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प्रेस कॉन्फ्रेंस में किए वादे कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी मुख्यमंत्री द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिया गया आश्वासन अपने आप में कानूनी रूप से लागू कराने योग्य (enforceable) नहीं होता। अदालत ने कहा कि ऐसे बयानों को लागू करने के लिए सरकार को बाध्य करने का आदेश नहीं दिया जा सकता।

यह फैसला जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला की खंडपीठ ने सुनाया, जिसमें पहले दिए गए एकल पीठ के आदेश को संशोधित किया गया। पहले एकल न्यायाधीश ने सरकार को मुख्यमंत्री के आश्वासन के आधार पर नीति बनाने पर विचार करने के निर्देश दिए थे।

मामला वर्ष 2020 के कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान अरविंद केजरीवाल द्वारा की गई एक प्रेस कॉन्फ्रेंस से जुड़ा है। उस समय उन्होंने मकान मालिकों से किराया वसूली टालने की अपील की थी और यह भी कहा था कि यदि कोई गरीब किरायेदार किराया नहीं दे सकता, तो सरकार उसकी ओर से भुगतान कर सकती है।

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इस बयान के आधार पर कुछ याचिकाकर्ताओं—जिनमें दिहाड़ी मजदूर और किरायेदार शामिल थे—ने अदालत का रुख किया और सरकार से इस वादे को लागू कराने की मांग की।

पहले एकल पीठ ने 2021 में यह माना था कि मुख्यमंत्री का आश्वासन लागू किया जा सकता है और सरकार को इस दिशा में कदम उठाने चाहिए। हालांकि, राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती दी थी।

अब खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिए गए बयान को लागू कराने के लिए अदालत से निर्देश मांगना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि ऐसे बयान कई बार तत्काल परिस्थितियों में दिए जाते हैं और उनके वित्तीय व प्रशासनिक प्रभावों का आकलन जरूरी होता है।

साथ ही कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि महामारी के दौरान जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (DDMA) के आदेश के तहत लॉकडाउन अवधि में मकान मालिकों को किराया वसूलने से रोका गया था, लेकिन यह राहत केवल उसी अवधि तक सीमित थी।

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अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकार चाहे तो अपने स्तर पर नीति बनाकर ऐसे किसी आश्वासन को लागू कर सकती है, लेकिन इसके लिए न्यायालय का निर्देश अनिवार्य नहीं है।

इस फैसले को प्रशासनिक घोषणाओं और कानूनी बाध्यता के बीच स्पष्ट अंतर तय करने वाला महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।