थे। विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और स्वदेशी शिक्षा संस्थानों के निर्माण में उन्होंने योगदान दिया।

वे कहते थे कि स्वराज केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता भी है। यदि भाषा, शिक्षा और संस्कृति पर पराधीनता रहेगी तो स्वतंत्रता अधूरी होगी।

लेखन और पत्रकारिता

उन्होंने उर्दू में तेज और हिंदी में अर्जुन नामक पत्र निकाले। लेखनी के माध्यम से समाज को जागरूक किया। उनकी पुस्तक हिंदू संगठन उस समय की परिस्थितियों का गंभीर विश्लेषण थी। वे स्पष्ट शब्दों में लिखते थे, बिना किसी भय के।

अंतिम बलिदान

23 दिसंबर 1926 को जब वे अस्वस्थ थे, अब्दुल रशीद नामक व्यक्ति ने उनके घर आकर गोली मार दी। यह घटना पूरे देश को झकझोर गई। वे शय्या पर थे, लेकिन उनके चेहरे पर भय नहीं था। उनकी हत्या ने उनके विचारों को समाप्त नहीं किया, बल्कि उन्हें और व्यापक बना दिया।

विरासत और प्रेरणा

उनकी स्मृति में डाक टिकट जारी हुआ। दिल्ली में उनकी प्रतिमा स्थापित है। गुरुकुल कांगड़ी आज भी उनके स्वप्न का प्रतीक है। लेकिन सबसे बड़ी विरासत उनका विचार है कि समाज का उत्थान आत्मसम्मान, शिक्षा और संगठन से होता है।

स्वामी श्रद्धानंद का जीवन हमें सिखाता है कि सुधार का मार्ग कठिन होता है। आलोचना, विरोध और संकट आते हैं, लेकिन यदि उद्देश्य स्पष्ट हो तो मार्ग बनता जाता है। उन्होंने दिखाया कि संन्यास पलायन नहीं, समाज के प्रति समर्पण भी हो सकता है।

आज जब हम उन्हें याद करते हैं तो केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व को नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रेरणा को याद करते हैं। उनका जीवन हमें यह विश्वास देता है कि एक व्यक्ति भी इतिहास की दिशा मोड़ सकता है। उनके साहस, त्याग और समर्पण को शत शत नमन।