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मंदिर प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, भेदभाव से समाज और धर्म दोनों को नुकसान

देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने मंदिरों में प्रवेश को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि संप्रदाय या गुट के आधार पर किसी को मंदिरों में आने से रोकना समाज और धर्म दोनों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धर्म की असली शक्ति समावेशिता में है, न कि विभाजन में।

मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता में नौ जजों की संविधान पीठ इस समय धार्मिक स्वतंत्रता और सबरीमाला जैसे मामलों से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि अगर अलग-अलग संप्रदाय अपने-अपने नियमों के आधार पर लोगों को मंदिरों में प्रवेश से रोकने लगेंगे, तो इससे सामाजिक एकता प्रभावित होगी।

संवैधानिक अधिकारों पर बहस
मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता सी.एस. वैद्यनाथन ने दलील दी कि संविधान का अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने नियम तय करने और प्रबंधन करने का अधिकार देता है। उनके अनुसार, किसी संप्रदाय को अपने मंदिर में प्रवेश के नियम तय करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

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इस पर पीठ के न्यायाधीशों ने कहा कि इस तरह की व्यवस्था से समाज में विभाजन की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक मंदिरों में सभी वर्गों को प्रवेश मिलना चाहिए, जबकि निजी पारिवारिक मंदिरों की स्थिति अलग हो सकती है।

समानता और परंपरा के बीच संतुलन जरूरी
सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि संविधान का अनुच्छेद 25 राज्य को यह अधिकार देता है कि वह सभी वर्गों के लिए धार्मिक स्थलों के द्वार खोल सके। अदालत ने जोर दिया कि धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए समानता और सामाजिक समरसता बनाए रखना आवश्यक है।

वहीं, सबरीमाला जैसे मंदिरों की परंपराओं का हवाला देते हुए यह तर्क भी रखा गया कि वहां विशेष नियमों का पालन करना धार्मिक आस्था का हिस्सा है।

फिलहाल इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है और आने वाले दिनों में इस पर और विस्तृत बहस होने की संभावना है। अदालत की टिप्पणियों ने एक बार फिर यह संकेत दिया है कि आधुनिक भारत में धार्मिक स्वतंत्रता और समान अधिकारों के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है।

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