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ब्रह्मदेश का स्वतंत्रता का संघर्ष और भारत से ऐतिहासिक संबंध

म्यांमार अर्थात प्राचीन ब्रह्मदेश को द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान आज़ाद हिन्द फ़ौज ने जापान की सहायता से अंग्रेजों से मुक्त घोषित कर दिया था। लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध का पांसा पलट गया और म्यांमार पुनः अंग्रेजों के अधीन चला गया। इसके बाद नये सिरे से स्वतंत्रता का संघर्ष आरंभ हुआ और अंततः 4 जनवरी 1948 को अंग्रेजों को म्यांमार से विदा होना पड़ा।

म्यांमार की सीमा भारत के अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मिज़ोरम और मणिपुर राज्यों से जुड़ी हुई है। भारत के अतिरिक्त म्यांमार की अंतरराष्ट्रीय सीमा बांग्लादेश, चीन, लाओस और थाईलैंड से भी लगती है। इतिहास में जहाँ तक दृष्टि जाती है, यह क्षेत्र भारत के सांस्कृतिक प्रभाव क्षेत्र का अभिन्न अंग रहा है। म्यांमार का प्राचीन नाम ब्रह्मदेश था, जो कालांतर में अपभ्रंश होकर अंग्रेज़ी काल में “बर्मा” कहलाया। समय के साथ बर्मा की सत्ता के अनेक स्वरूप रहे। कभी यह सीधे भारतीय साम्राज्य के अंतर्गत रहा तो कभी यहाँ स्वतंत्र राजा शासन करते रहे, लेकिन हर कालखंड में भारत से इसका जुड़ाव बना रहा।

बर्मा के मार्ग से ही प्राचीन स्याम देश अर्थात वर्तमान थाईलैंड तथा चम्पा अर्थात वर्तमान वियतनाम तक वृहत्तर भारत का सांस्कृतिक विस्तार हुआ। इन सभी देशों में हुए उत्खननों से भारतीय सभ्यता के अनेक प्रमाण प्राप्त हुए हैं। पहली सदी तक म्यांमार का पौराणिक नाम ‘इन्द्रद्वीप’ भी बताया गया है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के पुरातत्व विशेषज्ञ प्रोफेसर होरास हेमन विल्सन ने बर्मा और तिब्बत की सभ्यता को भारतीय सभ्यता से प्रभावित माना है। श्री हरबिलास शारदा ने भी अपनी पुस्तक हिन्दू सुपीरिअरिटी में इसका उल्लेख किया है।

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बर्मा के कई भागों में 416 ईस्वी पूर्व के नगरों के साक्ष्य मिले हैं। एक संस्कृत अभिलेख भी प्राप्त हुआ है। चीनी यात्री ह्वेनसांग ने बर्मा के कुछ नगरों और वहाँ प्रचलित वैदिक संस्कृति का उल्लेख किया है। चीन के तांग वंश के काल में लगभग आठवीं शताब्दी में बर्मा के 35 संगीतज्ञों और नर्तकों द्वारा चीनी दरबार में संस्कृत गीतों की प्रस्तुति का भी वर्णन मिलता है। इन सभी प्रमाणों से यह स्पष्ट होता है कि बर्मा अर्थात म्यांमार आज भले ही एक अलग राष्ट्र हो, लेकिन अतीत में वह भारत और भारतीय संस्कृति से गहराई से जुड़ा रहा है।

भारत पर हुए आक्रमणों, विध्वंस और सल्तनत काल का प्रभाव म्यांमार पर भी पड़ा। सल्तनत काल में वहाँ के राजा को बनाए रखा गया, लेकिन वार्षिक राजस्व लेकर उन्हें अधीनस्थ कर दिया गया। सल्तनत काल के पतन के बाद अंग्रेजों ने भी प्रारंभ में यही नीति अपनाई। उन्होंने म्यांमार के राजा को अधीन कर एक राजनीतिक एजेंट नियुक्त किया। उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में अंग्रेजों ने भारत की अनेक रियासतों में राजा परंपरा समाप्त कर सीधे शासन स्थापित करने का अभियान चलाया, जिसका प्रभाव म्यांमार पर भी पड़ा।

1824 में अंग्रेजी सेना ने म्यांमार पर पहला आक्रमण किया और अराकान (रखाइन) तथा तेनासेरिम (तनिंथारी) के तटीय क्षेत्रों पर अधिकार कर लिया। 1852 में अंग्रेजों ने रंगून और इरावदी डेल्टा क्षेत्र पर कब्ज़ा किया। 1862 में इन क्षेत्रों को मिलाकर “ब्रिटिश बर्मा” नामक एक प्रांत बनाया गया। तीसरा और निर्णायक आक्रमण 1886 में हुआ, जब पूरे म्यांमार पर अंग्रेजों का अधिकार हो गया और तत्कालीन शासक राजा थिबॉ को भारत निर्वासित कर दिया गया।

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अंग्रेजों ने प्रारंभ में पूरे म्यांमार को बॉम्बे प्रेसीडेंसी के अधीन रखा, लेकिन यह व्यवस्था अधिक समय तक नहीं चली। वर्ष 1937 में म्यांमार को भारत से पृथक कर एक अलग उपनिवेश बना दिया गया। यह अंग्रेजों की “डिवाइड एंड रूल” नीति का ही हिस्सा था। इसी नीति के तहत म्यांमार में एक अंतरिम सरकार बनाई गई, जिसके प्रधानमंत्री बा माव बने। उन्होंने पद स्वीकार तो किया, लेकिन वे स्वशासन के समर्थक थे।

द्वितीय विश्वयुद्ध के आरंभ पर प्रधानमंत्री बा माव ने ब्रिटेन के पक्ष में युद्ध में शामिल होने का विरोध किया और तटस्थ रहने की नीति अपनाने की बात कही। अंग्रेजों ने यह स्वीकार नहीं किया और म्यांमार की सेना को युद्ध में झोंक दिया। विरोध स्वरूप बा माव ने इस्तीफा दे दिया। उन पर राजद्रोह का आरोप लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसका गहरा प्रभाव जनमानस पर पड़ा और स्वयंसेवी संगठनों का उदय हुआ। इसी दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिन्द फ़ौज को म्यांमार में व्यापक समर्थन मिला। बड़ी संख्या में म्यांमार के सैनिक आज़ाद हिन्द फ़ौज से जुड़े।

1943 में आज़ाद हिन्द फ़ौज ने जापान की सहायता से म्यांमार पर अधिकार कर स्वतंत्रता का ध्वज फहराया। भारत की मुक्ति के लिए रंगून को केन्द्र बनाया गया और इम्फाल तथा त्रिपुरा जैसे क्षेत्रों में भी अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष हुआ। लंबे युद्ध में सैकड़ों सैनिकों का बलिदान हुआ। प्रारंभिक चरण में अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा, लेकिन अमेरिका के हस्तक्षेप और जापान पर परमाणु बम गिराए जाने के बाद युद्ध की दिशा बदल गई और म्यांमार पुनः अंग्रेजों के नियंत्रण में चला गया।

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इसके बाद बर्मा में सत्ता की बागडोर जनरल आंग सान ने संभाली। उन्होंने विभिन्न जातीय समूहों के साथ समझौते कर एकीकृत राज्य व्यवस्था की नींव रखी। यद्यपि केंद्रीय सत्ता अंग्रेजों के हाथ में रही, फिर भी आंतरिक प्रशासन में कुछ अधिकार दिए गए। बावजूद इसके, जनता पूर्ण स्वतंत्रता चाहती थी। भारत की तरह बर्मा में भी एक अंतरिम व्यवस्था के रूप में कार्यकारी परिषद बनाई गई और आंग सान को उसका उपाध्यक्ष बनाया गया।

अंग्रेजों ने म्यांमार को भारत से अलग कर दिया था, इसलिए 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता का लाभ म्यांमार को नहीं मिला। इसके बाद स्वतंत्रता समर्थकों ने फिर से संघर्ष तेज़ किया। अंततः 4 जनवरी 1948 को प्रातः 4:20 बजे म्यांमार एक स्वतंत्र गणराज्य बना। प्रारंभ में इसका नाम “बर्मा संघ” रखा गया। साओ श्वे थाइक इसके पहले राष्ट्रपति और यू नू पहले प्रधानमंत्री बने।

स्वतंत्रता के साथ ही बर्मा ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया। उसने ब्रिटिश राष्ट्रमंडल की सदस्यता स्वीकार नहीं की। आगे चलकर वर्ष 1989 में “बर्मा” का आधिकारिक नाम बदलकर म्यांमार कर दिया गया। इस प्रकार म्यांमार की स्वतंत्रता यात्रा केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी भारत से गहराई से जुड़ी हुई है।