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पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय : जिन्होंने 120 साल पहले लिखा था पहला छत्तीसगढ़ी नाटक

स्वराज्य करुण
(ब्लॉगर एवं पत्रकार )

छत्तीसगढ़ की महान साहित्यिक विभूतियों में पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय का नाम अमिट अक्षरों में दर्ज है। आज से लगभग 120 वर्ष पहले उनके द्वारा लिखित नाटक ‘कलिकाल’ को छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला नाटक माना जाता है, जो वर्ष 1905 में प्रकाशित हुआ था। आज 4 जनवरी को पंडित लोचन प्रसाद जी की जयंती है। छत्तीसगढ़ी भाषा और साहित्य को समृद्ध बनाने में उनका योगदान ऐतिहासिक रहा है। साहित्यकार होने के साथ-साथ पाण्डेय जी उपन्यासकार, इतिहासकार और पुरातत्वविद भी थे।

पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय का जन्म महानदी के किनारे स्थित ग्राम बालपुर में 4 जनवरी 1887 को हुआ था। उनका निधन 8 नवम्बर 1959 को हुआ। उन्हें शत-शत नमन। उनका गाँव बालपुर पहले बिलासपुर जिले में था, जो अब जांजगीर-चाम्पा जिले में स्थित है और रायगढ़ जिले से भी लगा हुआ है। चूँकि बालपुर जिला मुख्यालय रायगढ़ के निकट है, इसलिए उनका अधिकांश साहित्यिक सृजन रायगढ़ में हुआ।

पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय, आधुनिक हिन्दी कविता में छायावाद के प्रवर्तक के रूप में प्रसिद्ध तथा भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से सम्मानित स्वर्गीय मुकुटधर पाण्डेय के बड़े भाई थे। साहित्य के क्षेत्र में रायगढ़ और छत्तीसगढ़ का नाम राष्ट्रीय स्तर पर रोशन करने में पाण्डेय बंधुओं का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है।

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लोचन प्रसाद पाण्डेय आठ भाइयों और चार बहनों के विशाल परिवार में अपने पिता पंडित चिंतामणि पाण्डेय के चौथे सुपुत्र थे। वह समय हिन्दी साहित्य के विकास का प्रारंभिक दौर था। उन दिनों पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय और उनके छोटे भाई मुकुटधर पाण्डेय की रचनाएँ देश की अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में नियमित रूप से प्रकाशित होने लगी थीं। लोचन प्रसाद जी हिन्दी, छत्तीसगढ़ी, उर्दू, संस्कृत, अंग्रेजी और ओड़िया भाषाओं के विद्वान थे।

डॉ. विनय कुमार पाठक ने वर्ष 1971 से 1977 के बीच तीन संस्करणों में छत्तीसगढ़ी भाषा में प्रकाशित अपने लघु शोध ग्रंथ ‘छत्तीसगढ़ी साहित्य अउ साहित्यकार’ में छत्तीसगढ़ी नाट्य और एकांकी साहित्य की विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने लिखा है कि सन 1905 में प्रकाशित पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय का ‘कलिकाल’ छत्तीसगढ़ी भाषा का पहला नाटक माना जा सकता है, जिसकी भाषा में लरिया का प्रभाव दिखाई देता है।

उल्लेखनीय है कि ‘लरिया’ छत्तीसगढ़ी भाषा की एक उपबोली है, जो ओड़िशा से लगे छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रचलित है। पाण्डेय जी का जन्म ग्राम बालपुर में हुआ और उनकी कर्मभूमि रायगढ़ रही, जो ओड़िशा की सीमा के निकट है। इसलिए उनके लिखे इस छत्तीसगढ़ी नाटक की भाषा में लरिया का प्रभाव होना स्वाभाविक है।

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उपन्यासकार और कवि भी थे पाण्डेय जी

पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय एक सफल उपन्यासकार और कवि भी थे। उनका हिन्दी उपन्यास ‘दो मित्र’ वर्ष 1906 में प्रकाशित हुआ था। उनकी अन्य कृतियों में वर्ष 1910 में प्रकाशित ओड़िया काव्य संग्रह ‘महानदी’ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। विभिन्न साहित्यिक विधाओं में उनकी लगभग 40 पुस्तकों का प्रकाशन हुआ, जिनमें तीन ओड़िया भाषा और चार अंग्रेजी भाषा की पुस्तकें भी शामिल हैं।

छत्तीसगढ़ के इतिहास और पुरातत्व के अन्वेषक

पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय इतिहास और पुरातत्व के भी गंभीर अध्येता थे। उन्होंने वर्ष 1923 में छत्तीसगढ़ गौरव प्रचारक मंडली की स्थापना की, जो आगे चलकर महाकोशल इतिहास परिषद के रूप में विकसित हुई। छत्तीसगढ़ के इतिहास और पुरातत्व को देश-दुनिया के सामने लाने के लिए उन्होंने निरंतर शोध और परिश्रम किया।

अपने गहन अध्ययन और खोजी दृष्टि से उन्होंने अनेक प्राचीन ताम्रपत्रों और शिलालेखों की खोज की। रायगढ़ जिले के सिंघनपुर और करमागढ़ की पहाड़ी गुफाओं में आदि मानवों द्वारा हजारों वर्ष पूर्व बनाए गए शैल चित्रों का भी उन्होंने गंभीर अध्ययन किया।

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उनके साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान के लिए ओड़िशा की तत्कालीन बामुंडा रियासत के नरेश ने उन्हें वर्ष 1912 में ‘काव्य विनोद’ की उपाधि प्रदान की। प्रांतीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन, गोंदिया में उन्हें ‘रजत मंजूषा’ से सम्मानित किया गया। वर्ष 1948 में हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग के मेरठ अधिवेशन में उन्हें ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि से अलंकृत किया गया।

पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य, इतिहास और सांस्कृतिक चेतना के ऐसे स्तंभ थे, जिनका योगदान आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरणा देता रहेगा। उनकी जयंती पर उन्हें पुनः विनम्र नमन।

आलेख : स्वराज्य करुण