ॠषि और कृषि संस्कृति का संगम मकर संक्रांति पर्व

भारत की सांस्कृतिक परंपरा में कुछ पर्व ऐसे हैं जो केवल धार्मिक आस्था या सामाजिक रस्मों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि प्रकृति, खगोल और मानव जीवन के बीच एक गहन संवाद स्थापित करते हैं। मकर संक्रांति ऐसा ही एक पर्व है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि मानव जीवन केवल सामाजिक संरचनाओं से नहीं, बल्कि सूर्य, पृथ्वी, ऋतुओं और कृषि चक्र से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह उत्सव उस क्षण का प्रतीक है, जब आकाशीय परिवर्तन पृथ्वी पर जीवन की दिशा और दशा को प्रभावित करता है।
मकर संक्रांति सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का पर्व है। यही वह समय है जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर अग्रसर होता है। इस खगोलीय परिवर्तन के साथ ही दिन धीरे-धीरे लंबे होने लगते हैं, रातें छोटी होने लगती हैं और प्रकृति में एक नई ऊर्जा का संचार दिखाई देता है। यह परिवर्तन केवल आकाश में घटित होने वाली घटना नहीं है, बल्कि पृथ्वी पर जीवन, कृषि, जलवायु और मानवीय गतिविधियों को गहराई से प्रभावित करने वाला है। ठंड की कठोरता कम होने लगती है, भूमि नई फसलों के लिए तैयार होती है और किसान की मेहनत अब साकार रूप लेने लगती है।
खगोलशास्त्र और मकर संक्रांति
वैज्ञानिक दृष्टि से मकर संक्रांति सौर कैलेंडर पर आधारित पर्व है। पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग 23.5 डिग्री झुकी हुई है। इसी झुकाव के कारण सूर्य की किरणें पूरे वर्ष अलग-अलग कोणों से पृथ्वी पर पड़ती हैं और ऋतुओं का निर्माण होता है। दिसंबर के अंत में शीत अयनांत के बाद सूर्य की गति उत्तर की ओर होने लगती है। जब सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है, तब खगोलशास्त्र की भाषा में उसका ecliptic longitude 270 डिग्री पर पहुंचता है। यही क्षण उत्तरायण की औपचारिक शुरुआत माना जाता है।
इस खगोलीय घटना का सीधा प्रभाव उत्तरी गोलार्ध पर पड़ता है। दिन लंबे होने लगते हैं, तापमान में धीरे-धीरे वृद्धि होती है और मौसम वसंत की ओर बढ़ने लगता है। प्राचीन भारतीय खगोलविदों और ज्योतिषाचार्यों ने इस परिवर्तन को अत्यंत सूक्ष्मता से समझा और इसे केवल वैज्ञानिक घटना न मानकर सांस्कृतिक पर्व का स्वरूप दिया। भविष्य पुराण में उत्तरायण की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि सूर्य का मकर राशि में प्रवेश उत्तरायण कहलाता है और इसे वामन भगवान के चरणों से भी जोड़ा गया है। यह दृष्टि भारतीय परंपरा की उस विशेषता को दर्शाती है, जिसमें विज्ञान और अध्यात्म परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। भविष्य पुराण में इसकी सुंदर व्याख्या मिलती है:
वामनस्य पदं कृष्ण ज्ञेयं वै उत्तरायणम्।
अर्थात् सूर्य का मकर राशि में प्रवेश ही उत्तरायण है, जिसे वामन भगवान का पद भी कहा गया है।
कृषि संस्कृति और सूर्य उपासना
मकर संक्रांति का सबसे गहरा संबंध भारत की कृषि संस्कृति से है। भारत सदियों से कृषि प्रधान देश रहा है। यहां जीवन का चक्र फसलों के चक्र के साथ चलता रहा है। मकर संक्रांति रबी फसल की कटाई का समय है। गेहूं, जौ, तिल, गन्ना और चना जैसी फसलें इस समय पककर तैयार होती हैं। किसान अपनी मेहनत का प्रतिफल देखकर सूर्य को धन्यवाद देता है, क्योंकि सूर्य की किरणें ही फसलों को जीवन देती हैं।
उत्तरायण में सूर्य की बढ़ती शक्ति भूमि को नई उर्वरता प्रदान करती है। खेतों में हरियाली लौटने लगती है और किसान के चेहरे पर संतोष की मुस्कान दिखाई देती है। यही कारण है कि मकर संक्रांति केवल पर्व नहीं, बल्कि किसान के लिए उत्सव है। इस दिन दान का विशेष महत्व माना गया है। अन्न, तिल, गुड़, वस्त्र और धन का दान कर समाज के कमजोर वर्गों को सहारा दिया जाता है। यह परंपरा बताती है कि कृषि केवल व्यक्तिगत लाभ का साधन नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन का आधार है।
पशु, जो कृषि के अभिन्न सहयोगी हैं, मकर संक्रांति में विशेष स्थान पाते हैं। बैल, गाय और अन्य पशुओं को सजाया जाता है, उन्हें स्नान कराया जाता है और पूजा की जाती है। यह परंपरा हमें यह सिखाती है कि मानव और पशु का संबंध केवल उपयोगिता का नहीं, बल्कि सह-अस्तित्व का है।
तिल और गुड़ का सांस्कृतिक संदेश
मकर संक्रांति पर तिल और गुड़ का विशेष महत्व है। तिल ऊर्जा का स्रोत है और सर्दियों में शरीर को गर्मी प्रदान करता है। गुड़ मिठास का प्रतीक है। तिल और गुड़ से बने व्यंजन केवल स्वाद के लिए नहीं, बल्कि जीवन दर्शन के प्रतीक हैं। संस्कृत परंपरा में कहा गया है कि तिल की तरह प्रेम में स्निग्धता हो और गुड़ की तरह वाणी में मिठास। यह संदेश सामाजिक सौहार्द और मानवीय रिश्तों की गरिमा को रेखांकित करता है।
क्षेत्रीय विविधता में एकता
मकर संक्रांति की सबसे सुंदर विशेषता यह है कि यह पूरे भारत में अलग-अलग नामों और रूपों में मनाई जाती है, फिर भी इसका मूल भाव एक ही रहता है। उत्तर भारत में यह पर्व लोहड़ी, माघी या खिचड़ी के रूप में मनाया जाता है। पंजाब और हरियाणा में अलाव जलाए जाते हैं, लोकगीत गाए जाते हैं और सामूहिक उत्सव होता है। उत्तर प्रदेश और बिहार में गंगा स्नान, दान और खिचड़ी का भोग इस पर्व की पहचान है। प्रयागराज में माघ मेले की शुरुआत इसी दिन से होती है, जहां लाखों श्रद्धालु संगम में स्नान कर पुण्य अर्जित करते हैं।
पश्चिम भारत में गुजरात और राजस्थान में यह उत्तरायण के नाम से प्रसिद्ध है। यहां आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है। पतंग उड़ाना केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सूर्य की ओर बढ़ती ऊर्जा का प्रतीक है। महाराष्ट्र में तिल-गुड़ का आदान-प्रदान सामाजिक सौहार्द का संदेश देता है। नवविवाहित महिलाओं द्वारा हल्दी-कुमकुम की परंपरा सामाजिक रिश्तों को मजबूत करती है।
दक्षिण भारत में तमिलनाडु का पोंगल चार दिनों तक चलने वाला उत्सव है। भोगी, थाई पोंगल, मत्तु पोंगल और कनुम पोंगल के माध्यम से प्रकृति, सूर्य, पशु और परिवार सभी का सम्मान किया जाता है। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में भी संक्रांति इसी भावना के साथ मनाई जाती है। असम में माघ बिहू, उत्तराखंड में घुघुतिया, ओडिशा में मकर चौला और पश्चिम बंगाल में पौष संक्रांति स्थानीय संस्कृति के अनुरूप इस पर्व को नया रंग देती है।
ऐतिहासिक और आध्यात्मिक आयाम
मकर संक्रांति की प्राचीनता महाभारत काल तक जाती है। भीष्म पितामह का उत्तरायण की प्रतीक्षा करना इस पर्व को मोक्ष और आध्यात्मिक मुक्ति से जोड़ता है। यह कथा बताती है कि समय और ऋतु का मानव जीवन में कितना महत्व है। उत्तरायण को शुभ माना गया है और इसे आत्मिक उन्नति का समय कहा गया है।
सूर्य के तेज और समृद्धि की कामना करते हुए प्राचीन श्लोकों में कहा गया है कि जैसे मकर राशि में सूर्य का तेज बढ़ता है, वैसे ही मानव जीवन में भी ऊर्जा, यश और समृद्धि का विस्तार हो। एक अन्य श्लोक सूर्य की बढ़ती शक्ति को व्यक्त करता है:
भास्करस्य यथा तेजो मकरस्थस्य वर्धते । तथैव भवतां तेजो वर्धतामिति कामये ॥
अर्थात् जैसे मकर राशि में सूर्य का तेज बढ़ता है, वैसे ही आपका तेज और समृद्धि बढ़े।
आधुनिक संदर्भ में मकर संक्रांति
आज के समय में जब औद्योगीकरण और शहरीकरण ने मानव को प्रकृति से दूर कर दिया है, मकर संक्रांति हमें यह याद दिलाती है कि हमारा अस्तित्व अभी भी सूर्य, भूमि और ऋतु चक्र पर निर्भर है। यह पर्व पर्यावरण संरक्षण, कृषि सम्मान और सामुदायिक जीवन की सीख देता है। तिल-गुड़ खाना, पतंग उड़ाना या पोंगल पकाना केवल परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ जुड़ने का माध्यम है।
मकर संक्रांति हमें यह सिखाती है कि विविधता में एकता भारत की सबसे बड़ी शक्ति है। अलग-अलग भाषाएं, रीति-रिवाज और परंपराएं होते हुए भी इस पर्व का मूल भाव एक है। सूर्य के प्रकाश की तरह यह पर्व भी जीवन में आशा, ऊर्जा और नवचेतना का संचार करता है। यही मकर संक्रांति का वास्तविक संदेश है, और यही इसकी शाश्वत प्रासंगिकता।
