रायगढ़ के पॉलिटेक्निक का नाम परिवर्तन कर सेठ किरोड़ीमल की विरासत को मिटाने का प्रयास
रायगढ़, छत्तीसगढ़ का यह छोटा-सा शहर, जो कभी जंगलों और नदियों की गोद में एक साधारण कस्बा मात्र था, आज शिक्षा, स्वास्थ्य और औद्योगिक विकास की चमकदार मिसाल बन चुका है। इस परिवर्तन की जड़ें एक ऐसे महान आत्मा से जुड़ी हैं, जिन्होंने अपनी सारी संपत्ति को समाज की भेंट चढ़ा दिया उनका नाम सेठ किरोड़ीमल है। वे न केवल एक सफल व्यापारी थे, बल्कि एक सच्चे दानवीर, जिनकी उदारता ने रायगढ़ को नई ऊँचाइयों पर पहुँचा दिया। लेकिन आज, जब हम उनकी स्मृति को ताजा करने की कोशिश करते हैं, तो एक दर्दनाक सच्चाई सामने आती है, जिससे लोग व्यथित हैं। उनके नाम पर बने ऐतिहासिक संस्थान, किरोड़ीमल शासकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज का नाम बदलकर ‘छत्तीसगढ़ इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ करने का फैसला। यह निर्णय न केवल एक नाम का परिवर्तन है, बल्कि एक महान विरासत का अपमान है और लाखों लोगों की भावनाओं का ठेस पहुँचाने वाला कदम।
सेठ किरोड़ीमल का जन्म 15 जनवरी 1882 को हरियाणा के हिसार जिले के जाटू लुहारी गाँव में एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। कल्पना कीजिए, एक ऐसा बालक जो किताबों से ज्यादा जीवन की कठोर किताबों से सीखता है। वे अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे। कम उम्र में ही व्यापार की ओर रुख किया, और भाग्य ने उनका साथ दिया। कलकत्ता पहुँचकर उन्होंने जूट के कारोबार से शुरुआत की, छोटे-छोटे सौदों से बड़ा साम्राज्य खड़ा किया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उनकी मानवता की मिसाल देखिए, उन्होंने न केवल मित्र राष्ट्रों को, बल्कि जापान जैसे शत्रु पक्ष को भी खाद्यान्न दान किया। पक्षपात की कोई गुंजाइश नहीं, बस इंसानियत। स्वतंत्रता के बाद अंग्रेज अधिकारियों के विदाई समारोहों में उनकी भूमिका ने उनके कारोबार को नई ऊँचाई दी, लेकिन सेठ जी के लिए धन कभी अंत नहीं था, बल्कि साधन था। निःसंतान होने के कारण उनका सारा प्रेम समाज की ओर बहा। 13 मई 1946 को उन्होंने किरोड़ीमल धर्मार्थ ट्रस्ट की स्थापना की, जिसमें 30 लाख रुपये नकद और अनेक संपत्तियाँ दान कीं। यह ट्रस्ट आज भी उनके सपनों को जीवित रखे हुए है।
रायगढ़ में सेठ जी का आगमन 20वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में हुआ। तब रायगढ़ राजशाही के पतन के बाद एक पिछड़े इलाके की तरह था, न सड़कें, न अस्पताल, न शिक्षा के मंदिर। सेठ जी ने देखा, महसूस किया, और संकल्प लिया कि इस शहर को आधुनिक भारत का आईना बनाऊँगा। उन्होंने छत्तीसगढ़ का पहला जूट मिल स्थापित किया, जो रायगढ़ को औद्योगिक केंद्र बनाने का आधार बना। कलकत्ता से माल की आपूर्ति, स्थानीय संसाधनों का सदुपयोग, इन सबने हजारों परिवारों को रोजगार दिया। लेकिन सेठ जी का असली जादू तो उनके दान में था। उन्होंने कहा था, “धन कमाना आसान है, लेकिन उसे सही जगह लगाना कला है।” और उन्होंने यह कला में महारत हासिल कर ली। शिक्षा को उन्होंने अपना सबसे प्रिय क्षेत्र माना, क्योंकि वे जानते थे कि अज्ञानता ही गरीबी की जड़ है। स्वास्थ्य के बिना जीवन अधूरा, इसलिए अस्पताल। और आस्था के बिना आत्मा सूनी, इसलिए मंदिर। उनके हर दान में निस्वार्थ सेवा की भावना थी।
शिक्षा के क्षेत्र में सेठ जी का योगदान तो ऐसा है कि रायगढ़ के हर बच्चे की पहली किताब उनके नाम से शुरू होती है। 1955 में उन्होंने किरोड़ीमल शासकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज की स्थापना की, जो मध्य प्रदेश (तब छत्तीसगढ़ इसका हिस्सा था) का पहला ऐसा संस्थान था। कल्पना कीजिए उस दौर की, जब देश आजाद हुआ था, इंजीनियरों की कमी थी, और तकनीकी शिक्षा एक सपना मात्र। सेठ जी ने 20 लाख रुपये दान किए, एक ऐसा अनुबंध किया जिसमें स्पष्ट लिखा था कि यह संस्थान उनके नाम से चलेगा, और नाम कभी नहीं बदलेगा। शिलान्यास तत्कालीन मुख्यमंत्री रविशंकर शुक्ल ने किया, और उद्घाटन भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 18 सितंबर 1956 को।
यह कॉलेज आकार में किसी छोटे विश्वविद्यालय जैसा था, सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के सभी कोर्स, लैबोरेट्री, वर्कशॉप। पिछले 69 वर्षों में यहाँ से लाखों इंजीनियर निकले हैं, जिन्होंने न केवल छत्तीसगढ़, बल्कि पूरे देश को समृद्ध किया। डॉ. आर.जी. बुलदेव जैसे नाम आज भी इसकी गौरवगाथा गाते हैं। इसके अलावा, नटवर हाईस्कूल, किरोड़ीमल विज्ञान कला महाविद्यालय, आदर्श बाल मंदिर, बाल सदन ये सब सेठ जी की देन हैं। 1954-55 में स्थापित पुस्तकालय आज भी ज्ञान का सागर है। इन संस्थानों ने रायगढ़ के गरीब बच्चों को पंख दिए, जो कभी सपने में भी दिल्ली या मुंबई के कॉलेज नहीं सोचते थे। सेठ जी कहते थे, “शिक्षा वह दीपक है जो अंधेरे को हमेशा के लिए भगा देता है।” और उन्होंने वह दीपक जलाया, जो आज भी जल रहा है।
स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी सेठ जी की उदारता देखने लायक थी। 1947 में महात्मा गांधी नेत्र चिकित्सालय की स्थापना की, जिसका लोकार्पण राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ने किया। यहाँ आँखों के रोगों का निःशुल्क इलाज होता था।गरीबों के लिए एक वरदान। फिर अशर्फी देवी महिला चिकित्सालय, जिसका उद्घाटन पं. रविशंकर शुक्ल ने किया। आधुनिक एक्स-रे मशीनें, विशेषज्ञ डॉक्टर, यह चिकित्सालय महिलाओं के स्वास्थ्य का संरक्षक बना और किरोड़ीमल सरकारी अस्पताल, जो आज जिला चिकित्सालय के रूप में जाना जाता है। ट्रस्ट द्वारा सभी खर्च वहन किए जाते थे, ताकि कोई इलाज के अभाव में न मरे। सेठ जी जानते थे कि स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ समाज बनाता है। युद्धकाल में उन्होंने खाद्यान्न दान किया, स्वतंत्रता संग्राम में सहयोग दिया, उनकी दानशीलता सीमाओं से परे थी।
धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में भी सेठ जी ने रायगढ़ को समृद्ध किया। 1946 में गौरीशंकर मंदिर का निर्माण, राजस्थानी शैली का संगमरमर का भव्य स्वरूप। पं. रविशंकर शुक्ल ने शिलान्यास किया, और आज ‘झूला मेला’ लाखों श्रद्धालुओं को खींचता है। उन्होंने अनेक धर्मशालाएँ दिल्ली, मथुरा, मेण्डीपुर, भिवानी, पचमढ़ी, रायपुर, किरोड़ीमल नगर में बनवाई। यात्रियों को मुफ्त भोजन-पानी, कुएँ जैसे भारत कूप और बावली कुआँ आदि ये सब ट्रस्ट के माध्यम से बने। सेठ जी का मानना था कि आस्था और सेवा का मेल ही जीवन का सार है। उनके दान ने रायगढ़ को न केवल भौतिक, बल्कि आध्यात्मिक रूप से भी मजबूत किया।
अब आते हैं उस दर्द भरी घटना पर, जो सेठ जी की सारी मेहनत को पानी-पानी करने का प्रयास है, किरोड़ीमल शासकीय पॉलिटेक्निक का नाम बदलना। हाल ही में, छत्तीसगढ़ सरकार ने इस 69 वर्ष पुराने गौरवशाली संस्थान का नाम ‘छत्तीसगढ़ इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ कर दिया। कारण? शायद आधुनिकीकरण का बहाना, लेकिन सच्चाई यह है कि यह एक राजनीतिक साजिश लगती है। रायगढ़ में राजनीतिक हलचल मच गई है। पूर्व छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा है, वे सड़कों पर उतर आए, नारेबाजी कर रहे हैं, क्योंकि यह नाम बदलना सेठ जी की विरासत से छेड़छाड़ है। ट्रस्ट ने तो 1955 का मूल अनुबंध ही खोल दिया, जिसमें साफ-साफ लिखा है कि 20 लाख के दान पर बने इस कॉलेज का नाम कभी नहीं बदला जाएगा। मुख्य सचिव और कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा गया, लेकिन सरकार का रवैया ठंडा है। सोशल मीडिया पर हंगामा मचा है।
यह विरोध केवल नाम का नहीं, बल्कि सम्मान का है। सेठ जी ने अपना सब कुछ देकर यह कॉलेज बनवाया। वे अनपढ़ थे, लेकिन उन्होंने पढ़े-लिखे इंजीनियर पैदा किए। आज अगर रायगढ़ में तकनीकी शिक्षा की जड़ें हैं, तो वे सेठ जी की ही हैं। नाम बदलना मतलब इतिहास को मिटाना। पूर्व छात्र कहते हैं, “हमने डिप्लोमा लिया किरोड़ीमल से, नौकरी की किरोड़ीमल के नाम पर। अब यह नाम गायब हो जाए, तो हमारी पहचान क्या बचेगी?” यह भावना हर उस व्यक्ति की है जो सेठ जी की कहानी से जुड़ा है। कल्पना कीजिए, दिल्ली विश्वविद्यालय का किरोड़ीमल कॉलेज भी उनके नाम पर है, वहाँ नाम बदलने की बात उठी होती तो क्या होता?
इस निर्णय के पीछे की राजनीति को समझिए। कुछ लोग कहते हैं कि यह डबल इंजन सरकार का प्रयास है, केंद्र और राज्य दोनों में एक ही दल। लेकिन दानवीर की विरासत से ऊपर कोई राजनीति नहीं होनी चाहिए। सेठ जी ने युद्ध में पक्षपात नहीं किया, स्वतंत्रता में सभी का साथ दिया। आज उनके नाम को मिटाने की कोशिश क्यों? क्या यह छत्तीसगढ़ की पहचान को कमजोर करना है? रायगढ़ के विकास में सेठ जी का हाथ है, जूट मिल से लेकर मंदिर तक। पॉलिटेक्निक तो उनका हृदय है। 69 सालों में यह संस्थान लाखों जिंदगियाँ बदला। अगर नाम बदल दिया, तो आने वाली पीढ़ियाँ क्या सीखेंगी? कि दान की कोई कीमत नहीं? कि इतिहास को भुला दो? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।
सेठ जी की दानवीर उपाधि कोई संयोग नहीं थी। ‘दानवीर’ शब्द में वीरता है जो धन के मोह को त्यागकर समाज को समर्पित हो जाता है। राजस्थान के भामाशाह की तरह, सेठ जी ने संपत्ति का बड़ा हिस्सा दान किया। निस्वार्थ, बिना अपेक्षा। युद्ध में दान, स्वतंत्रता में सहयोग, यह उनकी व्यापक सोच थी। रायगढ़वासी उन्हें आज भी अविभावक मानते हैं। उनकी जयंती पर स्मृति सभा होती है, लोग उन्हें याद करते हैं। लेकिन यह नाम बदलना उस स्मृति पर प्रहार है। अगर पॉलिटेक्निक का नाम बदल दिया, तो कल गौरीशंकर मंदिर का क्या? नेत्र चिकित्सालय का क्या? यह एक खतरनाक सिलसिला शुरू कर देगा। सेठ जी ने कहा था, “मेरा नाम मिट जाए, लेकिन कार्य अमर रहें।” लेकिन कार्य तो नाम से जुड़े हैं। नाम ही तो प्रेरणा देता है।
हम विरोध करते हैं, क्योंकि यह न्याय का सवाल है। 1955 का अनुबंध कानूनी दस्तावेज है, उसका उल्लंघन अपराध है। ट्रस्ट ने मुख्य सचिव को पत्र लिखा, कलेक्टर को ज्ञापन दिया। लेकिन सरकार चुप है। पूर्व छात्र सड़कों पर हैं, सोशल मीडिया पर आवाज उठा रहे हैं। हमें चाहिए कि यह आंदोलन पूरे छत्तीसगढ़ तक फैले। सेठ जी की विरासत राष्ट्रीय है, दिल्ली से रायगढ़ तक। सेठ किरोड़ीमल का जीवन एक उपन्यास है, संघर्ष से सफलता, सफलता से सेवा तक। कलकत्ता की गलियों से रायगढ़ के मैदानों तक। उनका निधन 2 नवंबर 1965 को हुआ, लेकिन वे जीवित हैं हर अस्पताल की दीवारों में, हर क्लासरूम की बेंच पर। रायगढ़ में उनके नाम पर सड़कें, कॉलोनियाँ हैं। लेकिन पॉलिटेक्निक उनका ताज है। नाम बदलना ताज उतारना है। सरकार इस विषय में सोचे, पुराना नाम बहाल हो, वरना इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।

