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पराधीनता के विरुद्ध स्वाभिमान का उद्घोष करने वाले छत्रपति शिवाजी

आचार्य ललित मुनि

भारत सत्रहवीं शताब्दी में एक गहन पराधीनता और सांस्कृतिक अपमान के कालखंड में जी रहा था। उत्तर में मुगल साम्राज्य की विशाल शक्ति, दक्षिण में बीजापुर और गोलकुंडा की आदिलशाही व कुतुबशाही सल्तनतें, ये सभी विदेशी मूल की शक्तियाँ हिंदू समाज को न केवल राजनीतिक गुलामी में जकड़े हुए थीं, बल्कि धार्मिक उत्पीड़न, मंदिरों के विध्वंस, जबरन धर्मांतरण और जजिया कर जैसे उपायों से उसकी आत्मा को कुचल रही थीं। हिंदू राजपूतों और अन्य क्षत्रिय वंशों के बड़े-बड़े साम्राज्य या तो मुगलों के अधीन हो चुके थे या आपसी कलह में बिखर चुके थे। जनता में स्वाभिमान की ज्योति मंद पड़ चुकी थी, लाखों लोग पराधीनता को नियति मानकर जी रहे थे।

ठीक इसी अंधकारपूर्ण युग में, चैत्र कृष्ण पक्ष तृतीया को पुणे जिले के शिवनेरी दुर्ग में जन्मा एक बालक, शिवाजी भोसले। उसने न केवल उस पराधीनता की जंजीरें तोड़ीं, बल्कि स्वाभिमान का ऐसा उद्घोष किया कि वह सदियों तक भारतीय चेतना को प्रेरित करता रहा। छत्रपति शिवाजी महाराज का सम्पूर्ण जीवन संदेश यही था ‘व्यक्तिगत आत्मसम्मान ही राष्ट्रीय स्वाधीनता की नींव है।’ उन्होंने सिद्ध किया कि एक व्यक्ति की दृढ़ इच्छाशक्ति, नैतिकता और रणनीतिक कुशलता पूरे राष्ट्र को गुलामी से मुक्त कर सकती है।

जादूनाथ सरकार ने अपनी कालजयी कृति Shivaji and His Times (1919) में लिखा है “शिवाजी ने सिद्ध कर दिया कि हिंदू जाति राष्ट्र निर्माण कर सकती है, राज्य स्थापित कर सकती है, शत्रुओं को पराजित कर सकती है, वे अपनी रक्षा स्वयं कर सकते हैं, साहित्य और कला का संरक्षण कर सकते हैं, व्यापार और उद्योग को बढ़ावा दे सकते हैं, अपनी नौसेना रख सकते हैं और विदेशियों से समुद्री युद्ध लड़ सकते हैं। उन्होंने आधुनिक हिंदुओं को अपनी पूर्ण ऊँचाई तक पहुँचने का पाठ सिखाया।” (सरकार, पृ. 406)। यह न केवल ऐतिहासिक तथ्य है, बल्कि व्यक्तिगत और राष्ट्रीय आत्मसम्मान का अमर प्रतीक भी है।

शिवाजी का जन्म भोसले वंश में हुआ। उनके पिता शहाजी भोसले बीजापुर सल्तनत के एक प्रमुख सेनापति थे, जो मुगलों और आदिलशाह के बीच लगातार बदलते गठबंधनों में फँसे रहते थे। माता जिजाबाई जाधव वंश की सुपुत्री थीं, एक अत्यंत धार्मिक, साहसी और स्वाभिमानी महिला। शिवाजी का बचपन पिता की अनुपस्थिति में माता और दादोजी कोंडदेव (पुणे जागीर के प्रशासक) की छत्रछाया में बीता। जिजाबाई ने उन्हें रामायण, महाभारत, भगवद्गीता और अपने पूर्वजों की वीरगाथाएँ सुनाईं। उन्होंने बालक शिवाजी के हृदय में हिंदू धर्म की रक्षा, स्वधर्म और स्वराज्य की ज्वाला प्रज्ज्वलित की। दादोजी ने उन्हें युद्धकला, प्रशासन, घुड़सवारी और कूटनीति सिखाई। मात्र सोलह वर्ष की आयु में शिवाजी ने तोरण दुर्ग पर कब्जा कर लिया (1646)। यह उनकी पहली बड़ी विजय थी। दुर्ग पर कब्जे के बाद उन्होंने राजगढ़ का निर्माण शुरू किया। इस घटना ने बीजापुर दरबार को चौंका दिया, लेकिन शिवाजी ने अपनी जागीर को मजबूत करना शुरू कर दिया।

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1648 में शहाजी को बीजापुर सुल्तान ने बंदी बना लिया। शिवाजी ने कूटनीति से उन्हें छुड़वाया, मुगल राजकुमार मुराद बख्श से संपर्क किया और बीजापुर पर दबाव डाला। इस घटना ने उनके व्यक्तिगत स्वाभिमान को उजागर किया: वे पिता की रक्षा के लिए विदेशी शक्तियों का उपयोग करने में भी संकोच नहीं करते थे, लेकिन कभी अधीनता स्वीकार नहीं करते थे। 1656 में उन्होंने जावली घाटी पर कब्जा किया। चंद्रराव मोरे की हत्या के बाद जावली उनके अधीन आई। यह क्षेत्र रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण था। अब शिवाजी की शक्ति बढ़ चुकी थी, उनके पास 10,000 घुड़सवार, 10,000 पैदल सैनिक और 40 दुर्ग थे।

1659 की प्रतापगढ़ की लड़ाई शिवाजी के जीवन का सबसे प्रतीकात्मक क्षण है। बीजापुर सुल्तान ने अफजल खान को 20,000 सैनिकों की विशाल सेना के साथ भेजा। अफजल खान ने शिवाजी को डराकर आत्मसमर्पण कराने की योजना बनाई। प्रतापगढ़ की तलहटी में दोनों की मुलाकात हुई। अफजल ने विश्वासघात करने की कोशिश की, लेकिन शिवाजी ने बाघनख और छुरे से उसे मार गिराया। यह निजी द्वंद्व नहीं था, यह पराधीनता के प्रतीक अफजल जैसे विशालकाय शत्रु के विरुद्ध छोटे लेकिन दृढ़ हिंदू योद्धा का स्वाभिमान था।

सेना ने हमला किया, लेकिन मराठों ने गनिमी कावा से उन्हें बुरी तरह पराजित कर दिया। लगभग 3,000 बीजापुर सैनिक मारे गए। शिवाजी ने बंदी महिलाओं और बच्चों को सम्मानपूर्वक मुक्त किया और उपहार दिए। यह घटना व्यक्तिगत साहस और नैतिकता का उदाहरण है। सरकार लिखते हैं कि “अफजल खान प्रकरण में शिवाजी की रणनीति और साहस दोनों सिद्ध होते हैं।” (सरकार, अध्याय 3)। इससे हिंदू समाज में आत्मविश्वास जगा कि विदेशी सेनापति भी पराजित किए जा सकते हैं।

1660 में पन्हाला दुर्ग पर सिद्दी जौहर की घेराबंदी हुई। शिवाजी ने रात्रि में छल से भाग निकलने की योजना बनाई। पावनखिंड में बाजी प्रभु देशपांडे और 300 मावलों ने पीछा करने वाली सेना को रोका। बाजी प्रभु की बलिदानपूर्ण मृत्यु ने शिवाजी के प्रति निष्ठा का प्रतीक बनाया। यह घटना दिखाती है कि व्यक्तिगत बलिदान राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए कितना आवश्यक है।

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1663 में मुगल सूबेदार शाइस्ता खान पुणे में शिवाजी की राजधानी पर कब्जा कर चुका था। शिवाजी ने रात्रि हमला किया। शाइस्ता खान की उँगलियाँ कट गईं, उसका बेटा मारा गया। शिवाजी बिना किसी हानि के लौट आए। यह हमला मुगल साम्राज्य की गरिमा पर सीधा प्रहार था, एक छोटे राजा ने विशाल मुगल सेना के बीच घुसकर सूबेदार को अपमानित किया। इससे मुगल सेना का मनोबल टूटा।

1664 और 1670 में सूरत की दो लूटें शिवाजी की आर्थिक और रणनीतिक कुशलता का प्रमाण हैं। सूरत मुगल साम्राज्य का समृद्ध बंदरगाह था। शिवाजी ने वहाँ से करोड़ों रुपये की संपत्ति लूटी, लेकिन यूरोपीय व्यापारियों और महिलाओं को कोई हानि नहीं पहुँचाई। उन्होंने स्पष्ट आदेश दिया था “महिलाओं, बच्चों और धार्मिक स्थलों की रक्षा करो।” यह नीति उनके व्यक्तिगत स्वाभिमान की परिचायक थी, वे लूटते थे, लेकिन बर्बरता नहीं करते थे। मुगलों की तुलना में यह नैतिक श्रेष्ठता थी।

1665 में जय सिंह की सेना से पुरंदर की संधि हुई। शिवाजी को 23 दुर्ग मुगलों को सौंपने पड़े, लेकिन उन्होंने अपनी गरिमा बनाए रखी। 1666 में आगरा में औरंगजेब के दरबार में अपमानित होने पर वे घर में बंदी कर दिए गए। लेकिन शिवाजी ने छल से मीठे के टोकरों में छिपकर भाग निकलने की योजना बनाई। यह भागना नहीं, स्वाभिमान की रक्षा थी। उन्होंने औरंगजेब के समक्ष सिर नहीं झुकाया। आगरा से लौटकर उन्होंने खोए दुर्गों को पुनः जीता, सिंहगढ़, पुरंदर आदि। 1672 में सल्हेर की लड़ाई में मुगलों को करारी हार मिली। इन घटनाओं ने सिद्ध किया कि व्यक्तिगत चतुराई और सामूहिक निष्ठा से राष्ट्रीय स्वाभिमान स्थापित किया जा सकता है।

1674 का राज्याभिषेक शिवाजी के जीवन का चरम उत्कर्ष था। 6 जून 1674 को रायगढ़ पर गागा भट्ट ने उन्हें क्षत्रिय घोषित किया और वैदिक रीतियों से छत्रपति पद पर अभिषेक किया। उन्होंने हिंदवी स्वराज्य की स्थापना की घोषणा की। यह पराधीनता के विरुद्ध सबसे बड़ा उद्घोष था। जिजाबाई का निधन इसी दौरान हुआ, लेकिन शिवाजी ने हिंदू राजकीय परंपराओं को पुनर्जीवित किया। अष्टप्रधान मंडल की स्थापना हुई, पेशवा, अमात्य, मंत्रि, सुमंत, सचिव, पंडितराव, न्यायाधीश और सेनापति। राजभाषा मराठी और संस्कृत बनाई गई।

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राजव्यवहारकोश तैयार कर फारसी शब्दों को हटाया गया। राजस्व व्यवस्था में रैयतों की रक्षा की गई, किसान को शोषण से बचाया। महिलाओं की इज्जत सर्वोच्च थी; सैनिकों को आदेश था कि युद्ध में महिलाओं को छेड़ना मृत्युदंड का अपराध है। बंदी मुस्लिम महिलाओं को सम्मानपूर्वक लौटाया जाता था। शिवाजी ने मंदिरों का संरक्षण किया, लेकिन मस्जिदों को भी छुआ नहीं। मुस्लिम सैनिक और अधिकारी उनकी सेना में थे। यह धार्मिक सहिष्णुता व्यक्तिगत उदारता और राष्ट्रीय एकता दोनों का प्रतीक थी।

शिवाजी की नौसेना का निर्माण भी स्वाभिमान का प्रतीक था। उन्होंने सिद्दी और पुर्तगालियों के समुद्री आक्रमणों से बचाव के लिए 400 जहाजों की नौसेना खड़ी की। सिंधुदुर्ग दुर्ग को नौसेना का मुख्यालय बनाया। वे भारतीय नौसेना के जनक कहे जाते हैं। इससे सिद्ध हुआ कि हिंदू शक्ति समुद्र पर भी आत्मनिर्भर हो सकती है।

व्यक्तिगत स्तर पर शिवाजी अत्यंत नैतिक थे। वे माता के प्रति अत्यंत श्रद्धालु थे। पत्नियों और पुत्रों के साथ पारिवारिक जीवन सरल था। उन्होंने कभी मदिरा या व्यसन नहीं किया। शत्रुओं के प्रति भी उदारता दिखाई, अफजल खान की विधवाओं को सम्मान दिया। उनकी मृत्यु 3 अप्रैल 1680 को रायगढ़ पर हुई। अंतिम दिनों में उन्होंने पुत्र संभाजी को स्वराज्य की रक्षा का उपदेश दिया।

शिवाजी का जीवन संदेश आज भी प्रासंगिक है। उन्होंने सिखाया कि व्यक्तिगत आत्मसम्मान बिना राष्ट्रीय स्वाभिमान संभव नहीं। उन्होंने हिंदू समाज को गुलामी की मानसिकता से मुक्त किया। बाल गंगाधर तिलक ने 1895 से शिवाजी जयंती मनाकर राष्ट्रीय जागरण किया। उन्होंने कहा “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।” तिलक शिवाजी को आदर्श मानते थे। विनायक दामोदर सावरकर, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी जो उन्हें नैतिक योद्धा मानते थे, सभी ने शिवाजी से प्रेरणा ली। स्वतंत्रता संग्राम में शिवाजी के गनिमी कावा ने क्रांतिकारियों को रणनीति दी। आज भी महाराष्ट्र में शिवाजी मराठी अस्मिता और भारतीय एकता के प्रतीक हैं।

शिवाजी ने सिद्ध किया कि स्वाभिमान की ज्योति कभी बुझती नहीं। उनका जीवन हमें बताता है, पराधीनता स्वीकार करने से बेहतर है मृत्यु, लेकिन जीवित रहकर स्वराज्य स्थापित करना सर्वोत्तम है। व्यक्तिगत स्तर पर वे साहस, नैतिकता और चतुराई के प्रतीक हैं; राष्ट्रीय स्तर पर वे स्वाधीनता, न्याय और सहिष्णुता के।