खालवाटिका की विरासत और सामाजिक समरसता का प्रतीक हैं महात्मा देवपाल मोची
खल्लारी 18 जनवरी26/ 13वीं–14वीं सदी में कल्चुरी राजवंश का शासन वर्तमान छत्तीसगढ़, ओडिशा और महाराष्ट्र के विशाल भूभाग पर विस्तृत था। धार्मिक सहिष्णुता, उदारता और सामाजिक समन्वय के लिए यह राजवंश भारतीय इतिहास में विशेष स्थान रखता है। इस राजवंश की राजधानी रतनपुर थी, जिसकी स्थापना राजा रतनदेव ने की थी। तत्कालीन व्यवस्था के अनुसार शिवनाथ नदी के उत्तर में 18 और दक्षिण में 18 प्रमुख गढ़ स्थापित थे।
शिवनाथ के दक्षिणी गढ़ों का दायित्व राय हरि ब्रह्मदेव को मिला। उन्होंने खालवाटिका को अपनी राजधानी बनाया, जो वर्तमान में महासमुंद–बागबाहरा मार्ग पर स्थित खल्लारी के नाम से जानी जाती है। मध्यकाल में खालवाटिका चर्मशिल्प कला उद्योग का प्रमुख केंद्र था। इस उद्योग के अधिपति महात्मा देवपाल चर्मकार (मोची) थे, जो भगवान नारायण के अनन्य भक्त थे।
महात्मा देवपाल मोची ने अपने इष्टदेव भगवान नारायण के लिए पहाड़ी की तलहटी में एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया। जनश्रुति के अनुसार, मंदिर के लोकार्पण अवसर पर राजा राय हरि ब्रह्मदेव स्वयं उपस्थित थे। उनके पुरोहित दामोदर मिश्र ने महात्मा देवपाल के पुण्य कार्यों और उनके तीन पीढ़ियों के धार्मिक प्रताप का उल्लेख करते हुए एक प्रशस्ति शिलालेख की रचना की। यह ऐतिहासिक शिलालेख वर्तमान में रायपुर स्थित महंत घासीदास संग्रहालय में सुरक्षित है।
आज भी महात्मा देवपाल द्वारा निर्मित नारायण मंदिर का स्थापत्य सुरक्षित है, हालांकि मूल नारायण प्रतिमा उपलब्ध नहीं है। वर्तमान में यहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की प्रतिमाएं विराजमान हैं, जिसके कारण यह स्थल जगन्नाथ मंदिर के नाम से प्रसिद्ध हो गया है। इस मंदिर का पुरातात्विक और ऐतिहासिक दस्तावेजीकरण भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकारी डॉ. जे. डी. बेगलर ने वर्ष 1871–72 में किया था, जबकि शिलालेख का पठन और अनुवाद डॉ. किलहॉर्न द्वारा किया गया। शिलालेख के अनुसार, मंदिर का लोकार्पण ईस्वी सन 1413 में माघ शुक्ल पक्ष अष्टमी तिथि को हुआ था।
महात्मा देवपाल मोची भक्तिकाल के एक अद्वितीय भगवद प्रेमी थे। यद्यपि अब तक उनकी रचनाएं उपलब्ध नहीं हो सकी हैं, लेकिन पुरातात्विक साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं कि वे जीवंत इतिहास के वास्तविक पात्र थे। उनके समकालीन संत कबीर और रैदास की रचनाएं आज भी लोक और साहित्य में प्रचलित हैं। संभव है कि महात्मा देवपाल की रचनाएं भी किसी प्राचीन साहित्यिक स्रोत में सुरक्षित हों, जिनके अन्वेषण की आवश्यकता है।
खालवाटिका का वैभव मध्यकालीन भारत में जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता को चुनौती देने वाले उदाहरण के रूप में आज भी खड़ा है। यह धरोहर किसी राष्ट्रीय स्मारक से कम नहीं है। जनप्रतिनिधियों और शासन की यह जिम्मेदारी है कि इस ऐतिहासिक स्थल को राष्ट्रीय पहचान दिलाई जाए तथा इसके संरक्षण और संवर्धन के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।
महात्मा देवपाल मोची के पुण्य स्मरण में वर्ष 2016 से निरंतर सामाजिक समरसता गोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। इन आयोजनों में स्व. प्रो. जीता मित्र सिंहदेव, प्रो. लक्ष्मी शंकर निगम, आचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र, साहित्यकार गिरीश पंकज, स्व. आशीष सिंह, प्रो. मुकुंद हम्बर्डे सहित अनेक प्रतिष्ठित विद्वानों ने सहभागिता की है।
इसी क्रम में महात्मा देवपाल मोची के पुण्य स्मरण में सामाजिक समरसता संगोष्ठी का आयोजन रविवार, 18 जनवरी को खल्लारी में पूर्वाह्न 11 बजे से अपरान्ह 3 बजे तक किया जाएगा। आयोजन में इतिहास, पुरातत्व, साहित्य और सामाजिक विमर्श से जुड़े विद्वानों की सहभागिता अपेक्षित है।
