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पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची संशोधन पर उठे सवाल, लाखों वोटरों के अधिकार पर संकट

पश्चिम बंगाल में हाल ही में संपन्न विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएँ खड़ी कर दी हैं। जहाँ पिछले वर्ष सितंबर में बिहार में चुनाव आयोग द्वारा जारी मतदाता सूची में पारदर्शिता और संतुलन देखने को मिला था, वहीं बंगाल में स्थिति इसके विपरीत नजर आ रही है।

दिसंबर में शुरू हुई इस प्रक्रिया के समय राज्य में कुल 7.66 करोड़ मतदाता पंजीकृत थे। लेकिन हाल ही में जारी अंतिम सूची में यह संख्या घटकर 6.77 करोड़ रह गई है। यानी लगभग 11.6 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि जिन 60 लाख से अधिक लोगों की पात्रता की जांच चल रही थी, उनमें से करीब 27 लाख लोगों को मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इनमें से अधिकांश लोगों ने आवश्यक दस्तावेज जमा किए थे, फिर भी उन्हें सूची से हटा दिया गया। इस घटनाक्रम ने चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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हालांकि प्रभावित नागरिकों को अपील का अधिकार दिया गया है, लेकिन चुनाव नजदीक होने के कारण यह प्रक्रिया व्यावहारिक रूप से राहत देने में असमर्थ दिख रही है। अपील के लिए समय सीमित है और संबंधित संस्थाओं पर पहले से ही भारी दबाव है, जिससे लोगों को समय पर न्याय मिल पाना कठिन हो रहा है।

इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका भी चर्चा में है। अदालत ने कुछ हद तक हस्तक्षेप करते हुए अपीलीय प्राधिकरणों को नए दस्तावेज स्वीकार करने की अनुमति दी, लेकिन अंतिम निर्णय में उसने चुनाव आयोग पर भरोसा जताया। कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रक्रिया को पूरा करने में समय लग सकता है, लेकिन केवल इस आधार पर पहले से शामिल लोगों को बनाए नहीं रखा जा सकता।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह रुख बिहार के मामले से अलग है, जहाँ अदालत ने अधिक सख्ती दिखाते हुए चुनाव आयोग से जवाबदेही सुनिश्चित करवाई थी। बंगाल में इस तरह की सक्रिय निगरानी का अभाव महसूस किया गया।

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चुनाव आयोग की छवि हमेशा से समावेशी और मतदाता हितैषी रही है, लेकिन इस बार बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटने से इसकी विश्वसनीयता पर असर पड़ा है। खासकर जब पूरी प्रक्रिया के दौरान अवैध प्रवासियों को लेकर तीखी राजनीतिक बयानबाजी भी होती रही।

लोकतंत्र का मूल आधार हर नागरिक को मतदान का अधिकार देना है। ऐसे में यदि योग्य मतदाता सूची से बाहर हो जाते हैं, तो यह न केवल उनके अधिकारों का हनन है, बल्कि पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न भी है।

अब जरूरत इस बात की है कि स्थिति की दोबारा समीक्षा हो और यह सुनिश्चित किया जाए कि कोई भी पात्र नागरिक सिर्फ प्रशासनिक खामियों के कारण अपने मताधिकार से वंचित न रह जाए।