दारा शिकोह की त्रासदी : सहिष्णु शहजादे की क्रूरतम मृत्यु का इतिहास
औरंगजेब अपने कट्टरपन और क्रूरता के लिए कुख्यात रहा है। उसने सत्ता के लिए अपने तीन भाइयों की हत्या की थी। इनमें सबसे बड़े भाई दारा शिकोह को बहुत क्रूरता से मारा, फिर उसका सिर काटकर तीन टुकड़े करके तोहफे के रूप में सजाया और पिता के पास भेजा था।
मुगल बादशाहों की शासन शैली ही नहीं, उनके परिवार का इतिहास भी बहुत खूनखराबे से भरा है। शाहजहाँ को भी गद्दी आसानी से नहीं मिली थी। उसने भी बादशाहत के लिए अपने भाई शहरयार और परिवार के कई सदस्यों की हत्या करवाई थी। वही रास्ता औरंगजेब ने अपनाया। शाहजहाँ का पिता बादशाह जहाँगीर के निर्णय अपनी एक बेगम नूरजहाँ की मुट्ठी में होते थे। नूरजहाँ मुगल दरबारी मिर्जा गयास बेग की बेटी थी, लेकिन अकबर ने उसकी शादी शेर अफगान से करा दी और शेर अफगान को वर्धमान की जागीर देकर बंगाल भेज दिया।
अकबर की मौत के बाद शाहजादे सलीम ने बादशाह जहाँगीर के नाम से गद्दी संभाली और रहस्यमय तरीके से शेर अफगान की मौत हो गई। इतिहासकारों का मानना है कि बादशाह जहाँगीर ने ही शेर अफगान की हत्या करवाई। बहरहाल, पति शेर अफगान की मौत के बाद नूरजहाँ आगरा आ गई। बादशाह जहाँगीर से शादी करके मुगल बेगम बनी। आगरा आते समय नूरजहाँ अपनी बेटी लाड़ली बेगम को साथ लाई थी। नूरजहाँ ने इस बेटी की शादी अपने नए पति जहाँगीर के बेटे शहरयार मिर्जा से करा दी और यह प्रयास किया कि जहाँगीर के बाद यह बेटा शहरयार ही बादशाह बने।
हालाँकि, शाहजहाँ की बेगम मुमताज का पिता आसफ खाँ नूरजहाँ का भाई था, लेकिन नूरजहाँ अपने भाई के दामाद की बजाय अपने दामाद को बादशाह बनाना चाहती थी। भतीजी थी। इसका आभास शाहजहाँ को भी हो गया और आसफ खाँ को भी। ये दोनों भी अपनी तैयारी में लग गए। 1627 में बादशाह जहाँगीर की मौत हुई। शाहजहाँ ने अपने भाई शहरयार और तीन अन्य शहजादों को मौत के घाट उतारकर गद्दी संभाल ली।
सत्ता पर अधिकार करने के लिए शाहजहाँ का बेटा औरंगजेब भी अपने पिता की राह पर ही चला, लेकिन दोनों में एक अंतर अवश्य है। शाहजहाँ सत्ता का नैसर्गिक उत्तराधिकारी था, जिसे दूर करने के लिए नूरजहाँ ने कई प्रकार की साजिशें रची थीं। जबकि औरंगजेब सत्ता का नैसर्गिक उत्तराधिकारी नहीं था। उत्तराधिकारी दारा शिकोह था। दारा शिकोह औरंगजेब सहित कुल चौदह भाई-बहन थे। भाइयों में दारा ही सबसे बड़ा था। दारा से बड़ी दो बहनें थीं। दो बेटियों के बाद दारा का जन्म हुआ था। दो बेटियों के बाद जन्में बेटे के प्रति मुमताज और शाहजहाँ का अतिरिक्त स्नेह भी था।
इस तरह दारा शिकोह को मुगल साम्राज्य का सहज उत्तराधिकारी भी माना गया। समय के साथ शाहजहाँ ने इसकी अधिकृत घोषणा भी कर दी थी। दारा शिकोह को शहज़ादा-ए-बुलंद इक़बाल की उपाधि देकर पहले इलाहाबाद का सूबेदार बनाया, फिर कुछ रुतबा बढ़ाया। 30,000 पैदल एवं 20,000 घुड़सवार सेना की कमान सौंपकर गुजरात का सूबेदार घोषित कर दिया। यहीं से औरंगजेब ने अपनी साजिश शुरू कर दी थी। औरंगजेब दक्षिण भारत चला गया। उसने महाराष्ट्र को केंद्र बनाकर राजस्थान पर अपनी पकड़ बनाई और दरबार में भी साजिश की।
दारा शिकोह एक अच्छा प्रशासक होने के साथ दार्शनिक मानसिकता का था। वह दो सूफी संतों के समीप था। वह युद्ध के बजाय शांति और विकास का पक्षधर था। वह इस्लाम को “मुसलमानियत” से ऊपर “इंसानियत” का मजहब मानता था। उसने उपनिषदों का फारसी में अनुवाद भी कराया था और स्वयं भी कुछ किताबें लिखीं। दारा के इस उदारवादी सोच कुछ उलेमाओं को पसंद नहीं थी। औरंगजेब ने इसका भी लाभ उठाया। 1657 में शाहजहाँ बीमार हुए। बादशाह की ओर से सारा राजकाज दारा शिकोह ने संभाल लिया।
औरंगजेब को इसी की प्रतीक्षा थी। दक्षिण से एक बड़ी सेना लेकर धावा बोल दिया। पहले हमले में उसे पीछे हटना पड़ा। शाही सेना भारी पड़ी, लेकिन उसने दोबारा तैयारी की। इस बार शाही सेना का एक बड़ा समूह टूटकर औरंगजेब से मिल गया। यह अतिरिक्त शक्ति पाकर औरंगजेब ने दोबारा धावा बोला। वह आगरा के रास्ते दिल्ली की ओर बढ़ा। यह संघर्ष कुछ लंबा चला। अंत में दारा शिकोह पराजित हो गया। वह तो भाग गया, लेकिन बादशाह शाहजहाँ औरंगजेब की पकड़ में आ गया। शाहजहाँ औरंगजेब को गद्दी देने के लिए तैयार न हुआ।
तब औरंगजेब ने 1658 में शाहजहाँ को कैद करके आगरा भेज दिया और एक बड़ी सेना दारा के पीछे लगा दी। आगे-आगे दारा शिकोह और पीछे औरंगजेब की फौज। दारा पहले लाहौर गया, फिर मुल्तान, सिंध, कच्छ के रण को पार करके काठियावाड़ पहुँचा। गुजरात के किलेदार शाह नवाज़ खान ने उसकी सहायता की। उसने नई सेना गठित की। सेना तैयार होने के बाद दारा सूरत के रास्ते अजमेर की ओर बढ़ा। अजमेर के पास देवराई में मुगल सेना से भीषण युद्ध हुआ। 11 मार्च 1659 को निर्णायक युद्ध में दारा शिकोह की पराजय हुई। वह सिंध भाग गया, जहाँ उसने किलेदार जुनैद खान से सहायता मांगी।
लेकिन जुनैद ने दारा शिकोह को बंदी बनाकर औरंगजेब को सूचना भेज दी। मुगल सेना दारा शिकोह को जंजीरों में जकड़ कर दिल्ली लाई। यहाँ उसे एक बीमार और बदबूदार हाथी पर बिठाकर दिल्ली की सड़कों पर घुमाया गया, गंदगी फेंकी गई। अंत में 30 अगस्त 1659 की रात को उसके बेटे सुलेमान के सामने उसे क्रूरतम मौत दी गई। फिर सुलेमान को भी मार डाला गया। औरंगजेब के आदेश पर दारा शिकोह का सिर काटकर लाया गया। सिर के तीन टुकड़े करके एक डब्बे में तोहफे के रूप में सजाया गया और आगरा के किले में कैद शाहजहाँ के पास भेजा गया।
औरंगजेब ने अपने विशेष संदेशवाहक को यह निर्देश भी दिया कि यह तोहफा शाहजहाँ को तभी दिया जाए जब वह भोजन के लिए बैठे। संदेशवाहक आगरा पहुँचा और जब शाहजहाँ भोजन के लिए बैठा, तब संदेशवाहक ने कहा, “आपका पुत्र बादशाह औरंगजेब आपको याद करता है और यह नजराना भेजा है।” सुनकर शाहजहाँ बहुत खुश हुआ और कहा, “अल्लाह का शुक्र है कि मेरा बेटा मुझे अब भी याद रखता है।” लेकिन संदूक खोलते ही उसमें सिर के टुकड़े देखकर भयभीत हो गया। तब शाहजहाँ को बताया गया कि “यह आपके बेटे दारा शिकोह के सिर के टुकड़े हैं।” सुनकर शाहजहाँ बेहोश हो गया। दारा शिकोह की मौत का विवरण अन्य इतिहासकारों के अतिरिक्त मुगल दरबार में आए एक वेनिस के यात्री निकोलाओ मनुची ने भी लिखा है।