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ननिहाल छत्तीसगढ़ में राम तत्व

आचार्य ललित मुनि

भारत के मानचित्र में हृदय स्थल पर छत्तीसगढ़ प्रदेश स्थित है। लोक मान्यता है कि यहाँ भगवान राम ने वनवास काल के चौदह वर्षों में से दस वर्ष बिताए। यह एक ऐसा स्थान है कि जहाँ का वातावरण आपको राममय दिखाई देता है। सारा अंचल राम नाम से ओतप्रोत है। भगवान राम भी यहाँ आए और यहीं के होकर रह गए। ऐसे रचे बसे कि यहाँ की संस्कृति के रोम-रोम में समा गए। कण कण में राम तत्व समाहित हो गया।

किसी के यहाँ बच्चा जन्म लेने पर गृह स्वामी द्वारा रामचरित मानस का पाठ करने की परम्परा है। गाँव गाँव में रामचरित मानस गान एवं व्याख्यान करने वाली दल होते हैं, जो निमंत्रण पर आकर रात्रि काल में सार्वजनिक रुप से रामचरित मानस का पाठ करते हैं। लोग रामचरित पर टीका सुनते हैं एवं रामचरित का सस्वर गान करते हैं। कहीं कहीं यह कार्यक्रम रात भर भी चलता है। रामायण दल को गृह स्वामी द्वारा धन धान्य देकर विदा किया जाता है।

ग्रामीण अंचल में राम सप्ताह मनाने की भी परम्परा है। किसान जब फ़सल कटने के बाद अवकाश पा लेता है, तब गाँव गाँव में राम सप्ताह का आयोजन होता है। इसमें आस पास के गाँवों की टोली मिलकर अखंड राम भजन करती हैं। कहीं सप्ताह भर यह अखंड आयोजन होता है तो कहीं दो तीन दिन का। राम धुन नाचते गाते यह कार्यक्रम तय सीमा तक अनवरत चलता है। इसके बाद आयोजकों द्वारा रामधुनी या राम सप्ताह दल को सम्मानजनक दक्षिणा देकर विदा किया जाता है।

यहाँ का खेती भी राम पर ही आश्रित मानी जा सकती है। राम की चिड़िया राम का खेत, खाए जा चिड़िया भरपेट। किसान जब खेत में धान की बुआई करता है तो राम सुमिरता है। गाँव के ठाकुर देव की आराधना करता है, ग्राम देवता, एवं खेती के रक्षक देवों का सुमिरन करता है। जब फ़सल तैयार हो जाती है और खलिहान में लाकर निकालकर रास सजा ली जाती है तो काठा (काठ का माप) से नापते हुए भी राम का सुमिरन होता है। राम नाम से ही फ़सल का नाप प्रारंभ होता है।

अपनी साल भर की कमाई राम को समर्पित कर देना राम के प्रति समर्पण का उद्दात भाव है, राम जन जन के हृदय में बसते हैं। यह माता कौशल्या का मायका है। कोसल के राजा भानुमंत की पुत्री कौशल्या भगवान राम की माता हैं। यहाँ भानजों को श्रेष्ठ स्थान दिया जाता है एवं मामा द्वारा भानजों के चरण स्पर्श किये जाते हैं। वह भानजा एक घर का न होकर सारे गाँव का होता है। पूरा गाँव उसका नाम न लेकर भांचा से ही सम्बोधित करता है, क्योंकि भगवान राम यहाँ के भानजे हैं और प्रत्येक भांचा राम सदृश्य ही मान पाता है।

बचपन में खेलते हुए हम कहते थे कि “गंगा ले गोदावरी जाबो, पाका पाका बेर खाबो।” उस समय यह सहज मनोरंजन था, इसका शब्दार्थ ज्ञात नहीं था। परन्तु इन शब्दों में गुढ़ बातें छिपी है कि है कि गंगा से लेकर गोदावरी के मध्य का क्षेत्र दण्डकारण्य है, यह उस सीमा को दर्शाता है जहाँ भगवान राम ने वनवास व्यतीत किया था। जनश्रुतियों में इतिहास छिपा होता है। जब राम ने दण्डकारण्य में निवास किया है तो उसके साक्ष्य भी हमें लोक मान्यताओं, लोक गीतो, लोक कथाओं में प्राप्त होते हैं।

गंगा तट के मिरजापुर से लेकर से गोदावरी तट के भद्राचलम तक फ़ैले दण्डकारण्य में भगवान राम हर जगह किसी न किसी रुप में दिखाई देते हैं। महाजनपद काल में उत्तर से दक्षिण को जोड़ने वाला मार्ग दक्षिणापथ कहलाता था। मान्यता है कि दक्षिणापथ मार्ग होने के कारण भगवान राम ने इसी मार्ग से दक्षिण में प्रवेश किया था। लोक मान्यताओं के रुप में स्थान-स्थान पर इसके साक्ष्य मिलते हैं। सरगुजा अंचल के कोरिया जिले की भरतपुर तहसील के जनकपुर नामक स्थान में सीतामढ़ी हरचौका नामक प्राचीन एवं पुरातत्व महत्व की गुफ़ा हैं। जहाँ मवई नदी के तट पर रखे एक शिलाखंड पर चरण चिन्ह मिलते हैं, जिनकी लोग श्रीराम चरण चिन्ह मानकर पूजा करते हैं। यहाँ से भगवान राम का छत्तीसगढ़ में प्रवेश होता है।

सरगुजा को गजों की भूमि कहा जाता है, यहाँ वनों में निवास करने वाले हाथियों के विषय में कहा जाता है कि ये इंद्र के एरावत से जैसे सुंदर एवं बलशाली है। इसी के आधार पर अंचल का नाम सरगुजा माना जाता है। जिला मुख्यालय अम्बिकापुर बिलासपुर मार्ग पर उदयपुर कस्बे के समीप रामगिरि पर्वत है, मान्यता है कि भगवान ने यहाँ चौमासा किया। रामगिरि पर्वत को रामगढ़ कहा जाता है। यहाँ पर्वत के शिखर पर प्राचीन दुर्ग के अवशेष मिलते हैं तथा रामदरबार की प्राचीन प्रतिमाएं भी यहाँ स्थापित हैं। यहाँ विश्व की सबसे प्राचीन नाट्य शाला भी सीताबेंगरा नामक गुफ़ा में है साथ ही जोगीमाड़ा गुफ़ा भी है। वनवास काल में सीता जी के निवास करने के कारण इस गुफ़ा को सीता बेंगरा गुफ़ा कहा जाता है। इस गुफ़ा के पार्श्व में स्थित गुफ़ा को लक्ष्मण बेंगरा कहा जाता है। सीता बेंगरा एवं जोगीमाड़ा गुफ़ाओं में ब्राह्मी लिपि के लेख मिलते हैं। यहाँ रामनवमी को भव्य मेला भरता है। समीप ही पम्पापुर नामक स्थान माण्ड नदी के समीप ही है।

इसके साथ ही मल्हार, जांजगीर, चांपा, कोरबा भी प्राचीन नगर हैं। मल्हार तो मौर्यकालीन बड़ा नगर एवं राजधानी था, जहाँ पुरातात्विक उत्खनन में प्राचीन देवालयों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। मल्हार से आगे बढ़ने पर महानदी, शिवनाथ एवं जोंक नदी का संगम है। इस नगर शबर राजकुमारी शबरी से संबंधित बताया जाता है। इसे छत्तीसगढ़ की जगन्नाथ पुरी भी माना जाता है। प्राचीन मान्यता है कि प्रत्येक माघ मास में भगवान जगन्नाथ शिवरीनारायण में विराजते हैं। इसलिए माघ पूर्णिमा से शिवरात्री तक यहाँ बड़ा मेला भरता हैं एवं दूर दूर के लोग इस मेले में सम्मिलित होने आते हैं। इसके समीप ही खरौद गांव है, जहां छठवी शताब्दी का प्राचीन शिवालय है, जिसमें लक्षेश्वर महादेव स्थापित हैं और इसे लक्ष्मणेश्वर मंदिर कहा जाता है।

कसडोल के नारायणपुर में प्राचीन मंदिर है, जो अपनी मिथुन प्रतिमाओं के लिए प्रसिद्ध है, इससे आगे चलने पर वन क्षेत्र में तुरतुरिया नामक स्थान है, इसे महर्षि वाल्मिकी का आश्रम माना जाता है एवं किवंदन्ति है कि सीता जी ने निर्वासन के पश्चात यहीं लव एवं कुश को जन्म दिया था। यहाँ से आगे बढ़ने पर छतीसगढ़ की प्राचीन राजधानी श्रीपुर (सिरपुर) है। लोगों के मतानुसार आरंग को राजा भानुमंत की नगरी माना जाता है।

यहाँ से हम राजिम पहुंचते हैं जिसे पद्मावती क्षेत्र कहा जाता है। यहाँ सोंढूर, पैरी एवं महानदी का त्रिवेणी संगम है, जिसे प्रयाग जैसी मान्यता मिली हुई है। यहाँ संगम पर ऊंचे अधिष्ठान पर कुलेश्वर महादेव का मंदिर स्थित है। लोक मान्यता है कि शिवपूजन के लिए सीता माता ने रेत से शिवलिंग का निर्माण किया एवं उसकी पूजा की। लोमस ॠषि आश्रम है। मान्यता है कि यहाँ भी भगवान राम ने निवास किया था। प्रति वर्ष यहाँ पर माघी पुन्नी मेले का आयोजन होता है, जिसे राजिम कुंभ कल्प नाम मिल गया था।

लोमस ॠषि आश्रम से आगे चलने पर सिहावा के सप्त ॠषि पर्वतों की श्रृंखला है, इसे शुक्तमान पर्वत श्रेणी कहा जाता है। यहाँ महानदी का उद्गम है। इस पर्वत श्रेणी में माना जाता है कि श्रृंगी ॠषि, अगस्त्य ॠषि, अंगिरा ॠषि, महर्षि गौतम, शरभंग ॠषि, मुचकुंद ॠषि तथा कंक ॠषि के आश्रम थे। कंक पर्वत से निकलने के कारण शास्त्रों में वर्णित चित्रोत्पला गंगा महानदी का एक नाम कंक नंदिनी भी पड़ा। पुत्रेष्टि यज्ञ के लिए राजा दशरथ की पुत्री शांता के पति श्रृंगी ॠषि यहीं से अयोध्या गए थे। यहाँ से आगे बढ़ने पर बस्तर की भूमि प्रारंभ हो जाती है।

यह दंडकारण्य क्षेत्र ॠषि मुनियों की तपोभूमि रहा है। बस्तर अंचल में वर्तमान में भी मंदिर देवालयों के भग्नावशेष प्राप्त होते हैं। बस्तर भूमि से होकर राम गोदावरी के तट पर स्थित भद्राचलम तक जाते हैं एवं वहां से लंका पहुंचते हैं।

स्थानवाचक एवं नामवाचक संज्ञा के रुप में राम का प्रयोग होता है। राम भक्ति की पराकाष्ठा तो तब हो जाती है, जब व्यक्ति अपने सर्वांग में राम नाम का गोदना गोदवा लेता है, यहाँ तक की पलकों पर भी राम नाम गोदा हुआ दिखाई देता है। यह किसी एक व्यक्ति विशेष की बात नहीं है, यह पूरा एक समुदाय ही है, जिसे रामनामी समुदाय कहते हैं। इन्होंने तन मन धन सर्वस्व राम को समर्पित कर दिया। राम भक्ति की ऐसी अद्वितीय मिशाल विश्व में कहीं नहीं मिलेगी। इस तरह छत्तीसगढ़ अंचल भांचा राम की लीला स्थली रहा है, यहाँ के कण कण में राम समाए हुए हैं।

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