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आस्था, इतिहास और भारतीय चेतना का महापर्व माघ मेला

आचार्य ललित मुनि

भारत की आत्मा को यदि किसी एक स्थान पर सघन रूप में महसूस करना हो, तो वह स्थान प्रयागराज है। प्राचीन काल में जिसे प्रयाग कहा गया, मुगल काल में इलाहाबाद और अब पुनः अपने सांस्कृतिक नाम प्रयागराज के रूप में प्रतिष्ठित यह नगर केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की स्मृति, आस्था और निरंतरता का जीवंत केंद्र है। यहीं पर गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का पवित्र संगम होता है, जिसे त्रिवेणी संगम कहा जाता है। यही संगम हर वर्ष उस आयोजन का साक्षी बनता है, जिसे माघ मेला कहा जाता है।

माघ मेला केवल एक धार्मिक मेला नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक चेतना का प्रवाह है, जो हर वर्ष पौष पूर्णिमा से लेकर महाशिवरात्रि तक लगभग 45 दिनों तक संगम तट पर बहता है। यह प्रवाह स्नान, साधना, दान, त्याग और आत्मशुद्धि के विचारों से भरा होता है। दुनिया में शायद ही कोई ऐसा वार्षिक आयोजन हो, जो इतने लंबे समय तक, इतने शांतिपूर्ण ढंग से, करोड़ों लोगों को एक साथ जोड़ता हो।

माघ मेला वस्तुतः कुंभ परंपरा का वार्षिक रूप है। जहां पूर्ण कुंभ 12 वर्ष में और अर्धकुंभ 6 वर्ष में आयोजित होता है, वहीं माघ मेला हर वर्ष प्रयागराज में लगता है। इस दृष्टि से माघ मेला भारतीय धार्मिक परंपरा की निरंतरता का सबसे सशक्त उदाहरण है।

2026 में यह मेला 3 जनवरी से 15 फरवरी तक आयोजित हुआ, जिसमें देश-विदेश से आए करोड़ों श्रद्धालुओं ने संगम में स्नान किया। यह संख्या केवल भीड़ नहीं दर्शाती, बल्कि उस विश्वास को प्रकट करती है, जो पीढ़ियों से भारतीय मानस में रचा-बसा है।

माघ मेले की जड़ें भारतीय पौराणिक परंपरा में अत्यंत गहरी हैं। पुराणों, महाभारत और अनेक स्मृति ग्रंथों में प्रयाग और माघ स्नान का विशेष उल्लेख मिलता है।

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सबसे प्रसिद्ध कथा समुद्र मंथन से जुड़ी है। देवताओं और असुरों द्वारा किए गए समुद्र मंथन से जब अमृत कलश प्राप्त हुआ, तब उसे सुरक्षित रखने के लिए भगवान विष्णु मोहिनी रूप में प्रकट हुए। अमृत को ले जाते समय उसकी कुछ बूंदें चार स्थानों पर गिरीं—हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज। यही कारण है कि इन चार स्थानों पर कुंभ परंपरा विकसित हुई। प्रयागराज में यही परंपरा हर वर्ष माघ मेले के रूप में जीवित रहती है।

एक अन्य पौराणिक मान्यता के अनुसार, सृष्टि के आरंभ में भगवान ब्रह्मा ने यहीं प्रथम यज्ञ किया था। इसी कारण प्रयाग को “तीर्थराज” कहा गया। पद्म पुराण में स्पष्ट उल्लेख है कि माघ मास में प्रयाग में किया गया स्नान समस्त पापों को भस्म कर देता है। पुरुरवा को कुरूपता से मुक्ति और इंद्र को गौतम ऋषि के शाप से उद्धार जैसी कथाएं इसी स्थल से जुड़ी हैं।

गंगा को पापहरिणी, यमुना को मोक्षदायिनी और सरस्वती को ज्ञान की देवी माना गया है। इन तीनों के संगम से बना जल अमृत तुल्य माना जाता है। यही विश्वास माघ मेले की आत्मा है।

माघ मेले का इतिहास केवल पौराणिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भी है। सातवीं शताब्दी में भारत आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने प्रयाग में एक विशाल धार्मिक आयोजन का वर्णन किया है, जहां हजारों लोग स्नान और दान करते थे। यह उल्लेख इस बात का प्रमाण है कि माघ मेला उस समय भी सामाजिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

17वीं शताब्दी में सूजन राय की प्रसिद्ध कृति खुलासत-उत-तवारीख में प्रयाग के वार्षिक स्नान मेले का उल्लेख मिलता है। मुगल शासक अकबर ने इलाहाबाद को बसाया और यहां के धार्मिक आयोजनों को संरक्षण दिया। ब्रिटिश काल में भी माघ मेला निरंतर आयोजित होता रहा। 1905 की दुर्लभ तस्वीरों में संगम तट पर साधु-संतों, कल्पवासियों और श्रद्धालुओं की विशाल उपस्थिति दिखाई देती है।

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स्वतंत्रता के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे सुव्यवस्थित और व्यापक स्वरूप प्रदान किया। आज यह मेला विश्व का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण वार्षिक जनसमूह माना जाता है।

माघ मेले का केंद्रीय तत्व माघ स्नान है। हिंदू दर्शन में यह स्नान केवल शरीर की शुद्धि नहीं, बल्कि आत्मा के परिष्कार का माध्यम है। मान्यता है कि माघ मास में संगम में स्नान करने से पूर्व जन्मों के पाप नष्ट होते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

इस साधना का सर्वोच्च रूप है कल्पवास। कल्पवासी पूरे माघ मास संगम तट पर निवास करते हैं। वे भूमि पर शयन करते हैं, एक समय सात्विक भोजन करते हैं, ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं और प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देते हैं। यह जीवन अत्यंत कठिन होता है, किंतु कल्पवासी इसे सौभाग्य मानते हैं।

कल्पवास भारतीय तपस्या परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जहां साधक संसार के बीच रहते हुए भी संसार से ऊपर उठने का प्रयास करता है।

माघ मेले के दौरान कुछ तिथियां विशेष महत्व रखती हैं। पौष पूर्णिमा से कल्पवास का आरंभ होता है। मकर संक्रांति पर सूर्य के मकर राशि में प्रवेश के साथ मुख्य स्नान होता है। मौनी अमावस्या सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है, जब मौन व्रत के साथ स्नान किया जाता है। बसंत पंचमी ज्ञान और नव आरंभ का प्रतीक है। माघ पूर्णिमा विशेष पूजा और दान का दिन है। महाशिवरात्रि के साथ मेले का समापन होता है। इन दिनों संगम तट पर आस्था का सागर उमड़ पड़ता है।

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माघ मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय लोक संस्कृति का विराट मंच है। यहां विभिन्न अखाड़ों के साधु-संत प्रवचन देते हैं, शास्त्रार्थ होते हैं, भजन-कीर्तन की ध्वनि चारों ओर गूंजती है। नागा साधुओं की उपस्थिति इस मेले को विशिष्ट बनाती है।

मेले में दान, सेवा और परोपकार की परंपरा जीवंत रहती है। अन्नदान, वस्त्रदान और चिकित्सा शिविर सामाजिक संवेदनशीलता का परिचय देते हैं। हस्तशिल्प, लोक कला और पारंपरिक व्यंजनों की दुकानों से ग्रामीण और शहरी भारत का संगम दिखाई देता है।

यह मेला सामाजिक समरसता का उदाहरण है, जहां जाति, वर्ग और भाषा की सीमाएं स्वतः टूट जाती हैं।

आज माघ मेला वैश्विक स्तर पर आकर्षण का केंद्र है। आधुनिक तकनीक, सुरक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएं और स्वच्छता अभियान इसे सुव्यवस्थित बनाते हैं। ड्रोन कैमरों से एरियल दृश्य, डिजिटल मैपिंग और लाइव प्रसारण के माध्यम से यह मेला पूरी दुनिया तक पहुंचता है।

2025 के महाकुंभ के बाद 2026 का माघ मेला इस बात का प्रमाण है कि परंपरा और आधुनिकता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकते हैं।

प्रयागराज का माघ मेला भारतीय संस्कृति की अमर धरोहर है। यह हमें सिखाता है कि साधना, त्याग और आस्था केवल धार्मिक अवधारणाएं नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति हैं। भौतिकता से भरे इस युग में माघ मेला हमें हमारी जड़ों से जोड़ता है, आत्मचिंतन का अवसर देता है और विश्व शांति का मौन संदेश देता है।

संगम के शांत जल में जब लाखों दीप प्रतिबिंबित होते हैं, तब लगता है मानो भारत की आत्मा स्वयं को निहार रही हो। यही माघ मेले का सार है।