सबरीमला मामले की सुनवाई में केंद्र ने PIL पर उठाए सवाल, सुप्रीम कोर्ट बोला—पहले से ही बरत रहे हैं सावधानी
सबरीमला मंदिर से जुड़े संवैधानिक विवाद की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने जनहित याचिकाओं (PIL) की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हुए कहा कि अब समय आ गया है कि इस व्यवस्था को समाप्त करने पर विचार किया जाए। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अदालतें पहले ही PIL स्वीकार करने में काफी सतर्क हो चुकी हैं।
सुनवाई के दौरान यह मुद्दा तब उठा जब जस्टिस बी.वी. नागरथना ने यह सवाल किया कि सबरीमला मामले में गैर-भक्तों द्वारा दाखिल याचिकाओं को क्यों स्वीकार किया गया। यह मामला महिलाओं के अधिकार और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन से जुड़ा है, जिसमें 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश पर प्रतिबंध को चुनौती दी गई है।
केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष लिखित दलीलों का हवाला देते हुए कहा कि PIL की अवधारणा अब अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है। उन्होंने कहा कि PIL की शुरुआत उस दौर में हुई थी जब समाज के बड़े वर्ग के लिए न्याय तक पहुंच मुश्किल थी, लेकिन अब तकनीकी विकास और ई-फाइलिंग जैसी सुविधाओं के कारण लोग सीधे अदालत तक पहुंच सकते हैं।
केंद्र सरकार ने अपनी लिखित दलीलों में कहा कि अब कानूनी सहायता के लिए राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) और जिला स्तर पर विधिक सेवा संस्थाएं मौजूद हैं, जिससे जरूरतमंदों को मदद मिल सकती है। ऐसे में “प्रेरित” और “स्वार्थ आधारित” PIL की संख्या बढ़ना चिंता का विषय है।
हालांकि, चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने केंद्र को आश्वस्त करते हुए कहा कि अदालतें अब PIL को लेकर काफी सतर्क हैं। उन्होंने कहा कि अब हर याचिका को कई मानकों पर परखा जाता है और केवल उन्हीं मामलों में नोटिस जारी होता है, जिनमें ठोस आधार होता है।
जस्टिस नागरथना ने यह भी टिप्पणी की कि मूल याचिकाकर्ता भगवान अयप्पा के भक्त नहीं थे, ऐसे में इस तरह की याचिकाओं की वैधता पर सवाल उठता है। उन्होंने संकेत दिया कि गैर-भक्तों द्वारा धार्मिक परंपराओं को चुनौती देने वाली याचिकाओं को शुरुआती स्तर पर ही खारिज किया जा सकता था।
वहीं, इस दौरान वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि यह मामला केवल सबरीमला तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे जुड़े व्यापक संवैधानिक सवाल भी हैं, जिनमें विभिन्न समुदायों में महिलाओं के अधिकार शामिल हैं।
केंद्र का तर्क क्या है?
केंद्र सरकार का कहना है कि PIL की शुरुआत एक अपवाद के रूप में हुई थी, लेकिन अब इसका दायरा इतना बढ़ गया है कि यह मूल नियम को ही प्रभावित कर रहा है। आंकड़ों का हवाला देते हुए सरकार ने बताया कि 1985 में जहां हर साल करीब 25,000 मामले दाखिल होते थे, वहीं 2019 में यह संख्या बढ़कर 70,000 से ज्यादा हो गई।
सरकार का मानना है कि PIL अब कई बार “एजेंडा आधारित मुकदमों” का माध्यम बन गई है, जिससे न्यायपालिका का समय प्रभावित होता है और असली पीड़ित पक्ष पीछे छूट जाता है।
आगे क्या?
केंद्र ने सुझाव दिया है कि सामान्य नियम के तहत वही व्यक्ति अदालत में जाए, जिसके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है। अपवाद के रूप में, जरूरतमंदों के लिए कानूनी सहायता और अन्य वैकल्पिक व्यवस्थाओं को और मजबूत किया जाना चाहिए।
अब इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम रुख क्या होता है, इस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।

