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RSS प्रमुख मोहन भागवत का विजयादशमी संबोधन: “भारत के पुनर्जागरण” का खाका, आतंकवाद से लेकर आर्थिक असमानता तक पर चिंता

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के शताब्दी वर्ष के विजयादशमी उत्सव पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक व्यापक दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए देश और समाज के समक्ष खड़ी कई समकालीन चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए। नागपुर में वार्षिक संबोधन के दौरान उन्होंने आतंकवाद, पड़ोसी देशों की स्थिति, आर्थिक विषमता, आत्मनिर्भरता और पर्यावरणीय संकट जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाया।

भागवत ने कहा कि संघ के 100वें वर्ष में यह केवल उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि “कर्तव्यों की पुनः समीक्षा” करने का अवसर है। उन्होंने हालिया घटनाओं को देश की “आस्था और आशा को सुदृढ़ करने वाला” बताया, वहीं भविष्य के लिए नए खतरे भी चिन्हित किए।

1. पहलगाम आतंकी हमला: “दुनिया को पहचानने का मौका मिला”

भागवत ने जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में 22 अप्रैल को हुए आतंकी हमले का उल्लेख किया, जिसमें 26 हिंदू पर्यटक मारे गए थे। उन्होंने इसे भारतीय समाज की एकजुटता और नेतृत्व की दृढ़ता का प्रमाण बताया।

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“सरकार ने मई महीने में इस हमले का माकूल जवाब दिया। इस दौरान देश के नेतृत्व की स्पष्टता, सेना की तत्परता और समाज की एकजुटता देखने को मिली,” उन्होंने कहा।

भागवत ने यह भी जोड़ा कि इस घटना से वैश्विक मंच पर यह स्पष्ट हो गया कि “हमारे सच्चे मित्र कौन हैं” और कौन केवल दिखावटी समर्थन करते हैं।

2. नक्सलवाद पर नियंत्रण, लेकिन सतत विकास आवश्यक

आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में उन्होंने कहा कि वामपंथी उग्रवाद को काफी हद तक काबू में कर लिया गया है, लेकिन अब इन क्षेत्रों में न्याय, सहानुभूति और विकास सुनिश्चित करना आवश्यक है।

“नक्सल आंदोलन की हिंसा और विचारधारा की खोखली प्रकृति को जनता ने पहचाना है। अब समय है कि इन क्षेत्रों को स्थायी विकास और विश्वास के मार्ग पर आगे बढ़ाया जाए,” उन्होंने कहा।

3. आर्थिक असमानता पर चेतावनी: “स्वदेशी का कोई विकल्प नहीं”

संघ प्रमुख ने मौजूदा आर्थिक ढांचे की आलोचना करते हुए कहा कि यह व्यवस्था अमीर और गरीब के बीच की खाई को और चौड़ा कर रही है।

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“बाजारवाद और उपभोगवाद के इस युग में मानवीय रिश्ते भी लेन-देन की भावना से ग्रस्त हो गए हैं। आर्थिक शक्ति कुछ हाथों में सिमटती जा रही है,” उन्होंने कहा।

भागवत ने स्वदेशी और आत्मनिर्भरता को समय की आवश्यकता बताया। “अमेरिका की टैरिफ नीतियां दिखाती हैं कि आत्मनिर्भरता ही दीर्घकालीन समाधान है,” उन्होंने कहा।

4. हिमालयी पारिस्थितिकी संकट को चेतावनी के रूप में देखा जाए

भागवत ने पर्यावरणीय संकट की ओर ध्यान खींचते हुए कहा कि हिमालय क्षेत्र में वर्षा की अनियमितता, भूस्खलन और ग्लेशियरों के सूखने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।

“हिमालय हमारी सुरक्षा की दीवार और जल स्रोत दोनों है। यदि हमने अभी नहीं चेतना शुरू किया, तो आने वाले समय में पानी और खाद्य सुरक्षा पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है,” उन्होंने कहा।

5. पड़ोसी देशों में उथल-पुथल और लोकतांत्रिक रास्ते की वकालत

भागवत ने नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में हालिया राजनीतिक अस्थिरता पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हिंसक प्रदर्शनों के जरिए टिकाऊ परिवर्तन नहीं लाया जा सकता।

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“हमारे पड़ोसी केवल हमारे रणनीतिक हितों के कारण महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से भी हमारे परिवार का हिस्सा हैं,” उन्होंने कहा।

उन्होंने यह भी कहा कि भारत को इन देशों में शांति, स्थिरता और समृद्धि सुनिश्चित करने में मदद करनी चाहिए, क्योंकि इसका असर सीधे भारत पर भी पड़ता है।

मोहन भागवत का यह संबोधन न केवल संघ के भविष्य की दिशा तय करता है, बल्कि वर्तमान राष्ट्रीय और वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका पर भी गंभीर विमर्श प्रस्तुत करता है। उनका फोकस केवल चुनौतियों को चिन्हित करने तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाधान की ओर भी स्पष्ट इशारा किया — “आत्मनिरीक्षण, आत्मनिर्भरता और सामाजिक समरसता।”