मोबाईल और इंटरनेट बिना जग सून : मनकही

इंटरनेट के जाल में उलझी ज़िंदगी और हाथ में मोबाइल, बस यही तो रह गई है आज जीवन की परिभाषा। कोई भी आविष्कार मनुष्यों को सरलता से कार्य करने और समस्या के समाधान के लिए होता है। फिर वह आदत में शामिल होकर उसी सुविधा के जाल में फँसता चला जाता है। पहले टेलीफोन, फिर बटन वाले फोन, जिसमें बात करने वाला बढ़ते बिल को ध्यान में रखकर ही बातें करता था। घर में महीना भर के राशन, साग भाजी, दवा, मकान किराया, बच्चों की फीस आदि की सूची में फोन में पैसा डलवाना और वह भी टैरिफ के साथ शामिल होता था, इसलिए बहुत संभलकर बात करनी पड़ती थी।
तब भी जीवन में सुकून था। लोग आपस में मिलते जुलते, लोगों के घर बैठने जाना, किसी भी समारोह में सपरिवार लगातार उपस्थिति, गीत संगीत, सब कुछ सामान्य था। टीवी के प्रचलित धारावाहिक लोगों की रुचि के अनुरूप अपनी सफलता के सोपान चढ़ते थे। बातचीत में किसी धारावाहिक के छूट जाने पर उसकी कहानी जानने की उत्सुकता भी आपसी चर्चा का महत्वपूर्ण विषय हुआ करती थी। कुल मिलाकर लोग कीपैड वाले नोकिया, सैमसन, रिलायंस आदि कंपनियों के छोटे से फोन को पाकर खुश थे, जो पारिवारिक और सामाजिक जीवन में बाधा नहीं डालते थे, बल्कि जोड़ते थे।
समय के साथ एंड्रॉयड मोबाइल ने जगह लेनी शुरू की। फिर क्या, नए नए एप से मोबाइल भरता गया, व्हाट्सएप, फेसबुक, और मनुष्यों की दुनिया सिमटती चली गई।
एक महाशय, जो मोबाइल आने से पहले बहुत व्यवहारिक और सामाजिक हुआ करते थे, शाम को मित्र मंडली में बैठना, हँसी मजाक, हर विषय पर चर्चा परिचर्चा, सब चलता रहता था। धीरे धीरे मोबाइल की दुनिया में जाकर ऐसे गुम हो गए कि आज उनसे कोई बात करे तो बड़ी शान से कहते हैं कि समय ही नहीं मिलता, मेरे इंस्टाग्राम में, फेसबुक में इतने फॉलोअर्स हैं। मन में प्रश्न उठता है, क्या ये सभी आपको आवश्यकता पड़ने पर आपके समक्ष उपस्थित होकर सहायता प्रदान करेंगे? या केवल लाइक, स्माइल या अन्य इमोजी से ही आपको सांत्वना देंगे? दूर के ढोल सुहावने वाली बात ही चरितार्थ होगी। व्यवहारिकता नहीं होगी। उपस्थित तो आसपास के लोग, कुछ परिवारजन और मित्र मंडली ही आएँगे। तब फॉलोअर्स नहीं आएंगे। आज जीवन सचमुच नेट के जाल में उलझ गया है।
यहाँ मोबाइल और इंटरनेट के विरुद्ध होने का आशय नहीं है। कोरोना जैसी महामारी में मोबाइल का बहुत बड़ा योगदान रहा, परंतु संकट टलने के बाद जो अति होने लगी, समस्या उससे है। बड़े बच्चे सब मोबाइल बिना एक पल नहीं रह पाते। जिओ ने मुफ्त की लत लगाकर लोगों को अपने अधीन कर लिया। जब किसी भी चीज़ की आदत हो जाती है तो पैसा खर्च करके उस आदत को पूरा किया जाता है। वही हो रहा है। बढ़ते दाम पर मोबाइल रिचार्ज कराना ही होगा। सारा कार्य मोबाइल से ही होना है।
इंसान चाहकर भी केवल बात करने तक ही मोबाइल का उपयोग करे, यह असंभव हो गया है। घरेलू से लेकर शासकीय कार्यालयों तक, देश विदेश, धर्म, राजनीति, आर्थिक, सामाजिक, खेल और शैक्षणिक गतिविधियाँ, सभी इस पर आश्रित हो गई हैं। मनुष्य इसके बिना सोच भी नहीं सकता। गूगल से सर्च कर उत्तर जानना ऐसी लत बन गई है कि व्यक्ति की सोच में मौलिकता ही नहीं रह गई है। लोग घर से निकलते समय सर्वप्रथम अपना मोबाइल रखते हैं। फोनपे की सुविधा के कारण नगद रुपए रखने की आदत समाप्त होती जा रही है। सब कुछ डिजिटल हो गया है। मनुष्य की सुविधा के लिए बना मोबाइल और अब ए आई, मनुष्य से उसका अस्तित्व ही छीनता जा रहा है।
मुझे बचपन में सुनी वह कहानी याद आती है। एक बार भूख से परेशान एक मनुष्य ने भगवान से भूख समाप्त करने की प्रार्थना की। भगवान ने उसकी सुन ली और संसार से भूख समाप्त कर दी। दो चार दिन तो अच्छा लगा। फिर उसे लगा कि बैठे बैठे समय नहीं कटता। उसने सोचा, बाजार घूम आऊँ, सिनेमा जाऊँ, बगीचे में टहल लूँ या गाड़ी से कहीं सैर कर लूँ। घर से बाहर निकलकर देखा कि संसार शांत हो गया है, कहीं कोई हलचल नहीं। जब भूख ही नहीं रही तो संसार के सारे उद्यम भी बंद। पेट भरने के लिए ही तो दुनिया चलायमान है। सब हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। समय कट ही नहीं रहा। तब उस मनुष्य को अपनी भूल का ज्ञान हुआ। उसने भगवान से पुनः भूख लौटाने की प्रार्थना की। भूख के आते ही दुनिया फिर दौड़ने लगी, सभी व्यस्त हो गए।
कुछ ऐसी ही स्थिति का सामना मैंने मोबाइल के न रहने पर किया। हुआ यूँ कि मेरा मोबाइल गिरकर टूट गया। मुझे लगा, नहीं बनवाया जाए, बहुत लत लग गई है। इसके कारण मेरा बहुत समय रील और व्हाट्सएप में व्यर्थ हो रहा था। कम से कम पहले जब मोबाइल नहीं था तब कितने क्रियाशील थे। सब कार्य अपने हाथों से करते, पुस्तकें पढ़ते, फिल्में देखते आदि। मैंने बनवाया नहीं। घर पर खाली बैठी तो सोचा, गाना सुनूँ। फिर याद आया, मोबाइल तो है नहीं। टीवी में भी रिचार्ज खत्म हो गया। वह भी मोबाइल से ही करना होगा। अब मन हुआ कि बच्चों और भाई बहनों से बात करूँ। फिर ध्यान आया, मोबाइल ही नहीं। अपना नंबर छोड़कर शायद ही किसी को किसी का नंबर याद हो। अन्यथा मोबाइल में टाइप करो और कॉन्टैक्ट लिस्ट से जिसे चाहो उससे बात करो। यहाँ भी गाड़ी अटक गई। न मनोरंजन, न बातचीत। बार बार भूल जाती थी कि मोबाइल ही नहीं है।
अब मैंने सोचा, एक लेख ही लिखूँ। पर कैसे। कॉपी पेन में लिख भी लूँ तो संपादक महोदय तक भेजूँ कैसे। अब डाकिया डाक लाया वाली स्थिति भी नहीं। सब कुछ मोबाइल में टाइप करो, मेल करो। पेपरलेस हो गया है। इतनी मशक्कत कौन करेगा। फिर सोचा, कोई पुस्तक पढ़ूँ और किसी विशेष विषय पर लिखूँ। पर जानकारी तो गूगल से ही मिलती है। पुस्तकें इतनी सरलता से कहाँ उपलब्ध। लाइब्रेरी जाना भी संभव नहीं और वहाँ जरूरत की पुस्तक मिल जाए यह भी निश्चित नहीं। मोबाइल में गूगल पर जो चाहो वही जानकारी तुरंत मिल जाती है। लिखने से पहले पढ़ना पड़ता है, तभी लिखा जा सकता है। हाथ में मोबाइल, मोबाइल में नेट और रिचार्ज, तो पूरी दुनिया रात में भी आपके हाथ में रहती है।
मुझे लगा, लिखना तो है पर लिखूँ कैसे। मोबाइल तो है ही नहीं। किस विषय पर लिखूँ, किसे भेजूँ। बड़ी विकट समस्या हो गई। रसोई में जाकर सोचा, कोई व्यंजन बनाऊँ। तुरंत ध्यान आया, यूट्यूब से रेसिपी देख लूँ। पर यहाँ भी वही समस्या। मोबाइल टूट चुका है। रात में ईयरफोन लगाकर गाना सुनते हुए सोने से नींद अच्छी आती है। सोचा, चलो सो जाऊँ। पर फिर वही, मोबाइल नहीं। मतलब शाम से लेकर रात तक के लगभग पाँच घंटों में दुनिया ही रुक गई।
मुझे यह वास्तविकता समझ में आई कि आज हम मोबाइल और नेट के बिना पंगु हो गए हैं। चलना, सोचना, समझना, लिखना, पढ़ना, हर छोटी सी बात के लिए मोबाइल और इंटरनेट पर आश्रित हो गए हैं। मस्तिष्क भी सोचने से लाचार होता जा रहा है।
मोबाइल की दुनिया में सभी उलझे हुए हैं। जैसे कहानी में भूख नहीं होने से दुनिया रुक गई थी, ठीक वैसे ही मोबाइल पास न रहने से दुनिया ठहर जाती है। रात भर जैसे तैसे कटी और सुबह होते ही मैं दुकान जाकर मोबाइल बनवाने दे आई। मोबाइल बिना साँस लेना भी कठिन लगता है। तब मन में प्रश्न उठता है, जिसे हम जीवन की उपलब्धि मान रहे हैं, क्या वह सचमुच हमें ज्ञान की ऊँचाई पर ले जा रहा है अथवा रोबोट की भाँति अपने इशारों पर चला रहा है। क्या मनुष्य वास्तव में मनुष्य रह पाएगा?

