वैदिक चेतना से सामाजिक क्रांति तक भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत महर्षि दयानंद सरस्वती

उन्नीसवीं सदी का भारत गहरे संक्रमण का समय था। एक ओर अंग्रेजी शासन का राजनीतिक वर्चस्व था, दूसरी ओर समाज भीतर से जर्जर हो चुका था। धार्मिक जीवन कर्मकांडों में उलझा हुआ था, जातिगत ऊंच नीच ने सामाजिक एकता को तोड़ दिया था, स्त्रियों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी और शिक्षा का दायरा सीमित था।
मिशनरियों का प्रभाव बढ़ रहा था और पश्चिमी चिंतन भारतीय परंपराओं को चुनौती दे रहा था। ऐसे दौर में कुछ व्यक्तित्व प्रकाशस्तंभ बनकर उभरे, जिन्होंने भारतीय समाज को आत्मचिंतन की दिशा दी। इन अग्रदूतों में स्वामी दयानंद सरस्वती का स्थान अत्यंत विशिष्ट है।
उन्होंने न कोई राजनीतिक दल बनाया और न किसी सत्ता का सहारा लिया। उनका विश्वास था कि समाज का वास्तविक उत्थान भीतर से होता है। वेदों की ओर लौटने का उनका आह्वान केवल धार्मिक सुधार का संदेश नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण का उद्घोष था।
स्वामी दयानंद का जन्म 1824 में गुजरात के टंकारा में एक साधारण ब्राह्मण परिवार में हुआ। उनका बाल्यकालीन नाम मूलशंकर था। परिवार धार्मिक था और वैदिक संस्कारों का पालन करता था। किंतु बालक मूलशंकर का मन प्रश्नों से भरा था।
किशोरावस्था में एक शिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में जागरण के दौरान उन्होंने देखा कि जिस शिवलिंग को देवता मानकर पूजा जा रही है, उस पर चूहे निर्भय होकर घूम रहे हैं। यह दृश्य उनके मन में गहरी हलचल का कारण बना। उन्होंने स्वयं से पूछा कि यदि यह ईश्वर है तो स्वयं को चूहों से क्यों नहीं बचाता। यह प्रश्न साधारण नहीं था। यही प्रश्न आगे चलकर उनके जीवन की दिशा निर्धारित करने वाला बना।
उन्होंने घर छोड़ दिया और सत्य की खोज में निकल पड़े। वर्षों तक वे विभिन्न साधु संतों के संपर्क में रहे, हिमालय की कंदराओं में तप किया और शास्त्रों का अध्ययन किया। अंततः मथुरा में उन्हें स्वामी विरजानंद का सान्निध्य मिला। विरजानंद ने उन्हें वेदों का गहन अध्ययन कराया और कहा कि सत्य का मूल स्रोत वेद हैं। शिष्य दयानंद ने गुरु को वचन दिया कि वे वेदज्ञान का प्रचार करेंगे और समाज को अज्ञान से मुक्त करने का प्रयास करेंगे।
स्वामी दयानंद का सबसे प्रसिद्ध वाक्य था कि वेदों की ओर लौटो। इसका अर्थ अतीत में पलायन नहीं था, बल्कि मूल स्रोतों की ओर लौटकर शुद्धता और विवेक को अपनाना था। उनका मानना था कि वेद ज्ञान, विज्ञान और नैतिकता का मूल आधार हैं।
उन्होंने मूर्तिपूजा, अवतारवाद और कर्मकांडों की कठोर आलोचना की। उनके अनुसार ईश्वर निराकार, सर्वशक्तिमान और सर्वव्यापी है। उसे पत्थर या धातु की मूर्तियों में सीमित करना उचित नहीं। वे जाति व्यवस्था को जन्म पर आधारित मानने के विरोधी थे। उनके विचार में वर्ण व्यवस्था कर्म और गुण पर आधारित होनी चाहिए।
उनकी वाणी में स्पष्टता और तर्क था। वे संस्कृत के विद्वान थे, किंतु उन्होंने हिंदी में प्रवचन देकर आम जनता तक अपने विचार पहुंचाए। काशी, हरिद्वार, अजमेर और अन्य नगरों में उन्होंने शास्त्रार्थ किए। इन बहसों में वे वेदों की प्रामाणिकता और तार्किकता पर बल देते थे।
1875 में बंबई में आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद के जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव था। आर्य समाज का उद्देश्य समाज को वैदिक सिद्धांतों पर संगठित करना और सामाजिक सुधार को गति देना था। इसके दस नियम सरल किंतु गहरे थे। इनमें ईश्वर की एकता, सत्य का अनुसरण, विद्या का प्रचार, अज्ञान का नाश और सर्वहित की भावना प्रमुख थे।
आर्य समाज ने शिक्षा, सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना को नई दिशा दी। शुद्धि आंदोलन के माध्यम से उन लोगों को पुनः हिंदू समाज में स्थान दिया गया, जो विभिन्न कारणों से अन्य धर्मों में चले गए थे। इस अभियान ने समाज में आत्मविश्वास का संचार किया।
स्वामी दयानंद स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। उनका मत था कि समाज तभी प्रगति कर सकता है जब स्त्रियां शिक्षित हों। उन्होंने वेदाध्ययन का अधिकार स्त्रियों को दिया और उनके लिए विद्यालय स्थापित करने का आह्वान किया।
बाल विवाह, सती प्रथा और बहुविवाह जैसी कुरीतियों के वे विरोधी थे। उन्होंने विधवा विवाह का समर्थन किया और स्त्रियों की गरिमा को पुनर्स्थापित करने का प्रयास किया। उनके विचारों ने समाज में नई बहस छेड़ी और सुधार आंदोलनों को प्रेरणा दी।
उनकी प्रमुख कृति सत्यार्थ प्रकाश है। इसमें उन्होंने वेदों की व्याख्या के साथ साथ विभिन्न धार्मिक परंपराओं का विश्लेषण किया। उनका उद्देश्य विवाद खड़ा करना नहीं था, बल्कि सत्य की खोज करना था। उन्होंने तर्क, प्रमाण और विवेक पर बल दिया।
सत्यार्थ प्रकाश ने भारतीय समाज में आत्ममंथन की प्रक्रिया को तेज किया। यह ग्रंथ आज भी आर्य समाज के अनुयायियों के लिए मार्गदर्शक है।
स्वामी दयानंद के विचारों से प्रेरित होकर दयानंद एंग्लो वैदिक संस्थाओं की स्थापना हुई। इन विद्यालयों और महाविद्यालयों ने आधुनिक शिक्षा और वैदिक मूल्यों का समन्वय प्रस्तुत किया। आज भी डीएवी संस्थाएं देश भर में शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
गुरुकुल कांगड़ी जैसे संस्थानों ने वैदिक पद्धति और आधुनिक विषयों का संगम प्रस्तुत किया। इस शिक्षा मॉडल ने भारतीय युवाओं में आत्मगौरव और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया।
स्वामी दयानंद का राष्ट्रवाद सांस्कृतिक आधार पर टिका था। उनका विश्वास था कि राजनीतिक स्वतंत्रता तभी सार्थक होगी जब समाज मानसिक और आध्यात्मिक रूप से स्वतंत्र हो। उन्होंने स्वराज की अवधारणा को स्पष्ट किया।
आर्य समाज से जुड़े अनेक नेता आगे चलकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुए। लाला लाजपत राय और स्वामी श्रद्धानंद जैसे व्यक्तित्वों ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई ऊर्जा दी। इस प्रकार स्वामी दयानंद का प्रभाव सामाजिक सुधार से आगे बढ़कर राष्ट्र निर्माण तक पहुंचा।
स्वामी दयानंद निर्भीक थे। वे राजाओं और शासकों से भी प्रश्न पूछने में संकोच नहीं करते थे। उन्होंने अंग्रेजी शासन की नीतियों की भी आलोचना की।
1883 में जोधपुर में उन्हें विष दिया गया। यह घटना दुखद थी, किंतु उनके विचारों को रोक न सकी। उनका जीवन अल्पकालिक था, पर प्रभाव दीर्घकालिक।
आज का भारत अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है। जातीय विभाजन, अंधविश्वास और सांस्कृतिक असंतुलन अब भी विद्यमान हैं। ऐसे समय में स्वामी दयानंद के विचार नई प्रेरणा देते हैं। उनका आग्रह था कि सत्य को तर्क की कसौटी पर परखा जाए और समाज को ज्ञान आधारित बनाया जाए।
उनका संदेश था कि शिक्षा, नैतिकता और आत्मगौरव से ही राष्ट्र सशक्त बनता है। वे आधुनिकता के विरोधी नहीं थे, बल्कि उसे वैदिक मूल्यों के साथ समन्वित करने के पक्षधर थे।
भारतीय पुनर्जागरण की धारा में स्वामी दयानंद सरस्वती एक ऐसे प्रकाशस्तंभ हैं, जिन्होंने अंधकार के समय में समाज को दिशा दी। उन्होंने धर्म को कर्मकांड से मुक्त कर तर्क और नैतिकता से जोड़ा। उन्होंने शिक्षा को समाज सुधार का साधन बनाया और राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक आधार प्रदान किया।
उनकी जयंती और पुण्यतिथि केवल स्मरण का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी अवसर है। यदि हम उनके संदेश को समझें और जीवन में उतारें, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव है।
स्वामी दयानंद सरस्वती सचमुच भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूत थे। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि एक व्यक्ति भी यदि सत्य के प्रति प्रतिबद्ध हो, तो वह पूरे युग की दिशा बदल सकता है।
