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सामाजिक समरसता को समर्पित संघ, हमेशा समाज को एक सूत्र में बांधने का किया काम

-अदिति नारायणी पासवान

भारत की संस्कृति का मूल तत्व ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ का आदर्श रहा है। यहां जाति, भाषा और प्रांत की विविधता होते हुए भी एक गहरी एकात्मता रही है। बाहरी आक्रमण और सामाजिक कुरीतियों के बावजूद भारत की एकात्मता आज तक कमजोर नहीं हुई, वह एक जैसी बनी हुई है। समाज को जाति-पांति, ऊंच-नीच के मानसिक बंधनों से मुक्त करने और हिंदू समाज को एक कर संगठित करने के लिए डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में आरएसएस की स्थापना की।
उस समय भारत पराधीनता, सामाजिक भेदभाव, ब्रिटिश शासन, ईसाई मिशनरी और मुस्लिम लीग के षड्यंत्रों से संघर्ष कर रहा था। बाहरी आक्रांता चाहे मुगल हों या अंग्रेज, उन्होंने न केवल भारत का आर्थिक शोषण किया, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक चेतना पर आघात का भी प्रयास किया, जिसमें वे पूरी तरह सफल नहीं हो पाए। ऐसे कठिन समय में संघ ने यह लक्ष्य रखा कि भारत को केवल राजनीतिक आजादी नहीं चाहिए, बल्कि उसे सांस्कृतिक, सामाजिक, वैचारिक और आध्यात्मिक रूप से भी स्वतंत्र होना होगा। संघ का उद्देश्य स्पष्ट था-समाज को संगठित कर राष्ट्र को सशक्त बनाना।’

आरएसएस की स्थापना के बाद धीरे-धीरे इसकी शाखाएं पूरे देश में फैलने लगीं। संघ की कार्यप्रणाली का मूल आधार था-शाखा, जिसमें स्वयंसेवक प्रतिदिन खेल, योग, देशभक्ति गीत और अनुशासनात्मक गतिविधियों के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का विकास करते हैं। संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने हाल में कहा, ‘संघ केवल संगठन नहीं, बल्कि एक विचारधारा है, जो समाज को जोड़ने और सशक्त बनाने के लिए काम कर रही है।’ संघ तीन प्रमुख बातों पर केंद्रित रहता है-आत्मविश्लेषण और सुधार, समाज के समर्थन को स्वीकार करना तथा राष्ट्र सेवा के लिए स्वयं को पुनः समर्पित करना।

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संघ की शाखाओं में जब स्वयंसेवक पंक्ति में खड़े होते हैं, तो वहां किसी की जाति, वर्ण या आर्थिक स्थिति नहीं पूछी जाती। संघ की शाखा स्वयं सामाजिक-समरसता का जीवंत प्रतीक है। आज जब राजनीतिक दलों द्वारा नागरिकों को मतदाताओं के रूप में और सामाजिक जाति समूहों को वोट बैंक के रूप में देखा जा रहा है और इनके आधार पर समाज के कृत्रिम विभाजन का प्रयास किया जा रहा है, तब संघ का सामाजिक समरसता का प्रयास अधिक आवश्यक, अधिक उपयोगी और अधिक प्रासंगिक होता जा रहा है।

आज सामाजिक समरसता समाज की अपरिहार्य आवश्यकता है। यदि भारत को विश्वगुरु बनाना है तो जाति, भाषा और क्षेत्र की दीवारों को गिराना होगा। संघ का दृष्टिकोण स्पष्ट है, ‘हम सब एक हैं और हमारी शक्ति हमारी एकता में है।’ डा. हेडगेवार ने मंदिर प्रवेश आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की, ताकि हर जाति के लोग एक ही देवालय में पूजा कर सकें। 1930-40 के दशक से ही दलित और वनवासी समाज को संघ की शाखाओं में बराबरी से स्थान मिला है। संघ ने 1925 में भेदभाव मिटाने की जो नींव रखी, उसे वह शिक्षा-सेवा के माध्यम से व्यवहार में उतार रहा है और भविष्य में एक समरस, संगठित और सशक्त भारत बनाने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है।

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वैश्विक स्तर पर भी भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार कर प्रवासी भारतीयों के बीच संघ शाखाएं और गतिविधियां चलाकर भारतीयता को जीवित रख रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सौ वर्षों का इतिहास केवल एक संगठन की कथा नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना की गाथा है। इसने राष्ट्रीय चेतना को आचरण में उतारा, समाज को समरसता की ओर प्रेरित किया और करोड़ों स्वयंसेवकों ने समाज में सेवा, अनुशासन और समर्पण की भावना जगाई। आज संघ का योगदान और प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक है। संघ का यह शताब्दी वर्ष इसका प्रतीक है कि यदि संगठन अनुशासन, सेवा और समरसता पर आधारित हो तो वह न केवल राष्ट्र को नई दिशा दे सकता है, बल्कि समाज को भी एक सूत्र में बांध सकता है।

आज जब समाज को विभिन्न मत, पंथ, विचारधाराएं और राजनीतिक स्वार्थ के लिए बांटने की कोशिश की जा रही हैं, तब संघ का संदेश और प्रासंगिक हो जाता है। यदि हमें सशक्त और अखंड भारत बनाना है तो जाति, भाषा और क्षेत्र की दीवारें गिरानी होंगी। हमें अपने समाज को अपने परिवार की तरह मानना, समझना और उसके अनुरूप व्यवहार करना होगा। हम सब एक ही राष्ट्र के अंग हैं और हमारी शक्ति हमारी एकता में है। संघ का पथ कठिन अवश्य है, परंतु प्रकाशमान है।

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जिस दिन भारत का हर नागरिक यह अनुभव कर लेगा कि उसका सुख-दुख, उसका मान-सम्मान पूरे समाज से जुड़ा हुआ है और पूरा भारतीय समाज उसका वृहद परिवार है, उसी दिन सच्ची सामाजिक समरसता स्थापित होगी। भारत को अखंड, सशक्त और समरस बनाने का यह अभियान केवल संघ का नहीं, बल्कि हम सबका कर्तव्य है। संघ ने भारतीय समाज को एकजुट करने, सेवा की भावना जगाने और राष्ट्रभक्ति की अलख जलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चाहे सामाजिक समरसता हो, शिक्षा हो, सेवा कार्य हों या राष्ट्र की नीतियां, हर क्षेत्र में इसका योगदान स्पष्ट है। संघ के प्रयास हमें यह संदेश देते हैं कि समरस समाज ही सशक्त राष्ट्र का आधार है। यही भारत के उज्ज्वल भविष्य की कुंजी है।

(लेखिका दिल्ली यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं)