हिन्दू पहचान हम सबको जोड़ती है, धर्म स्वभाव और कर्तव्य है: भोपाल में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत
भोपाल, 2 जनवरी 2026/ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि मत, पंथ, भाषा और जाति भले अलग हों, लेकिन हिन्दू पहचान हम सबको जोड़ती है। हमारी संस्कृति एक है, धर्म एक है और हमारे पूर्वज भी समान हैं। वे भोपाल में आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी को संबोधित कर रहे थे। मंच पर मध्यभारत प्रांत के संघचालक अशोक पांडेय और भोपाल विभाग के संघचालक सोमकान्त उमालकर उपस्थित रहे।
सरसंघचालक ने कहा कि हिन्दुस्थान में चार प्रकार के हिन्दू रहते हैं—पहले, जो गर्व से कहते हैं कि हम हिन्दू हैं; दूसरे, जो कहते हैं कि इसमें गर्व की क्या बात, हम हिन्दू हैं; तीसरे, जो सार्वजनिक रूप से नहीं कहते, लेकिन भीतर से हिन्दू ही हैं; और चौथे, जो यह भूल गए हैं कि वे हिन्दू हैं। उन्होंने कहा कि जब-जब समाज अपनी हिन्दू पहचान भूलता है, तब-तब विपत्तियाँ आती हैं। इतिहास इसका साक्षी है। इसलिए हिन्दू समाज को जागृत और संगठित करना आवश्यक है।
डॉ. भागवत ने स्पष्ट किया कि हिन्दू केवल धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि एक स्वभाव और प्रकृति है। धर्म को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा कि धर्म का अर्थ रिलीजन या पूजा-पद्धति मात्र नहीं है। धर्म वह है, जो सबको साथ लेकर चलता है, सबका उत्थान करता है और समाज में आनंद, संयम तथा सद्भाव बनाए रखता है। स्वभाव और कर्तव्य ही धर्म हैं। रास्ते अनेक हो सकते हैं, लेकिन लक्ष्य एक ही है।
संघ की तुलना किसी से नहीं की जा सकती
सरसंघचालक ने कहा कि संघ को लेकर अनेक नैरेटिव चलाए जाते हैं। किसी संगठन को समझने के लिए उसकी तुलना दूसरों से करना उचित नहीं है, क्योंकि संघ दुनिया का एक अनूठा संगठन है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ पथ संचलन करता है, तो वह कोई पैरा मिलिट्री फोर्स नहीं है; सेवा कार्य करता है, तो केवल समाजसेवी संस्था भी नहीं है। संघ को लेकर हितैषियों और विरोधियों दोनों ने कई भ्रांतियां फैलाई हैं। इसी कारण शताब्दी वर्ष में समाज के सामने संघ की सही जानकारी पहुंचाने का विचार किया गया।
संघ किसी की प्रतिक्रिया में नहीं बना
डॉ. भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी के विरोध या प्रतिक्रिया में शुरू नहीं हुआ। संघ की किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं है। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे और देश-समाज के लिए चल रहे सभी रचनात्मक कार्यों में सहभागी बने। बालगंगाधर तिलक, वीर सावरकर, महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय और डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे महापुरुषों से उनके संवाद हुए। इन्हीं चिंतन के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि स्वाधीनता को स्थायी बनाने के लिए समाज में ‘स्व’ का बोध आवश्यक है। इसी उद्देश्य से संघ कार्य का प्रारंभ हुआ।
प्रेशर ग्रुप नहीं, सम्पूर्ण समाज का संगठन
सरसंघचालक ने कहा कि संघ ने प्रारंभ से ही तय किया कि वह प्रेशर ग्रुप नहीं बनेगा, बल्कि सम्पूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करेगा। समाज ही किसी देश का भाग्य तय करता है। नेता और नीतियां सहायक होती हैं, लेकिन गुणसम्पन्न समाज ही राष्ट्र को महान बनाता है। संघ शाखाओं के माध्यम से ऐसे स्वयंसेवकों का निर्माण करता है, जो राष्ट्रीय वातावरण का निर्माण करें। स्वयंसेवकों के कार्य संघ के किसी रिमोट कंट्रोल से संचालित नहीं होते।
विरोध और उपेक्षा के बाद भी संघ आगे बढ़ा
डॉ. भागवत ने कहा कि संघ ने अपने इतिहास में अभूतपूर्व विरोध और उपेक्षा झेली है, फिर भी स्वयंसेवक निराश नहीं हुए। भारत माता के प्रति आस्था रखते हुए उन्होंने हर परिस्थिति में कार्य किया। उन्होंने कहा कि शायद ही दुनिया में कोई संगठन हो, जिसने संघ जितना विरोध सहा हो। आज संघ उस स्थिति में है, जहां समाज का विश्वास उसे प्राप्त हो रहा है, हालांकि सम्पूर्ण समाज का संगठन अभी भी शेष है।
पंच परिवर्तन का आह्वान
सरसंघचालक ने समाज और राष्ट्र की उन्नति के लिए पंच परिवर्तन का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वबोध और नागरिक अनुशासन—इन पांच विषयों पर समाज के प्रमुख जनों को मिलकर कार्य करना होगा। उन्होंने कहा कि समाज के सभी मत-संप्रदायों में सज्जन शक्ति विद्यमान है और इन सबको जोड़कर सकारात्मक राष्ट्रीय वातावरण बनाना ही संघ का उद्देश्य है।
