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वरिष्ठ छत्तीसगढ़ी साहित्यकार और पत्रकार सुशील भोले पंचतत्व में विलीन, साहित्य जगत शोकाकुल

रायपुर, 27 फरवरी 2026। छत्तीसगढ़ी भाषा के वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार सुशील भोले अत्यंत शोकाकुल वातावरण में पंचतत्व में विलीन हो गए। राजधानी रायपुर के मारवाड़ी श्मशान घाट में शुक्रवार सुबह उनका अंतिम संस्कार किया गया। वे रायपुर के संजय नगर (टिकरापारा) क्षेत्र के निवासी थे। 26 फरवरी को रायपुर के एक अस्पताल में उनका निधन हो गया था।

उनकी अंतिम यात्रा में परिजनों के साथ बड़ी संख्या में नागरिक, साहित्यकार, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हुए। श्मशान घाट में आयोजित शोकसभा में दिवंगत आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखा गया और श्रद्धासुमन अर्पित किए गए। उपस्थित वक्ताओं ने छत्तीसगढ़ी साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में उनके लगभग चार दशकों के योगदान को स्मरण करते हुए कहा कि सुशील भोले ने लोकभाषा की अस्मिता और उसकी अभिव्यक्ति को निरंतर स्वर दिया।

अंतिम संस्कार में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा, साप्ताहिक ‘छत्तीसगढ़ी सेवक’ रायपुर के पूर्व संपादक जागेश्वर प्रसाद, खेतिहर मजदूर किसान मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष ठाकुर रामगुलाम सिंह, वरिष्ठ पत्रकार गुलाल वर्मा, परमानंद वर्मा, साहित्यकार रसिक बिहारी अवधिया, सुखदेवराम साहू ‘सरस’, छत्तीसगढ़ी फिल्मों के निर्माता एवं अभिनेता चन्द्रशेखर चकोर तथा राजिम के साहित्यकार दिनेश चौहान सहित अनेक प्रबुद्धजन उपस्थित रहे।

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कवि, लेखक और पत्रकार के रूप में सुशील भोले विगत लगभग चालीस वर्षों से सक्रिय रहे। छत्तीसगढ़ की विभूतियों पर आधारित संस्मरणों का उनका चर्चित संग्रह ‘सुरता के संसार’ विशेष रूप से सराहा गया, जिसमें 39 छत्तीसगढ़ी आलेख संकलित हैं।

दिसंबर 1987 में उन्होंने छत्तीसगढ़ी मासिक पत्रिका ‘मयारू माटी’ का संपादन और प्रकाशन प्रारंभ किया। आर्थिक कठिनाइयों के कारण इसके 13 अंक ही प्रकाशित हो सके, लेकिन इस पत्रिका ने नवोदित रचनाकारों को मंच प्रदान किया। वर्ष 1989 में उनका काव्य संग्रह ‘छितका कुरिया’ प्रकाशित हुआ। वर्ष 2009 में छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह ‘ढेंकी’ पाठकों के बीच आया। उनकी अन्य उल्लेखनीय कृतियों में ‘दरस के साध’, ‘जिनगी के रंग’ तथा मूल संस्कृति पर आधारित आलेख संग्रह ‘आखर अंजोर’ शामिल हैं।

पिछले कुछ वर्षों से वे अखबारों में ‘कोंदा-भैरा के गोठ’ शीर्षक से समसामयिक विषयों पर छत्तीसगढ़ी में व्यंग्यात्मक स्तंभ लेखन कर रहे थे। वे सोशल मीडिया और यूट्यूब के माध्यम से भी छत्तीसगढ़ी कविता और विचारों का प्रसार कर रहे थे। ‘मयारू माटी’ नाम से उन्होंने प्रदेश के छत्तीसगढ़ी और हिंदी रचनाकारों का एक व्हाट्सएप समूह भी संचालित किया।

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पत्रकारिता के क्षेत्र में वे वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार के सांध्य दैनिक ‘छत्तीसगढ़’ के साप्ताहिक ‘इतवारी अखबार’ में सहायक संपादक के रूप में भी कार्यरत रहे।

सुशील भोले का निधन छत्तीसगढ़ी साहित्य और पत्रकारिता जगत के लिए अपूरणीय क्षति माना जा रहा है। उनके लेखन में लोकजीवन, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों की गहरी संवेदना झलकती थी। साहित्यिक समुदाय ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनका सृजन और वैचारिक प्रतिबद्धता आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।