हिन्दुओं को बाँटने के कुचक्र के बीच हिन्दुओं को जाग्रत और संगठित करने का अभियान हिन्दु सम्मेलन
भारत राष्ट्र के रूपांतरण के लिए चल रहे षड्यंत्र से सनातन समाज को जागरूक करने के संकल्प के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रेरणा से देशभर में सकल हिंदू सम्मेलन का अभियान आरंभ हुआ है, जो जनवरी माह के अंत तक चलेगा। इन सम्मेलनों के बाद समाज में संगठनात्मक समरसता और दायित्वबोध की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगी है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी सांस्कृतिक और सामाजिक यात्रा के सौ वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। संघ की स्थापना वर्ष 1925 में 27 सितंबर, विजयदशमी के दिन हुई थी। संघ की पहली शाखा में केवल छह स्वयंसेवक थे, जबकि आज यह विश्व का सबसे बड़ा सामाजिक संगठन बन चुका है। केवल भारत में ही संघ की 83,129 दैनिक शाखाएँ संचालित हो रही हैं। तकनीकी रूप से भले ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को संगठन कहा जाए, किंतु यह वास्तव में करोड़ों कार्यकर्ताओं का एक पारिवारिक स्वरूप है।
संघ की स्थापना से लेकर अब तक की शताब्दी यात्रा में निरंतर हमले हुए। अंग्रेजी काल के अतिरिक्त स्वतंत्रता के बाद भी संघ पर तीन बार प्रतिबंध लगाए गए। संघ के कार्यकर्ताओं और प्रचारकों पर हमले हुए, हत्याएँ हुईं और निरंतर शाब्दिक आक्रमण होते रहे। गांधीजी की हत्या के प्रकरण में संघ को झूठा फँसाया गया, लेकिन इन सभी संकटों के बावजूद संघ की ध्येयनिष्ठ यात्रा में कोई विचलन नहीं आया। हर चुनौती के बाद संघ और अधिक संकल्पशील होकर आगे बढ़ा।
संघ ने अपने शताब्दी वर्ष को उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि अपने ध्येय को गति देने के निमित्त के रूप में मनाया। शताब्दी यात्रा के उपलक्ष्य में संघ द्वारा तीन प्रमुख अभियान संचालित किए गए। पहला, गणवेशधारी स्वयंसेवकों का पथ संचलन। दूसरा, हर घर संपर्क अभियान। तीसरा, “जात-पात की करो विदाई, हम सब हिंदू भाई-भाई” के उद्घोष के साथ सकल हिंदू सम्मेलनों का आयोजन।
2 अक्टूबर से 12 अक्टूबर 2025 के बीच देशभर की बस्तियों में विशाल पथ संचलन आयोजित किए गए, जिनमें सरसंघचालक से लेकर सामान्य स्वयंसेवक तक सभी गणवेश में सम्मिलित हुए। इसके पश्चात 15 नवंबर से 30 नवंबर 2025 के बीच गृह संपर्क अभियान चलाया गया, जिसमें “संगठित हिंदू, समर्थ भारत” का संदेश प्रत्येक घर तक पहुँचाया गया।
इसी क्रम में 20 दिसंबर 2025 से सकल हिंदू सम्मेलनों का आयोजन प्रारंभ हुआ। छोटे ग्रामों से लेकर महानगरों तक एक लाख से अधिक सम्मेलनों की योजना बनाई गई, जिन्हें 20 जनवरी 2026 तक पूर्ण किया जाना था। कुछ क्षेत्रों में यह तिथि बढ़ाई गई है और संभावना है कि 25 जनवरी तक लक्ष्य पूर्ण हो जाएगा। यद्यपि इन सम्मेलनों की प्रेरणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की है, किंतु इनका आयोजन स्थानीय स्तर पर सकल हिंदू समाज द्वारा किया जा रहा है।
देशभर से प्राप्त समाचारों के अनुसार इन सम्मेलनों में हिंदू समाज की उत्साहपूर्ण सहभागिता देखने को मिली है। विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों और सेवा बस्तियों में अपेक्षाकृत अधिक उत्साह दिखाई दिया। सम्मेलन में भागीदारी से भी अधिक उत्साह सम्मेलन के बाद समाज में उत्पन्न समरसता के वातावरण में देखने को मिला।
प्रत्येक सम्मेलन में तीन प्रकार के मुख्य वक्ता रहे। एक संत समाज से, दूसरा सामाजिक एवं सांस्कृतिक संगठनों से जुड़ी मातृशक्ति और तीसरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबंधित वक्ता। संतों ने शास्त्रों और पुराणों के माध्यम से समाज को अपनी परंपराओं से जुड़ने और एकजुट रहने का संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जातिगत भेद सल्तनतकाल और अंग्रेजी काल की देन हैं, जबकि सनातन परंपरा में सभी ऋषि-संतों की संतान हैं।
मातृशक्ति वक्ताओं ने कुटुंब समन्वय, स्वत्वबोध, स्वदेशी, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक कर्तव्यों पर बल दिया। वहीं संघ से जुड़े वक्ताओं ने संघ की शताब्दी यात्रा, सामाजिक चुनौतियों और इतिहास से उदाहरण देकर सजग एवं संगठित समाज की आवश्यकता को रेखांकित किया।
इन सम्मेलनों के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि कुछ शक्तियाँ योजनाबद्ध ढंग से सनातन हिंदू समाज को विभाजित करने का प्रयास कर रही हैं। जन्म और जाति के आधार पर समाज में भ्रम और असंतोष फैलाया जा रहा है, जबकि भारतीय समाज व्यवस्था सदैव गुण और कर्म आधारित रही है।
इतिहास और पुराणों में इसके असंख्य उदाहरण हैं। कुबेर और रावण एक ही पिता की संतान होते हुए भी अपने कर्मों के कारण अलग-अलग स्थान प्राप्त करते हैं। माता शबरी, महर्षि व्यास, महर्षि वाल्मीकि, नंद और मौर्य वंश, रानी दुर्गावती और संत रविदास जैसे उदाहरण भारतीय समाज की समरस परंपरा को प्रमाणित करते हैं।
इन सम्मेलनों के माध्यम से समाज को यह समझाने का प्रयास किया गया कि व्यक्ति का मूल्यांकन जन्म, जाति या संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके कर्म से होता है। सामाजिक समरसता ही राष्ट्र उत्थान की सबसे बड़ी शक्ति है। सम्मेलन के पश्चात कई बस्तियों में आपसी विवादों के समाधान संवाद के माध्यम से होने लगे हैं, जो भारत के भविष्य के लिए एक सकारात्मक संकेत है।
